धारा २६८, २६९ और २७०
भाग:९०
एड. कनई बिस्वास
न्यायिक प्रक्रिया में किसी असेसर का झूठा रूप धारण करना, जमानत या बंधपत्र पर रिहा होने के बाद अदालत में उपस्थित न होना और आम जनता को नुकसान, खतरा या परेशानी पैदा करने वाला सार्वजनिक उपद्रव करना अपराध हो सकता है। भारतीय न्याय संहिता की धारा २६८, २६९ और २७० इन्हीं स्थितियों से संबंधित हैं।
केस स्टडी – १: ‘असेसर बनकर झूठी पहचान’ (धारा २६८)
एक न्यायिक कार्यवाही में किसी व्यक्ति को असेसर के रूप में चुना गया था। उसकी जगह दूसरा व्यक्ति जानबूझकर स्वयं को वही असेसर बताकर कार्यवाही में शामिल हो गया और उस हैसियत से काम करने लगा।
अदालत क्या देखेगी?
क्या किसी दूसरे व्यक्ति को असेसर के रूप में चुना या नियुक्त किया गया था?
क्या आरोपी ने जानबूझकर उसका रूप धारण किया?
क्या उसने उस झूठी पहचान में असेसर के रूप में कार्य किया?
फैसला- ये तत्व सिद्ध होने पर धारा २६८ के तहत कार्रवाई हो सकती है।
समझें: न्यायिक प्रक्रिया में असेसर की पहचान महत्वपूर्ण है। दूसरे व्यक्ति का रूप धरकर असेसर के रूप में कार्य करना न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता को प्रभावित करता है।
केस स्टडी – २: ‘जमानत के बाद अदालत से गैरहाजिर’ (धारा २६९)
एक आरोपी को जमानत पर इस शर्त के साथ छोड़ा गया कि वह निर्धारित तारीख पर अदालत में उपस्थित होगा। उसे तारीख की जानकारी थी, फिर भी वह पर्याप्त कारण के बिना अदालत में उपस्थित नहीं हुआ।
अदालत क्या देखेगी?
क्या आरोपी जमानत या बंधपत्र पर रिहा हुआ था?
क्या उसे निर्धारित समय और स्थान पर उपस्थित होना था?
क्या वह पर्याप्त कारण के बिना उपस्थित नहीं हुआ?
फैसला- आवश्यक तत्व सिद्ध होने पर धारा २६९ के तहत कार्रवाई हो सकती है।
समझें: जमानत पर रिहाई के साथ अदालत में उपस्थित होने का कानूनी दायित्व जुड़ा होता है। बिना पर्याप्त कारण उस दायित्व का पालन न करना अलग अपराध बन सकता है।
केस स्टडी – ३: ‘सार्वजनिक उपद्रव’ (धारा २७०)
एक कारखाने से लगातार ऐसा जहरीला धुआं और दुर्गंध छोड़ी जा रही थी, जिससे आसपास रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य और सामान्य जीवन पर असर पड़ रहा था तथा सार्वजनिक क्षेत्र का उपयोग असुरक्षित हो गया था।
अदालत क्या देखेगी?
क्या आरोपी के कृत्य या अवैध चूक से जनता या आसपास रहने वाले लोगों को सामान्य क्षति, खतरा या परेशानी हुई?
क्या सार्वजनिक अधिकार का उपयोग करने वाले लोगों को बाधा, खतरा या परेशानी हुई?
क्या मामला केवल किसी एक व्यक्ति की निजी असुविधा के बजाय सार्वजनिक प्रभाव वाला था?
फैसला- आवश्यक तत्व सिद्ध होने पर यह धारा २७० के तहत सार्वजनिक उपद्रव माना जा सकता है।
समझें: हर निजी परेशानी सार्वजनिक उपद्रव नहीं है। इसका प्रभाव जनता या आस-पास रहने अथवा सार्वजनिक अधिकार का उपयोग करने वाले लोगों पर होना चाहिए। केवल यह कहना बचाव नहीं है कि उस उपद्रव से कुछ सुविधा या लाभ भी पैदा हुआ।
धारा २६८ से २७० का संदेश साफ है—न्यायिक प्रक्रिया में झूठी पहचान, जमानत की शर्त के बावजूद अदालत से गैरहाजिरी और जनता के लिए नुकसान या खतरा पैदा करने वाला उपद्रव कानून की नजर में गंभीर विषय हैं।
(अगले अंक में: धारा २७१, २७२ और २७३ – जीवन के लिए खतरनाक बीमारी का संक्रमण फैलाने की आशंका वाला लापरवाह कृत्य, ऐसा संक्रमण फैलाने वाला दुर्भावनापूर्ण कृत्य तथा क्वारंटीन नियमों की अवहेलना से जुड़े अपराधों को सरल उदाहरणों से समझेंगे।)
