हिंदुस्तान की वायुसेना में लड़ाकू विमानों की भीषण किल्लत पैदा होने की खबर हर देशवासी की चिंता बढ़ाने वाली है। फिर, लड़ाकू विमानों की इस तीव्र तंगी की जानकारी किसी ऐरे-गैरे ने नहीं दी है। हमारी ही वायुसेना के सेवानिवृत्त एयर चीफ मार्शल ए. पी. सिंह ने लड़ाकू विमानों की इस किल्लत की वास्तविकता देश के सामने रखी है। ए. पी. सिंह हाल ही में वायुसेना प्रमुख के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं और सेवानिवृत्ति से पहले ही उन्होंने वायुसेना के बेड़े में लड़ाकू विमानों की कमी की ओर देश का ध्यान आकर्षित किया है। सेवानिवृत्त वायुसेना प्रमुख ने जो कड़वा सच देश के सामने रखा, वह न केवल चिंताजनक है, बल्कि दहला देने वाला है। देश के रक्षा क्षेत्र में हलचल मचाने वाली यह संवेदनशील जानकारी वायुसेना प्रमुख को सार्वजनिक रूप से बतानी पड़ रही है, यह बात केंद्र की मोदी सरकार के लिए शर्मनाक है। प्रधानमंत्री मोदी खुद को ‘चौकीदार’ वगैरह कहते हैं, भारत के दुश्मन देशों को ‘लाल आंखें’ दिखाने की भाषा बोलते हैं; लेकिन जिस रक्षा तैयारियों के दम पर हम ये डींगें मारते हैं, उस रक्षा क्षेत्र की आज क्या हालत हो गई है, इस ओर ध्यान देना ‘चौकीदार’ का कर्तव्य नहीं है क्या? चीन और पाकिस्तान जैसे दुश्मन सदैव भारत का बुरा करने की ताक में बैठे हैं, ऐसे में वायुसेना में लड़ाकू विमानों की प्रचंड किल्लत पैदा हो रही हो तो देश की सुरक्षा को खतरा पैदा नहीं होता क्या? सेवानिवृत्त वायुसेना प्रमुख ने बताया कि, ‘भारतीय वायुसेना की जरूरत हर साल ३६ से ४० लड़ाकू विमान की है। ये विमान वायुसेना के विस्तार के लिए नहीं, बल्कि वायुसेना के बेड़े में
गिरती जा रही संख्या
को रोकने के लिए अत्यावश्यक हैं’। हमारे पास लड़ाकू विमानों की संख्या कम होती जा रही है, जबकि दूसरी ओर पाकिस्तान ‘जे-३५’ जैसे पांचवें जेनरेशन के स्टील्थ विमान चीन से हासिल करने का प्रयास कर रहा है। इस पर भी सेवानिवृत्त वायुसेना प्रमुख ने गहरी चिंता व्यक्त की। पाकिस्तान वायुसेना की ताकत बढ़ा रहा है और हम रक्षा तैयारियों में पिछड़ रहे हैं, तो यह देश की सुरक्षा के दृष्टिकोण से भविष्य में घातक साबित हो सकता है। वायुसेना की आधिकारिक स्वीकृत लड़ाकू स्क्वाड्रन संख्या ४२ है। हालांकि, यह संख्या घटकर लगभग ३० स्क्वाड्रन पर आ गई है। प्रत्येक लड़ाकू स्क्वाड्रन में १८ से २० विमान होते हैं। इस आंकड़े को ध्यान में रखते हुए वायुसेना के पास आज की तारीख में २४० से २७० लड़ाकू विमानों की कमी है। यह किल्लत सामान्य नहीं है। लेकिन एयर चीफ मार्शल ए. पी. सिंह जैसा कहते हैं, उस हिसाब से हर साल ३६ से ४० विमान लाएंगे कहां से? क्योंकि वायुसेना द्वारा ऑर्डर दर्ज कराने के बाद समय पर उत्पादन होकर वास्तव में वायुसेना को लड़ाकू विमान मिलने में कई साल लग जाते हैं। नए विमान समय पर नहीं मिलते और दूसरी तरफ वायुसेना के पुराने विमान सेवानिवृत्त होते जाते हैं। इसलिए दिन-प्रतिदिन लड़ाकू विमानों और स्क्वाड्रन की संख्या घटती जा रही है। रक्षा मंत्रालय ने भारतीय निर्मित ‘तेजस- एमके १ ए’ लड़ाकू विमानों के लिए एचएएल के साथ ६२ हजार ३७० करोड़ का करार किया। इसके अनुसार ६८ लड़ाकू और २९ दो सीटों वाले, ऐसे ९७ विमान वायुसेना को मिलेंगे; लेकिन इसमें
बहुत विलंब
हो रहा है। हर साल ३६ से ४० नए विमान शामिल होना आवश्यक है, जबकि उत्पादन क्षमता बमुश्किल २४ तक ही बढ़ पाई है। वह अपर्याप्त है। इस तंगी को दूर करने के लिए ११४ ‘राफेल’ विमानों का प्रस्तावित करार और रूसी निर्मित ‘एसयू-३०’ विमान खरीद जल्द से जल्द पूरा हो, तभी वायुसेना को हर साल आवश्यक ३५ से ४० लड़ाकू विमानों की जरूरत पूरी हो सकती है। आज की स्थिति में भारत के पास बमुश्किल ६०० लड़ाकू विमान हैं। इसमें ‘राफेल’, ‘सुखोई’, ‘मिग-२९’ और ‘तेजस’ ये चार विमान शामिल हैं। इसकी तुलना में चीन के पास भारत से तीन गुना अधिक यानी १८१४ लड़ाकू विमान हैं। इसके अलावा ‘जे-२०’ जैसे पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों से चीनी वायुसेना की सामर्थ्य प्रचंड बढ़ी है। पाकिस्तान के पास भी ‘जेएफ-१७ थंडर’, ‘एफ-१६’ और चीनी निर्मित अन्य लड़ाकू विमानों का पर्याप्त भंडार है। पाकिस्तान और चीन ये दोनों देश हाथ में हाथ डालकर हिंदुस्तान के खिलाफ अपनी सैन्य ताकत बढ़ाते जा रहे हैं। हाल ही में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान भारत को एक ही समय में पाकिस्तानी वायुसेना और चीनी तकनीक का सामना करना पड़ा था। यह स्थिति देखते हुए भविष्य में भारत को एक ही समय में चीन और पाकिस्तान के साथ दो अलग-अलग मोर्चों पर युद्ध करना पड़ सकता है। इन चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए भारतीय वायुसेना को सक्षम बनाना आवश्यक है। लेकिन वायुसेना का सामर्थ्य बढ़ाने के बजाय लड़ाकू विमानों की प्रचंड किल्लत पैदा हो रही है, तो यह देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ है। कल अगर युद्ध छिड़ ही गया तो हमारी वायुसेना कैसे टिक पाएगी? लड़ाकू विमानों की इस तंगी के बारे में सेवानिवृत्त वायुसेना प्रमुख ए. पी. सिंह द्वारा व्यक्त की गई चिंता सरकार के कानों तक पहुंची है क्या?
