मुख्यपृष्ठस्तंभदिल्ली लाइव : वोटर गायब, जवाबदेही नदारद!

दिल्ली लाइव : वोटर गायब, जवाबदेही नदारद!

अरुण कुमार गुप्ता

लोकतंत्र में मतदाता की पहचान उसका वोट है, लेकिन जब मतदाता सूची से ही लाखों नाम गायब हो जाएं तो सवाल केवल आंकड़ों का नहीं, बल्कि जवाबदेही का भी बन जाता है। दिल्ली में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के तहत ४७.५६ लाख नाम मतदाता सूची से बाहर होने और इनमें से दोबारा नाम जुड़वाने के लिए महज ६ हजार आवेदन आने की खबर ने चुनावी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इतनी बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से बाहर कैसे हुए? क्या संबंधित मतदाताओं को इसकी जानकारी दी गई थी? क्या उन्हें अपना पक्ष रखने और दस्तावेज जमा करने का पर्याप्त अवसर मिला? यदि लाखों नाम हटाए गए हैं तो उनकी स्थिति स्पष्ट करने की जिम्मेदारी किसकी है? चुनाव आयोग की ओर से नाम जुड़वाने की समयसीमा २५ नवंबर तक बढ़ाने और बूथ लेवल अधिकारियों (बीएलओ) को दोबारा घर-घर सत्यापन का निर्देश देने की बात कही गई है। लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल समयसीमा बढ़ाने से समस्या का समाधान हो जाएगा? जिन लोगों को अपने नाम कटने की जानकारी ही नहीं है, वे आवेदन कैसे करेंगे? इस प्रक्रिया में बुजुर्गों, गरीबों, प्रवासी मजदूरों और ऐसे नागरिकों की परेशानी को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, जिनके पास जरूरी दस्तावेज जुटाने के सीमित साधन हैं। प्रशासन की जिम्मेदारी केवल सूची तैयार करना नहीं, बल्कि प्रत्येक पात्र मतदाता का नाम सुरक्षित रखने के लिए प्रभावी व्यवस्था करना भी है। लेकिन इतनी बड़ी संख्या में नाम हटने के बाद पारदर्शी आंकड़े, कारणों का वर्गीकरण और प्रभावित नागरिकों को सूचना देना अनिवार्य हो जाता है। लोकतंत्र में चुनाव की विश्वसनीयता केवल मतदान कराने से नहीं बनती, बल्कि हर पात्र नागरिक को मतदान का अवसर सुनिश्चित करने से बनती है। ऐसे में सवाल सीधा है जब ४७.५६ लाख नाम सूची से बाहर हुए तो उनकी जवाबदेही कौन लेगा? वोटर अपना नाम बचाने के लिए दर-दर भटके या चुनावी व्यवस्था खुद उसकी तलाश करेगी?
पहले नाम गायब, अब दोबारा तलाश!
दिल्ली में ३० जून २०२६ को एसआईआर प्रक्रिया शुरू हुई थी। उस समय राजधानी में करीब १.४५ करोड़ पंजीकृत मतदाता थे। ३१ अगस्त को जारी मसौदा सूची में लगभग ९७.५४ लाख नाम शामिल किए गए। बाकी ४७.५६ लाख मतदाताओं को अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत या दोहरी प्रविष्टि (एएसडीडी) जैसी श्रेणियों में रखा गया। अब इन्हीं मतदाताओं का दोबारा सत्यापन किया जाएगा, ताकि कोई पात्र नागरिक अंतिम सूची से बाहर न रह जाए। चुनाव आयोग ने दावे और आपत्तियां दर्ज कराने की समयसीमा २५ नवंबर तक बढ़ा दी है। पहले यह अवधि ३० अक्टूबर को समाप्त होनी थी। बीएलओ को घर-घर जाकर पात्र मतदाताओं की पहचान करने और जरूरत पड़ने पर फॉर्म-६ भरवाने की जिम्मेदारी दी गई है। अंतिम मतदाता सूची अब २२ दिसंबर को प्रकाशित किए जाने का संशोधित कार्यक्रम है। एसआईआर का उद्देश्य मतदाता सूची की त्रुटियां दूर करना है, लेकिन इस प्रक्रिया में किसी पात्र नागरिक का नाम छूटना भी गंभीर चिंता का विषय है। चुनाव आयोग को यह बताना होगा कि कितने नाम वास्तव में मृत, स्थानांतरित या दोहरी प्रविष्टि वाले हैं और कितने पात्र मतदाताओं को दोबारा सूची में शामिल करने की जरूरत है। केवल दोबारा सर्वे का आदेश पर्याप्त नहीं होगा। सत्यापन की प्रक्रिया, नाम हटाने के कारण और दावे-आपत्तियों के निपटारे का पूरा ब्योरा सार्वजनिक करना भी जरूरी है। लोकतंत्र में मतदाता को अपनी पहचान साबित करने के लिए बार-बार सरकारी दफ्तरों के चक्कर नहीं लगाने पड़ने चाहिए। चुनाव आयोग की सबसे बड़ी परीक्षा यही है कि अंतिम सूची में कोई भी पात्र मतदाता अपने मताधिकार से वंचित न रहे। आखिर वोटर लिस्ट को दुरुस्त करने की जिम्मेदारी मतदाता की है या चुनावी व्यवस्था की?

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