-तौसीफ कुरैशी
दुनिया की राजनीति में बदलाव हमेशा शोर मचाकर नहीं आता। कभी-कभी वह उन दरवाजों से दाखिल होता है, जिन्हें नफरत की राजनीति करनेवाले लोगों ने हमेशा के लिए बंद समझ लिया होता है। कभी वह संसद के चुनाव में दिखाई देता है, तो कभी सत्ता के समीकरण में और कभी उस समाज के पैâसले में, जिसे वर्षों तक धर्म और पहचान के नाम पर डराया गया हो। आज दुनिया के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इस्लामोफोबिया की राजनीति अपनी चमक खो रही है? क्या धर्म के आधार पर समाज को बांटने और मुसलमानों को संदेह की निगाह से देखनेवाली विचारधारा को जनता जवाब देने लगी है? दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से आ रही राजनीतिक खबरें कम से कम इस सवाल पर गंभीर बहस की मांग जरूर करती हैं। भारत में नफरत की राजनीति को अपना आदर्श माननेवालों को भी दुनिया के बदलते मिजाज को समझना होगा या समझना चाहिए, न समझे उनकी मर्जी। क्योंकि लोकतंत्र में किसी एक विचारधारा का स्थायी कब्जा नहीं होता। जनता जब फैसला करती है तो बड़े-बड़े राजनीतिक किले भी ढह जाते हैं। संघियों के फादरलैंड इजरायल का ताजा चुनाव इस लिहाज से बेहद दिलचस्प है। जिस देश को इस्लामोफोबिया की राजनीति का सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय केंद्र माना जाता है या है, वहां अरब मूल के राजनीतिक दलों ने इतिहास में पहली बार १२० सदस्यीय संसद में १९ सीटें हासिल की हैं। नेतन्याहू के गठबंधन को ५३ सीटें मिलीं, जबकि उसके विरोधी खेमे को ४८ सीटें मिली हैं। सरकार बनाने के लिए ६१ सीटों की जरूरत है। यानी अरब दलों के समर्थन के बिना सरकार बनाने का रास्ता बेहद मुश्किल हो गया है। यह महज सीटों का गणित नहीं है। यह उस राजनीतिक हकीकत का आईना है।
जिसमें अरब नागरिकों की भागीदारी और उनकी राजनीतिक ताकत को अब नजरअंदाज करना आसान नहीं रह गया है और विडंबना देखिए कि नेतन्याहू की पार्टी ने चुनाव में अरब दलों की सफलता के बाद विदेशी मदद और चुनाव में गड़बड़ी के आरोप लगाए, जबकि दुनियाभर में अपनी गलाजत से फसाद करानेवाला भी जब इस तरह के आरोप लगाए तो हंसी आती है। चुनाव अधिकारियों के मुताबिक, व्यवस्थित धांधली के आरोपों को साबित करनेवाला कोई आधार सामने नहीं आया। यहां एक सवाल उठता है। जिस मोसाद की खुफिया क्षमता और पेगासस जैसी निगरानी तकनीक का दुनियाभर में इतना ढिंढोरा पीटा जाता है, उस देश की राजनीति में अरब मतदाताओं की इतनी बड़ी ताकत उभरने पर क्या कोई तकनीक लोकतांत्रिक जनादेश को रोक सकती है? तकनीक अपनी जगह है, खुफिया एजेंसियां अपनी जगह, लेकिन लोकतंत्र में आखिरकार मतदाता का पैâसला ही निर्णायक होता है। भारत में भी इस घटनाक्रम से सबक लेने की जरूरत है। संघियों के फादरलैंड इजरायल को अपना वैचारिक आदर्श बतानेवालों को समझना चाहिए कि किसी देश की तकनीकी ताकत या उसकी खुफिया एजेंसी को आदर्श मान लेना और उसके लोकतांत्रिक अनुभव से सीखना दो अलग-अलग बातें हैं। किसी भी देश की विदेश नीति, सुरक्षा नीति और लोकतांत्रिक व्यवस्था को अलग-अलग कसौटियों पर देखना चाहिए।
नफरत की राजनीति का सबसे बड़ा संकट
इस्लामोफोबिया केवल मुसलमानों के खिलाफ पूर्वाग्रह का नाम नहीं है। यह एक ऐसी राजनीतिक मानसिकता है, जो पूरे समुदाय को एक ही तराजू पर तौलती है। किसी व्यक्ति के अपराध को पूरे धर्म का अपराध बना देती है। किसी कट्टरपंथी की गलती को करोड़ों शांतिप्रिय लोगों की पहचान बना देती है। यही मानसिकता समाज में अविश्वास पैदा करती है और लोकतंत्र की बुनियाद कमजोर करती है। जबकि हकीकत में कुछ नहीं होता सब सत्ता में बने रहने के लिए होता है, अफसोस की बात यह है कि कभी-कभी सही और सत्ता के विरोधी भी इसी मानसिकता के शिकार हो जाते हैं। सोशल मीडिया पर सरकार के खिलाफ बेबाक लिखनेवाले कुछ बड़े नाम जब इस्लाम या मुसलमानों की बात करते हैं तो उनकी भाषा में भी वही घृणा दिखाई देने लगती है, जिसकी वे दूसरे मुद्दों पर आलोचना करते हैं। कोई इस्लाम की दुर्गति लिखता है, कोई मुसलमानों को पिछड़ा बताता है, कोई अरबी भेड़ कहता है तो कोई रेगिस्तानी बर्बर संस्कृति का तंज कसता है। सवाल यह है कि सत्ता से असहमति रखने वाला व्यक्ति अगर किसी धर्म के करोड़ों अनुयायियों के प्रति अपमानजनक भाषा इस्तेमाल करने लगे तो फिर उसमें और नफरत की राजनीति करने वालों में फर्क क्या रह जाएगा? आलोचना का अधिकार सबको है। इस्लाम की भी आलोचना हो सकती है, हिंदू धर्म की भी, ईसाई धर्म की भी और यहूदी धर्म की भी। लेकिन आलोचना और अपमान के बीच एक महीन मगर बेहद जरूरी अंतर है। किसी धार्मिक मान्यता पर सवाल उठाना बौद्धिक स्वतंत्रता है, लेकिन उसके अनुयायियों को नीचा दिखाना स्वतंत्रता नहीं, पूर्वाग्रह है।
लोकतंत्र का रास्ता नफरत से नहीं निकलता
दुनिया के पिछले कुछ वर्षों के चुनावी घटनाक्रम पर नजर डालिए। ब्रिटेन में कंजर्वेटिव पार्टी के १४ साल के शासन का अंत हुआ। बोत्सवाना में लगभग छह दशक पुरानी सत्ता बदली। दक्षिण कोरिया में मतदाताओं ने सत्तारूढ़ दल को झटका दिया। ब्राजील में भी दक्षिणपंथी सत्ता को जनता ने बाहर का रास्ता दिखाया था। हर देश के चुनाव में अर्थव्यवस्था, बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार, सामाजिक अधिकार और नेतृत्व जैसे अनेक सवाल निर्णायक होते हैं। फिर भी इन परिणामों से इतना जरूर समझा जा सकता है कि कोई भी विचारधारा जनता की स्थायी जागीर नहीं होती। अमेरिका में भी मुस्लिम प्रतिनिधित्व और राजनीतिक भागीदारी पर नई बहसें सामने आई हैं। यह लोकतंत्र की खूबसूरती है कि किसी नागरिक की राजनीतिक हैसियत उसके धर्म से तय नहीं होनी चाहिए। वह अपनी योग्यता, विचार और जनता के विश्वास के आधार पर आगे बढ़े। भारत जैसे बहुधर्मी और बहुसांस्कृतिक देश के लिए तो यह संदेश और भी महत्वपूर्ण है। यहां हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और दूसरे समुदाय सदियों से साथ रहते आए हैं आगे भी रहेंगे, नफरती नाकाम होंगे। भारत की ताकत उसकी विविधता ही है, किसी एक समुदाय की दूसरे पर श्रेष्ठता नहीं। इसलिए सोशल मीडिया पर लिखनेवालों, राजनीतिक दलों, सत्ता के समर्थकों और विरोधियों सभी को आत्ममंथन करना चाहिए। आप सरकार की आलोचना कीजिए, धर्म की मान्यताओं पर सवाल उठाइए, धार्मिक संस्थाओं की गलतियों को उजागर कीजिए, लेकिन किसी समुदाय की गरिमा को चोट पहुंचाकर अपनी वैचारिक लड़ाई को कमजोर मत कीजिए। आखिर में बात इतनी सी है कि दुनिया किसी धर्म विशेष के खिलाफ नफरत को लोकतंत्र का विकल्प मानने के लिए तैयार नहीं हो सकती। संघियों के फादरलैंड इजरायल के चुनाव ने कम से कम यह दिखाया है कि वहां के अरब नागरिकों की आवाज अब सरकार बनाने के समीकरण में निर्णायक हो सकती है। भारत में नफरत की राजनीति को अपना भविष्य समझने वालों को भी यह संदेश पढ़ लेना चाहिए और नही पढ़ना चाहें तो मत पढ़ें, नस्लों का भविष्य अंधकारमय बनने से रोक पाना मुश्किल हो जाएगा। लोकतंत्र में जनता ही मालिक है। आज वह किसी को सत्ता देती है तो कल उससे सत्ता छीन भी सकती है। इसलिए वक्त रहते सुधर जाइए। धर्म को आगे कर राजनीति की जा सकती है, लेकिन देश नहीं बनाया जा सकता। नही सुधरना चाहते तो मत सुधरो, वक्त के थपेड़े खुद सुधार देंगे।
सत्यमेव जयते
