धनुर्धर
फर्क है। इस बार प्रधानमंत्री रोए नहीं, हंसे। वे हंसे और फिर दूसरे भी हंसने लगे। प्रधानमंत्री दूसरों पर हंसे थे और दूसरे प्रधानमंत्री पर। किसकी हंसी ज्यादा मारक रही, इस सवाल को फिलहाल रहने दिया जाए। अभी तो दोनों हंसियों पर ही बात करने को बहुत कुछ है।
सवाल तो बनता है
पहला सवाल यही बनता है कि प्रधानमंत्री हंसे क्यों। सवाल इसलिए बनता है कि प्रधानमंत्री के हंसने की नौबत प्राय: आती नहीं। रोने से ही उनका काम चल जाता है। जब भी कोई बड़ी मुश्किल आती है प्रधानमंत्री किसी न किसी सार्वजनिक मंच पर भावुक हो जाते हैं। उनका भावुक चेहरा लोगों को पिघला देता है और लोग सबकुछ भूल जाते हैं। जब सबकुछ भूल जाते हैं तो शिकायतें वैâसे याद रखेंगे। शिकायतें गर्इं तो विरोधी गए। उनके फुलाए असंतोष के गुब्बारे यूं ही हवा हो जाते हैं।
बंदे में था दम
आप दिमाग पर ज्यादा जोर न दें। यहां मनमोहन सिंह जैसे प्रधानमंत्रियों की बात नहीं हो रही। आवाज में भले दम न हो, बंदा दमदार था। शायद ही कभी किसी ने उसके आंसू देखे होंगे। बचपन से ही मुश्किलों का साया बना रहा उस पर। लेकिन क्या मजाल कि कभी होठों पर अपनी तकलीफों का कोई ब्योरा आ जाए कभी।
कोई रंग नहीं
सो, उनकी राजनीति भी वैसी ही फीकी-फीकी रही। न अपने गिले-शिकवों का कोई रंग घोला उसमें कभी और न ही दूसरों के गिले-शिकवों पर कभी हाय-तौबा मचाई। दूसरे जरूर हाय-तौबा मचाते रहे, पर खुद मनमोहन सिंह हमेशा शांत नजर आए। एक बार कहा भी तो यही कि मेरे काम-काज पर इतिहास विचार करेगा।
खुद पर भरोसा
अब वह कैसा नेता हुआ जो अपने कामकाज का मूल्यांकन किसी और को करने दे। इसीलिए कहने वाले कहते हैं कि मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री भले हो गए हों, वे नेता कभी नहीं बने। अपने आज वाले प्रधानमंत्री विशुद्ध नेता हैं। प्रधानमंत्री कितने हैं, पता नहीं लेकिन नेता भरपूर हैं। अपने कामकाज का मूल्यांकन हमेशा खुद करते हैं। तारीफ के मामले में दूसरों पर निर्भरता को उचित नहीं मानते।
राजनीति से प्रेरित
और हां, दिन-रात वे कहें कुछ भी करते राजनीति ही हैं। चाहे अपनी स्वर्गवासी मां को याद करके रोएं या स्वर्गीय पिता के कथित अपमान को मुद्दा बनवाएं, मूल में हमेशा राजनीति होती है। इसलिए जब हाल में वे हंसे तो किसी को यह समझने में कोई दिक्कत नहीं हुई कि यह हंसी राजनीति से प्रेरित है।
हंसी की टाइमिंग
सवाल यह था कि यह हंसी उनकी राजनीति को मजबूत करेगी या उनके लिए परेशानियां खड़ी करेगी। जिन चुनाव नतीजों को आधार बनाकर वे हंसे थे, वे नतीजे तब तक पूरी तरह आए नहीं थे। सो, बहुतों का कहना था कि वे समय से कुछ पहले हंस दिए। उन्हें थोड़ी देर धैर्य रखना चाहिए था।
छप्पन इंच का…
मगर, दूसरों को उपदेश देना बहुत आसान होता है। प्रधानमंत्री आजकल जिस तरह से चौतरफा घिरे नजर आ रहे हैं, उसमें धैर्य बनाए रखना कितना मुश्किल है, यह तो वही समझ सकता है जो खुद इस तरह की मुश्किल में फंस चुका हो। जाके पैर न फटी बिवाई, सो क्या जाने पीर पराई। कहने को प्रधानमंत्री हैं, लेकिन हर कोई उन पर कमेंट करता फिर रहा है। कहां तो कल तक छप्पन इंच के सीने की चर्चा हुआ करती थी, कहां अब छप्पन इंच का बंदर चर्चा में बना हुआ है।
वोट चोरी की रट
इस सबके पीछे, देखा जाए तो कांग्रेस ही है। वोट चोरी की रट लगा-लगा कर उसने सबको विश्वास सा दिला दिया है कि अगर बैलट पेपर से चुनाव हों तो वह दो तिहाई बहुमत हासिल करके दिखा देगी। यह परसेप्शन मौजूदा प्रधानमंत्री को कितना खटकता होगा, आप समझ सकते हैं। इसलिए जब बैलट पेपर के ही जरिए हुए एमएलसी चुनावों के नतीजे अनुकूल आते दिखे तो स्वाभाविक ही प्रधानमंत्री जोश में आ गए।
कितनी सीटें मिलीं?
उन्हें पहला वार करने की आदत रही है। सो, तपाक से ट्वीट करके पूछा बैठे, ‘बैलेट पेपर से हुए चुनाव में कांग्रेस को कितनी सीटें आईं?’ ज्यादा लोगों ने तो जवाब नहीं दिया, मगर एक खास सीएम साहब अपने को रोक नहीं सके। बेसाख्ता जवाब दे दिया, शून्य हुजूर, बड़ा सा शून्य। दिक्कत यह हुई कि जो एक सीट कांग्रेस को मिली, वह उन्हीं सीएम साहब के होमटाउन नागपुर में। हुआ यह भी कि खुद पीएम साहब के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में बीजेपी हार गई।
हंसी-हंसी में
खैर, मायूस होने की जरूरत नहीं है। पीएम साहब इस बात में तसल्ली पा सकते हैं कि हंसना और हंसाना कोई छोटी बात नहीं। वे खुद हंसे तभी तो विरोधी उन पर हंस रहे हैं। इसी बहाने वे सबके चेहरों पर मुस्कान ले आए। शासन की नीतियों के जरिए ऐसा पुण्य तो वे कमा नहीं सके थे। आज ऐसे कमा लिया। क्या हुआ कि इस चक्कर में थोड़े से हास्यास्पद हो गए।
(लेखक, वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।)
(उपरोक्त आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। अखबार इससे सहमत हो यह जरूरी नहीं है।)
