मनमोहन सिंह
कांग्रेस और आप में आज भी सिरफुटव्वल
२१ जून को जब कांग्रेस नेता शक्तिसिंह गोहिल का राज्यसभा का कार्यकाल खत्म होगा, तो गुजरात के इतिहास में एक अनोखा दौर शुरू होगा। १९६० में राज्य बनने के बाद यह पहली बार होगा जब राज्यसभा में गुजरात से विपक्ष का एक भी सांसद नहीं होगा। राज्य की सभी ११ राज्यसभा सीटें अब अकेले भारतीय जनता पार्टी के पास होंगी।
यह बदलाव किसी अचानक आए राजनीतिक भूचाल से नहीं, बल्कि चुनावी गणित का नतीजा है। गुजरात में साल १९९५ से लगातार बीजेपी की हुकूमत है। साल २०२२ के विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने रिकॉर्ड तोड़ते हुए १८२ में से १५६ सीटें जीतीं। इस ऐतिहासिक जीत ने विपक्ष को पूरी तरह समेट दिया।
विपक्ष का संकट और अंदरूनी लड़ाई
नियम के मुताबिक, विधानसभा में आधिकारिक विपक्ष का दर्जा पाने के लिए कम से कम १८ सीटों की जरूरत होती है। लेकिन कांग्रेस सिर्फ १७ सीटों पर सिमट गई और आम आदमी पार्टी को ५ सीटें मिलीं। मौजूदा वक्त में बिखरा हुआ विपक्ष इस स्थिति में भी नहीं है कि राज्यसभा के लिए अपना एक भी उम्मीदवार खड़ा कर सकें।
शक्तिसिंह गोहिल संसद में गुजरात के किसानों और आम जनता के मुद्दों को मजबूती से उठाते रहे हैं। उनके जाने के बाद, संसद में गुजरात से विपक्ष की इकलौती आवाज सिर्फ गेनीबेन ठाकोर रह जाएंगी, जिन्होंने २०२४ के लोकसभा चुनाव में बनासकांठा से जीत हासिल की थी। यानी अब पूरे संसद में गुजरात से विपक्ष का सिर्फ एक लोकसभा सांसद होगा और राज्यसभा में शून्य।
इस खालीपन के बीच, एक अजीब सी जंग छिड़ी हुई है। आम आदमी पार्टी और कांग्रेस आपस में ही इस बात की लड़ाई लड़ रहे हैं कि राज्य का असली विपक्ष कौन है। ‘आप’ का मानना है कि वो कांग्रेस की जगह ले सकती है, जबकि कांग्रेस के पास सालों का तजुर्बा और संगठन है। इस आपसी लड़ाई का सीधा फायदा सत्ताधारी पार्टी को मिल रहा है।
लोकतंत्र के सामने सवाल
बीजेपी का यह दबदबा एक हकीकत है, लेकिन बिना विपक्ष की यह सूरत कई गंभीर सवाल खड़े करती है। एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में जब किसी बड़े राज्य की पूरी आवाज सिर्फ एक ही पार्टी के जरिए तय होने लगे, तो जनता के हक की लड़ाई कौन लड़ेगा? सरकार के पैâसलों पर सवाल कौन उठाएगा? यह एक ऐसा सवाल है जिसका असर किसी पार्टी से ऊपर उठकर पूरे लोकतांत्रिक ताने-बाने पर पड़ता है।
