-एसआईआर के बाद सरकारी योजनाओं के
लाभ के लिए वोटर कार्ड की शर्त!!
– ‘आधार’ की जगह मतदाता पहचान पत्र इस्तेमाल करने के केंद्रीय मंत्री के बयान से उठे सवाल
– गरीबों को सरकारी योजनाओं से बाहर करने की नई साजिश का आरोप
सामना संवाददाता / नई दिल्ली
पहले एसआईआर के नाम पर मतदाता सूची से करोड़ों लोगों के नाम काटने का विवाद और अब सरकारी योजनाओं का लाभ देने के लिए वोटर कार्ड को पहचान का आधार बनाने का प्रस्ताव! मोदी सरकार के इस नए विचार ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। केंद्रीय मंत्री ललन सिंह ने आधार की जगह वोटर आईडी और बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण से लाभार्थियों की पहचान करने की बात कही है। उनके इस बयान पर विपक्ष ने तीखा हमला बोला है।
कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने सवाल उठाया कि पहले लोगों का वोट देने का अधिकार छीना जा रहा है और अब उन्हें सरकारी योजनाओं के लाभ से भी वंचित करने की तैयारी है। माकपा ने भी इस प्रस्ताव को गरीबों और ग्रामीण आबादी के लिए नई मुसीबत बताया है।
विपक्ष की चिंता बेवजह नहीं है। एसआईआर के दौरान जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से कट गए, वे यदि सरकारी योजनाओं के लिए भी वोटर आईडी पर निर्भर हुए तो उनके सामने दोहरी मुसीबत खड़ी हो सकती है। बुजुर्गों, मजदूरों और ग्रामीणों के बायोमेट्रिक सत्यापन में भी अक्सर दिक्कतें आती हैं। हैरानी यह है कि मंत्री ने अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि कौन-कौन सी योजनाएं इस व्यवस्था के दायरे में आएंगी। सवाल सीधा है कि क्या सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का लाभ अब नागरिकों के मतदाता सूची में नाम होने पर निर्भर करेगा।
क्या वोटर आईडी ही बनेगी राशन,
आवास और स्वास्थ्य सुविधाओं की चाबी?
एसआईआर के बाद अब सरकारी योजनाओं के लाभ के लिए वोटर आईडी अनिवार्य करने की चर्चा ने चिंता बढ़ा दी है। राशन, आवास और स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ भी क्या मतदाता सूची में नाम होने पर निर्भर करेगा? विपक्ष ने सवाल उठाया है कि जिन गरीबों के नाम मतदाता सूची से कट गए, उनका सरकारी हक कौन बचाएगा।
