-विचार, सुविचार, काव्य, पत्र, भावना और मन का उद्रेक!
-उद्धव ठाकरे, राज ठाकरे, अंबरीश मिश्र की प्रमुख उपस्थिति
सामना संवाददाता / मुंबई
शिवसेना नेता, सांसद और दैनिक `सामना’ के कार्यकारी संपादक संजय राऊत की बहुचर्चित और बहुप्रतीक्षित पुस्तक `बोध कीर्तन’ का प्रकाशन आज, शनिवार, ३१ अक्टूबर को होने जा रहा है। इस अवसर पर पाठकों को बेबाक विचारों और धारदार लेखनी का संगम अनुभव करने को मिलेगा। शिवसेनापक्षप्रमुख उद्धव ठाकरे, मनसे अध्यक्ष राज ठाकरे और वरिष्ठ पत्रकार-लेखक अंबरीश मिश्र की प्रमुख उपस्थिति में `बोध कीर्तन’ पुस्तक का प्रकाशन किया जाएगा। यह प्रकाशन समारोह आज शाम ५ बजे दादर स्थित शिवसेना भवन के सामने ब्राह्मण सहायक संघ में संपन्न होगा।
दैनिक `सामना’ और मेहता पब्लिशिंग हाउस के संयुक्त तत्वावधान में `बोध कीर्तन’ पाठकों के सामने आ रहा है। संजय राऊत ने अनगिनत ब़ड़ी हस्तियों के सान्निध्य से समृद्ध हुए जीवन और अपने सफर के अनुभवों को इस पुस्तक में रेखांकित किया है। यह लेखन विचार, सुविचार, काव्य, पत्र, लघु कथाएं, केस स्टडी, मन के उद्रेक और दर्शनशास्त्र का एक सुंदर संगम है। विचारों की थाती और अनुभवों के समृद्ध संचय वाली, संजय राऊत की लेखनी से उतरी यह पुस्तक `बोध कीर्तन’ पाठकों के मन को छू लेने वाली है। इस पुस्तक के माध्यम से पाठकों को जीवन के प्रेरणादायक क्षणों और ज्ञानवर्धक संवादों को अनुभव करने का अवसर मिलेगा।
एक बार पलटकर तो देखिए!
`बोध कीर्तन’ पुस्तक की प्रकाशन से पहले ही जोरदार चर्चा है। इस पुस्तक में आखिर क्या है, `बोध कीर्तन’ किस बात का है, इस पर कयास लगाए जा रहे हैं। संजय राऊत के वीडियो पोस्ट के जरिए इस पुस्तक को लेकर उत्सुकता और अधिक बढ़ गई है। जिन लोगों का मुझे सान्निध्य मिला या जिन इंसानों के बारे में मैंने लगातार चिंतन किया, वे इस पुस्तक में शामिल हैं। संजय राऊत ने कहा है कि इस `बोध कीर्तन’ को एक बार पलटकर तो देखिए। इसे पढ़ने का कोई नियम नहीं है। आप इस पुस्तक को कैसे भी पढ़ सकते हैं; पहले पन्ने से आखिर तवस या आखिरी पन्ने से शुरुआत की ओर आ सकते हैं या बीच से कोई पन्ना खोलकर पढ़ सकते हैं और विचारों के सागर में डुबकी लगा सकते हैं।
जेल के सौ दिनों का आभार!
कम उम्र में ही मुझे अनगिनत महान लोगों का सान्निध्य प्राप्त हुआ। यात्राओं के दौरान छोटे लोग भी मिले और बड़े लोग भी मिले। इसलिए इसमें विचार हैं, सुविचार हैं, काव्य है, पत्र हैं, छोटी कहानियां हैं, उद्धरण हैं, मन का उद्रेक और भावनाएं जैसी बहुत सी बातें हैं। ऐसा कुछ मेरे हाथों से रचित होगा, ऐसा मैंने कभी सोचा भी नहीं था, लेकिन वैसा हुआ है और यह पुस्तक प्रकाशित हुई है। इसके लिए मैं जेल के सौ दिनों का आभार व्यक्त करता हूं। संजय राऊत का कहना है कि उसी से इस `बोध कीर्तन’ का निर्माण हुआ है।
