-क्यूएस एशिया रैंकिंग में लगातार दूसरे साल एक भी भारतीय संस्थान शीर्ष ५० में नहीं; आईआईटी दिल्ली ५९वें से फिसलकर ६६वें स्थान पर
सामना संवाददाता / नई दिल्ली
भारत को वैश्विक शिक्षा और अनुसंधान का केंद्र बनाने के बड़े दावों के बीच अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय रैंकिंग ने चिंता बढ़ा दी है। क्यूएस वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग्स : एशिया २०२७ में लगातार दूसरे वर्ष भारत का एक भी विश्वविद्यालय शीर्ष ५० संस्थानों में जगह नहीं बना पाया है। देश के प्रतिष्ठित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान और भारतीय विज्ञान संस्थान भी इस सूची से बाहर हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत का सर्वोच्च स्थान प्राप्त संस्थान आईआईटी दिल्ली पिछले वर्ष के ५९वें स्थान से गिरकर ६६वें स्थान पर पहुंच गया है। इससे एशिया के प्रमुख विश्वविद्यालयों के मुकाबले भारतीय संस्थानों की स्थिति पर सवाल उठ रहे हैं।
शोध में दम, समग्र रैंकिंग में पीछे!
रिपोर्ट का एक दिलचस्प पहलू यह है कि शोध उत्पादन और पीएचडी योग्य शिक्षकों की उपलब्धता जैसे कुछ मानकों पर भारतीय विश्वविद्यालयों का प्रदर्शन मजबूत है। प्रति शिक्षक शोध उत्पादन और डॉक्टरेट योग्यता वाले कर्मचारियों के मामले में एशिया के शीर्ष संस्थानों में भारत की उल्लेखनीय उपस्थिति है।
इसके बावजूद समग्र रैंकिंग में भारतीय संस्थान पीछे हैं। इसका अर्थ है कि केवल शोधपत्रों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। अंतरराष्ट्रीय शोध सहयोग, शैक्षणिक प्रतिष्ठा, नियोक्ताओं की राय, शिक्षक-छात्र अनुपात और अन्य गुणवत्ता मानकों पर भी ध्यान देना आवश्यक है। भारत में उच्च शिक्षा का तेजी से विस्तार हुआ है। नए विश्वविद्यालय और संस्थान स्थापित हुए हैं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में उनकी स्थिति का मूल्यांकन भी जरूरी है। हालांकि, किसी एक रैंकिंग को शिक्षा की गुणवत्ता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता। विभिन्न रैंकिंग संस्थाओं की पद्धतियां अलग होती हैं और उनके परिणाम भी भिन्न हो सकते हैं।
