-तौसीफ कुरैशी
लोकतंत्र का इससे बड़ा मजाक और क्या होगा कि पहले वोटर को मतदाता सूची से गायब कर दीजिए और जब चुनाव निकल जाए तो उसी वोटर को ढूंढ़ने के लिए घर-घर दस्तक देने लगिए। आदमी वही, घर वही, पता वही और लोकतंत्र भी वही बस चुनाव गुजर चुका है इन्हें हटाकर, जिन्हें बैठाना था बैठा दिया गया अब यह प्रयास और इसके क्या मायने रहे। अब चुनाव आयोग उन राज्यों में ‘छूटे हुए’ मतदाताओं के नाम जोड़ने की कवायद कर रहा है, जहां एसआईआर पूरा हो चुका है। बीएलओ जब घर-घर नहीं गए जब काटे गए थे, अब क्या घर-घर जाएंगे और पता लगाएंगे कि कौन पात्र मतदाता सूची से बाहर रह गया यकीन नही होता है। सवाल यह है कि ‘छूटे हुए’ कौन हैं और उन्हें छोड़ा किसने? और किस लिए? बंगाल में एसआईआर के बाद २७ लाख से अधिक मतदाताओं को ‘अपात्र’ की श्रेणी में रखा गया। बड़ी संख्या में लोगों ने अपना नाम वापस जुड़वाने के लिए अपील की। मगर विधानसभा चुनाव के समय तक बहुत कम नाम बहाल हो पाए। यानी नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार कागजों की ऐसी भूलभुलैया में फंसा रहा, जिसका दरवाजा चुनाव खत्म होने के बाद खुला और सुप्रीम कोर्ट ने भी बड़ी आसानी से कह दिया था कि क्या हुआ अगली बार डाल लेंगे। यहां से असली सवाल शुरू होता है। अगर किसी नागरिक का नाम गलत तरीके से कट गया था तो वह गलती चुनाव से पहले क्यों नहीं सुधारी गई? या गलती की ही इसलिए थी कि बाद में सुधार लेगे ? अगर दस्तावेज चाहिए थे तो पहले क्यों नहीं मांगे गए? या लेने ही नही थे? अगर बीएलओ घर जाकर मतदाता की पहचान कर सकता है तो एसआईआर के दौरान यही काम अधिक मानवीय और सरल तरीके से क्यों नहीं हुआ?
या करना नहीं था? और यदि वास्तव में लाखों पात्र मतदाता प्रक्रिया की वजह से बाहर हुए हैं, तो केवल उनका नाम वापस जोड़ देना पर्याप्त है क्या? लोकतंत्र में वोट कोई सरकारी कृपा नहीं है। यह नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। चुनाव आयोग की जिम्मेदारी केवल चुनाव कराना नहीं, बल्कि ऐसी मतदाता सूची तैयार करना भी है, जिसमें पात्र नागरिक का नाम किसी प्रशासनिक भूल, तकनीकी पेच या अस्पष्ट प्रक्रिया के कारण न छूटे लेकिन इस वोट चोर ने ऐसे नियम थोपे, जिससे लोग अपने अधिकार से वंचित हो जाए और वह हो गए। इसीलिए जननायक राहुल गांधी द्वारा मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया को लेकर उठाए गए सवालों को भी नारे से नहीं, रिकॉर्ड और जांच की कसौटी पर परखा जाना चाहिए। जिस सवाल का जवाब दस्तावेजों से मिलता है, वह सवाल पूछने वाले की राजनीतिक हैसियत से बड़ा हो जाता है। फार्म ६ को लेकर भी अब सवाल उठ रहे हैं। यदि प्रक्रिया में बदलाव की जरूरत चुनाव के बाद महसूस हुई, तो स्वाभाविक प्रश्न है यही सुधार पहले क्यों नहीं किया गया? भारत में वोटर होने के लिए नागरिक होना काफी है या चुनाव आयोग की परीक्षा भी पास करनी पड़ेगी? पहले आपका नाम सूची से गायब हो जाए। फिर आप साबित करें कि आप जिंदा हैं। साबित करें कि आप इसी देश के नागरिक हैं। साबित करें कि आप इसी पते पर रहते हैं। फिर अपील करें। फिर इंतजार करें। और अगर तब तक चुनाव हो गया तो लोकतंत्र आपको अगले चुनाव तक धैर्य रखने की सलाह दे देगा। वाह रे लोकतंत्र! अब सबसे जरूरी सवाल किसी पार्टी के पक्ष या विपक्ष का नहीं है। सवाल है जिस नागरिक का वोट छिन गया, उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? क्योंकि चुनाव हारने या जीतने का पैâसला जनता करती है। लेकिन जनता को वोट देने से पहले सूची में रहने का अधिकार किसके हाथ में है, यह सवाल उससे भी ज्यादा गंभीर है। एसआईआर सही है या गलत इस पर बहस हो सकती है। मतदाता सूची की शुद्धता जरूरी है इस पर किसी को आपत्ति हो। मृतकों, स्थानांतरित लोगों और डुप्लीकेट नामों को हटाना भी जरूरी है। लेकिन इस सफाई अभियान में अगर एक भी पात्र नागरिक का वोट चला जाता है या खास तबके को अधिकार वहीन किया गया हो तो सवाल उठेगा ही। और अगर संख्या लाखों या करोड़ों में हो जाए, तो सवाल सिर्फ सवाल नहीं रहता लोकतंत्र की जवाबदेही का मामला बन जाता है। वोटर को अब ढूंढ़ा जा रहा है। ठीक है। मगर देश यह भी पूछेगा जब वोटर को ढूंढ़ने की इतनी जल्दी है, तो चुनाव से पहले उसे बचाने की इतनी जल्दी क्यों नहीं थी? यही वह सवाल है जिसका जवाब चुनाव आयोग को भी देना होगा और लोकतंत्र को भी। हम भी देखेंगे लाज़िम है हम भी देखेंगे। हर-हर… घर-घर…
सत्यमेव जयते!
