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वास्तु के अनुसार दिशा बदलने से नहीं…लाभ तो स्वयं को बदलने से ही होगा- श्री हरि चैतन्य महाप्रभु

-ढोंग, पाखंड, अंधविश्वास व रूढ़िवादिताओं पर महाराज श्री ने किया तीखा प्रहार

सामना संवाददाता / मुंबई

प्रेमावतार, युगदृष्टा, श्री हरि कृपा पीठाधीश्वर व विश्व विख्यात संत श्री श्री 1008 स्वामी श्री हरि चैतन्य पुरी जी महाराज ने आज यहां चेंबूर में उपस्थित विशाल भक्त समुदाय को संबोधित करते हुए कहा कि रोग, शोक, भय, चिंता, अशांति आदि के कारण खोज कर दूर करो तो उपाय निष्फल नहीं होंगे। ढोंग, पाखंड, अंधविश्वास, रूढ़िवादिताओं पर महाराज श्री ने तीखा प्रहार किया। आज वास्तु शास्त्र के बढ़ते प्रचलन के बारे में कहा कि लोग आज वास्तु के अनुसार तोड़फोड़ कर मकान की दिशा बदलते हैं, लाभ तो स्वयं को बदलने से ही होगा। भाग्य-भाग्य का रोना रोने से कुछ नहीं होने वाला। अनेक अंगूठियां व नग पहनने व वार, दिशा के हिसाब से करने मात्र से कुछ नहीं होता। सही दिशा में प्रयास, हृदय से परमात्मा का स्मरण, यथासंभव सभी की शुभकामनाओं व शुभाशीर्वाद कार्य के प्रति लगन, निष्ठा व उत्साह सफलता में सहायक होंगे। उन्होंने परिवार, नगर, राष्ट्र व समाज में आपस में मिलजुल कर प्रेम, एकता व सद्भाव को बनाए रखने में बनाए रखने व बढ़ावा देने पर बल दिया।
उन्होंने कहा कि मानव मन को धर्म व अध्यात्म से ही नियंत्रित किया जा सकता है। इसलिए धर्म विहीन मनुष्य को पशु तुल्य कहा गया है। आज लोगों के धर्म से भी विमुख होने के कारण ही मानवता की कमी भी दिखाई देने लगी है। हमें समाज को बदलने के लिए लोगों की दृष्टि बदलने की आवश्यकता है। किसी को सुधारने से पहले स्वयं को सुधारना चाहिए। उन्होंने कहा कि बदले की भावना से वैर, क्षमा से प्रेम बढ़ता है। क्षमा कायरों का नहीं वीरों का आभूषण है। यदि सतंता के मार्ग पर बढ़ना चाहे तो अपने अंदर क्षमा, करुणा, उदारता, कृपा आदि सद्गुणों को अपनाएं। जीवन-मरण, हानि-लाभ, सुख-दुख के कर्ता-धर्ता प्रभू ही हैं। प्रभु का नाम पाप धोने वाली गंगा, विष-वैर मिटाने वाला अमृत, दुर्जन को सज्जन बनाने वाली तंत्र, मोक्ष मिलने के मंत्र, भवसागर से पार उतारने वाली नौका व स्वर्ग जाने की सीढ़ी है। उन्होंने कहा कि जो आंखें विषय वासना, सांसारिक मोहमाया में फंसी है। उन्हें परमात्मा नहीं दिखाई देते तथा जब संसार नहीं दिखता तो प्रभू दिखते हैं। संतों, शास्त्रों व अवतारों को मात्र अपनी कमियां छुपाने की ढाल ही ना बनाएं। उनसे प्रेरणाएं, शिक्षाएं व उपदेश भी ग्रहण करके अपने जीवन में उतारकर जीवन को दैवत्व परिपूर्ण बनाए। विचार शील प्राणी कभी भी किसी भी हाल में धर्म व परमात्मा का साथ कदापि भी नहीं छोड़ता। यूं भी धैर्य, धर्म, मित्र व नारी इन चारों की परीक्षा विपत्ति के समय होती है। कब कौन सी बुद्धि उजागर हो जाए कोई कुछ कह नहीं सकता, हां अच्छे संग से सुमति व बुरे संग से कुमति ही उत्पन्न होगी।
अपने धाराप्रवाह प्रवचनों से उन्होंने सभी भक्तों को मंत्रमुग्ध व भावविभोर कर दिया। सारा वातावरण भक्तिमय हो गया व “श्री गुरु महाराज, कामां के कन्हैया व लाठी वाले भैय्या ” की जय जयकार से गूंज उठा।

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