-राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा बोर्ड में संघ से जुड़े संगठनों को छह स्थान मिलने पर विवाद
देश में करोड़ों असंगठित, प्लेटफॉर्म और गिग श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने की दिशा में केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा बोर्ड का गठन किया है, लेकिन श्रमिक कल्याण की इस पहल के साथ ही बोर्ड की संरचना और प्रतिनिधियों के चयन को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। सवाल यह है कि जिस संस्था को श्रमिकों के भविष्य की सुरक्षा सुनिश्चित करनी है, उसमें वास्तविक श्रमिक हितों को कितनी जगह मिली है और राजनीतिक या वैचारिक निकटता की कितनी भूमिका रही है?
केंद्रीय श्रम मंत्रालय द्वारा गठित ४० सदस्यीय बोर्ड में सात प्रतिनिधि श्रमिक संगठनों और सात नियोक्ता संगठनों के लिए निर्धारित किए गए हैं। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े भारतीय मजदूर संघ को श्रमिक प्रतिनिधित्व में तीन और लघु उद्योग भारती को नियोक्ता प्रतिनिधित्व में तीन स्थान मिले हैं। इस प्रकार दोनों संगठनों को मिलाकर छह स्थान दिए गए हैं। सीटू और एटक जैसे श्रमिक संगठनों ने इस चयन पर आपत्ति जताई है। उनका आरोप है कि श्रमिक आंदोलन में सक्रिय कई प्रमुख संगठनों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया। हालांकि, भारतीय मजदूर संघ का कहना है कि उसने सरकार के आग्रह पर प्रतिनिधियों के नाम भेजे और बोर्ड को शीघ्र काम शुरू करना चाहिए। यहां सबसे महत्वपूर्ण सवाल किसी संगठन की वैचारिक पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता और श्रमिकों के व्यापक प्रतिनिधित्व का है। सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि प्रतिनिधियों के चयन में सदस्य संख्या, संगठनात्मक पहुंच, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और श्रमिकों के बीच वास्तविक कार्य के किन मानदंडों का इस्तेमाल किया गया।
करोड़ों श्रमिकों के भविष्य का सवाल
भारत में रोजगार का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। ऐप आधारित टैक्सी चालक, डिलिवरी कर्मचारी, ऑनलाइन सेवाएं प्रदान करने वाले कामगार और अन्य प्लेटफॉर्म श्रमिक अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं। नीति आयोग के एक अनुमान के अनुसार, वर्ष २०२९-३० तक देश में गिग श्रमिकों की संख्या लगभग २.३५ करोड़ तक पहुंच सकती है।
इसके बावजूद बड़ी संख्या में ऐसे श्रमिकों को नियमित वेतन, भविष्य निधि, सवेतन अवकाश, दुर्घटना बीमा और रोजगार सुरक्षा जैसी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं।
कई प्लेटफॉर्म श्रमिकों की कमाई काम के घंटे, प्रोत्साहन राशि, कंपनी के एल्गोरिदम और ग्राहकों की मांग पर निर्भर करती है। वाहन, ईंधन , मोबाइल, इंटरनेट और रखरखाव का खर्च भी अक्सर श्रमिक स्वयं उठाते हैं। ऐसे में उनकी वास्तविक शुद्ध आय घोषित भुगतान से काफी कम हो सकती है।
इसलिए सामाजिक सुरक्षा बोर्ड का काम केवल योजनाओं की सिफारिश करना नहीं होना चाहिए। उसे श्रमिकों की वास्तविक आर्थिक स्थिति, दुर्घटना जोखिम, आय की अनिश्चितता और कंपनियों की जिम्मेदारी का अध्ययन भी करना होगा।
जिनके लिए बोर्ड बना, उनकी आवाज कहां?
बोर्ड की संरचना से जुड़ा सबसे बड़ा प्रश्न प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व का है। पारंपरिक श्रमिक संगठनों और नियोक्ता संस्थाओं की भागीदारी महत्वपूर्ण है, लेकिन गिग श्रमिकों की समस्याएं कई मामलों में कारखानों और कार्यालयों में काम करने वाले कर्मचारियों से अलग हैं।
उदाहरण के लिए, किसी डिलिवरी कर्मचारी का ऐप अचानक बंद कर दिया जाए या उसकी डिजिटल पहचान निष्क्रिय कर दी जाए, तो उसके पास रोजगार बहाली के कौन-से अधिकार हैं? किसी टैक्सी चालक की दुर्घटना में मृत्यु होने पर मुआवजा कौन देगा? कंपनी, बीमा संस्था या सरकार?
इसी तरह महिला गिग श्रमिकों की सुरक्षा, मातृत्व लाभ, कार्यस्थल पर उत्पीड़न और रात में काम करने की परिस्थितियों पर विशेष ध्यान देना होगा।
इन प्रश्नों का समाधान तभी प्रभावी होगा, जब निर्णय प्रक्रिया में वास्तविक प्लेटफॉर्म श्रमिकों, महिला कामगारों और विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधियों की पर्याप्त भागीदारी होगी।
सामाजिक सुरक्षा का खर्च कौन उठाएगा?
सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था का एक प्रमुख आर्थिक प्रश्न वित्तपोषण का है। यदि श्रमिकों को स्वास्थ्य बीमा, दुर्घटना सहायता, वृद्धावस्था सुरक्षा और अन्य लाभ देने हैं, तो इनका खर्च सरकार, डिजिटल प्लेटफॉर्म कंपनियों और श्रमिकों के बीच किस अनुपात में बांटा जाएगा? सामाजिक सुरक्षा संहिता, २०२० में गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों के लिए योजनाओं तथा एग्रीगेटर कंपनियों के योगदान का प्रावधान किया गया है। लेकिन कानूनी प्रावधानों का वास्तविक लाभ योजनाओं की अधिसूचना, पंजीकरण, वित्तीय व्यवस्था और प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करेगा।
कंपनियों की व्यावसायिक स्थिति और श्रमिकों की आय-सुरक्षा के बीच संतुलन आवश्यक है। फिर भी श्रमिक कल्याण को केवल स्वैच्छिक सहायता या कंपनियों की सामाजिक जिम्मेदारी पर नहीं छोड़ा जा सकता।
सरकार को सार्वजनिक करने चाहिए चयन के मानदंड
राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा बोर्ड के गठन को श्रमिक कल्याण की दिशा में सकारात्मक पहल माना जा सकता है। लेकिन प्रतिनिधित्व को लेकर उठे सवालों का जवाब देना भी सरकार की जिम्मेदारी है।
बोर्ड के सदस्यों के चयन की प्रक्रिया, संगठनों के नामांकन, प्रतिनिधित्व के मानदंड और बैठकों के निर्णय सार्वजनिक किए जाने चाहिए। इसके साथ ही बोर्ड को सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के लिए समयबद्ध कार्ययोजना प्रस्तुत करनी चाहिए। सबसे जरूरी यह है कि बोर्ड की सफलता का मूल्यांकन बैठकों की संख्या से नहीं, बल्कि उन श्रमिकों की संख्या से किया जाए जिन्हें वास्तव में बीमा, पेंशन, दुर्घटना सहायता और अन्य सुविधाएं मिलीं। गिग अर्थव्यवस्था में कंपनियों का कारोबार तेजी से बढ़ रहा है। लेकिन जिन श्रमिकों की मेहनत से यह कारोबार चलता है, उनकी सामाजिक सुरक्षा अब भी अधूरी है।
ऐसे में राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा बोर्ड केवल संगठनों के प्रतिनिधित्व का मंच बनकर रह गया, तो उसके गठन का मूल उद्देश्य कमजोर पड़ जाएगा।
आखिरकार सवाल छह सीटों का नहीं, बल्कि उन करोड़ों श्रमिकों के अधिकारों का है जिनकी आवाज नीति निर्माण में सबसे अधिक सुनी जानी चाहिए।
