मुख्यपृष्ठस्तंभझांकी: मुख्यमंत्री, इनकी कब सुनोगे?

झांकी: मुख्यमंत्री, इनकी कब सुनोगे?

अजय भट्टाचार्य

हाल ही में महाराष्ट्र सरकार ने प्रभादेवी स्थित श्री सिद्धिविनायक मंदिर के कॉरिडोर विकास के लिए ५०० करोड़ की योजना मंजूर की है। यह बहुत अच्छी बात है, लेकिन इसी श्री सिद्धिविनायक मंदिर के पास बसी पुरुषोत्तम वाडी के रहने वाले पिछले चार साल से अपने घरों से बाहर रह रहे हैं। पुनर्विकास और दूसरे लंबित मामलों की वजह से, यहां के कई परिवारों को अपने खर्चे पर कहीं और रहना पड़ रहा है। पैसे, दिमागी और सामाजिक मुश्किलें झेलने के बाद भी, इस मसले का कोई पक्का हल नहीं निकला है। कुछ लोगों ने इस गंभीर हालात की तरफ प्रशासन और उससे जुड़ी एजेंसियों का ध्यान खींचने के लिए इलाके में बैनर लगाए थे। कुछ समय बाद मुंबई महानगरपालिका में किसी के शिकायत करने पर सिर्फ इन बैनरों को हटाने का एक्शन लिया गया। यहां के निवासियों की समस्या आज भी वैसी ही है। मुख्यमंत्री इनकी कब सुनोगे!
मुस्कुराइए, आप कैमरे पर हैं
गांधीनगर में मंत्रियों के दफ्तर आने वाले लोग मीटिंग के बाद फोटो खिंचवाने के आदी हो चुके हैं। चूंकि मंत्रियों के दफ्तर के अंदर आमतौर पर मोबाइल फोन ले जाने की इजाजत नहीं होती, इसलिए वहां सरकारी फोटोग्राफर का दिखना आम बात है। हालांकि, एक युवा मंत्री ने इसे एक कदम और आगे बढ़ा दिया है। अब हर आने-जाने वाले का वीडियो बनाया जाता है और रिकॉर्डिंग को डिजिटल रूप में संरक्षित किया जाता है। क्यों? यह शायद सिर्फ मंत्री ही जानते हैं। यहां तक कि स्टाफ के लोग भी इस नए तरीके के मकसद को लेकर उलझन में हैं। जैसा कि एक वरिष्ठ कर्मचारी ने मुस्कुराते हुए कहा: `बॉस हमेशा सही होते हैं।’
ये जश्न किसलिए
जलडमरूमध्य में भारतीय मालवाहक पोतों पर तैनात भारत के तीन नाविक हमले में मार दिए गए। असम में हुई एक दुर्घटना में भारतीय वायुसेना के पांच सैनिक शहीद हो गए। ये दोनों घटनायें राष्ट्रीय शोक से कम नहीं हैं। संयोग से भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री इन दिनों विदेश यात्रा पर हैं और जो उनके विदेश भ्रमण के चित्र आ रहे हैं, उनमें उन्हें जश्न मनाते देखा जा सकता है। किस बात का जश्न है ये? मना किया जा सकता था कि मौका ठीक नहीं है। जरूरी विदेश है तो सादगी से होने दें। शासन सत्ता की भी कोई संवेदनशीलता होती है! खैर! ऐसी कोई तस्वीर अगर नेता विपक्ष राहुल गांधी की आ जाती तो गोदी चैनल रुदाली कर रहे होते!
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं तथा व्यंग्यात्मक लेखन में महारत रखते हैं।)

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