मुख्यपृष्ठस्तंभचुनाव आयोग में तबादलों की आंधी, निष्पक्षता पर उठते सवाल!

चुनाव आयोग में तबादलों की आंधी, निष्पक्षता पर उठते सवाल!

लोकतंत्र की मजबूती केवल निष्पक्ष चुनाव कराने से नहीं, बल्कि चुनाव कराने वाली संस्था की निष्पक्षता पर जनता का भरोसा कायम रखने से भी तय होती है। ऐसे में जब मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर देश के विभिन्न हिस्सों में असंतोष सामने आ रहा है और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार तथा निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं, तब आयोग के भीतर बड़े पैमाने पर हुए प्रशासनिक फेरबदल गंभीर विचार की मांग करते हैं।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, वर्ष २०२५ और २०२६ के दौरान विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मुख्य निर्वाचन अधिकारियों (सीईओ) के लगभग १८ से २० तबादले हुए। फरवरी २०२५ में ज्ञानेश कुमार के मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभालने के बाद सामने आया यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि आयोग सामान्यत: प्रशासनिक निरंतरता के लिए सीईओ को एक पद पर कम से कम तीन वर्ष तक बनाए रखने की नीति अपनाता है। इसके बावजूद तबादला किए गए अधिकारियों में कम से कम सात ऐसे बताए गए हैं, जिन्होंने दो वर्ष भी पूरे नहीं किए थे।
बिहार में एसआईआर की प्रक्रिया शुरू होने से पहले अप्रैल २०२५ में हुए बदलावों के बाद नगालैंड, छत्तीसगढ़, जम्मू-कश्मीर, हरियाणा, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, मणिपुर और लद्दाख सहित कई क्षेत्रों में अधिकारियों को बदला गया। वर्ष २०२६ में भी पंजाब, दिल्ली, गुजरात, सिक्किम और चंडीगढ़ में फेरबदल हुए। लक्षद्वीप में तो नवंबर २०२५ से अक्टूबर २०२६ के बीच तीन अलग-अलग सीईओ रहे। यह स्थिति प्रशासनिक स्थिरता और चुनावी तैयारियों की निरंतरता को लेकर सवाल खड़े करती है। हालांकि, केवल तबादलों की संख्या के आधार पर निर्वाचन आयोग की मंशा पर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। प्रशासनिक जरूरतों, अधिकारियों की उपलब्धता और चुनावी परिस्थितियों के कारण बदलाव आवश्यक भी हो सकते हैं।
लेकिन जब ऐसे फैसले लगातार हों और उनका स्पष्ट सार्वजनिक स्पष्टीकरण सामने न आए, तो संदेह और अविश्वास को जगह मिलती है। चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है।
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार के मई २०२२ से फरवरी २०२५ तक के कार्यकाल में लगभग १३ सीईओ के तबादले हुए थे। वहीं सुनील अरोड़ा और सुशील चंद्रा के कार्यकालों में लगभग २९ तबादलों का उल्लेख रिपोर्ट में है। इन आंकड़ों की तुलना करते समय अलग-अलग कार्यकालों की अवधि, चुनावी परिस्थितियों और प्रशासनिक आवश्यकताओं को भी ध्यान में रखना जरूरी है। आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि कितने अधिकारियों का तबादला हुआ, बल्कि यह है कि इन पैâसलों के पीछे क्या स्पष्ट और समान मानदंड अपनाए गए। एसआईआर जैसी संवेदनशील प्रक्रिया में मतदाता सूची की शुद्धता, पात्र नागरिकों के मताधिकार की सुरक्षा और शिकायतों का निष्पक्ष निपटारा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।

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