मुख्यपृष्ठस्तंभभोजपुरिया व्यंग्य : रुपइया से अधिक हमनी गिरल जात हईं

भोजपुरिया व्यंग्य : रुपइया से अधिक हमनी गिरल जात हईं

प्रभुनाथ शुक्ल, भदोही

दुनिया में सबसे बड़ा खेल अगर कहीं चलत बा, त उ रुपइया बनाम डॉलर के कुश्ती। रुपइया बेचारा इधर से उधर गिरत-लुढ़कत अउर फिसलत जा रहल बा, आ नेता लोग के बयान सुनीं, त लागेला जइसे रुपइया ना नेताजी खुद गिर रहल बाड़े। ऊ मुस्कुरा के कहत बाडे रुपइया गिरल त का भइल, उ त कागज ह, पंख लगल त उड़ियो जाई। विपक्ष वाले त उहे बात पर खूब खींचाई करत बाड़े। नेताजी कहत बाड़े की सगरेजहां में रूपईया के डंका बज रहल हौ।
मगर साँच बात त ई बा कि रुपइया से जादे त हमनीए हर रोज गिरत बानी। रुपइया बजार में गिरेला, आ हमनी घर, गली, चौराहा, फेसबुक, व्हाट्सऐप में। रुपइया त कम से कम बैंक में गिनाइल जाला, हमनी के गिरल त कोई गिनतियो ना। केहू के भरोसा टूटेला, केहू के दिल, केहू परीक्षा में, केहू इंटरव्यू में, आ नेता लोग त चुनाव में गिरत-गिरत थक जात बा। लेकिन रुपइया पर सबका दया उमड़ेला। नेता लोग कहेला रुपइया गिरल त चिंता काहे के? आउर देश में गिरत बा। अरे भइया, अब गिरल के तुलना घमंड के गोल्डन ट्रॉफी बन गइल बा। अगर अइसने बा त फेर त हमनी सबसे बड़ा विश्वगुरु बा, काहे कि गिरल में हमनी के रिकॉर्ड बा।
अरे भईया छोड़ी, रुपइया गिरल त का होई, उ इंसान ह का, पैर फिसल गइल। ई सुन के त रुपइया खुद बैंक में चहक उठल। धन्य भाग हमार, अब तनिक इंसान हमका भी समझ लेहलस। कुछ लोग त एतना तक कह देहलेस कि रुपइया गिर रहल बा, मगर मने मरजी से। उ स्वतंत्र बा। अरे बाबू, अगर रुपइया इयाद रखीत कि ओकर गिरल से तेल, दाल, नमक, सब्जी के दाम चढ़ेला, त ऊ खुदे दीवाल पकड़ लेत।
भईया कहावत हौ घोड़ा चढ़ी त गिरबो करी, साइकिल चलार्इं त हिलबो करी, नेता भाषण देई त फिसलबो करी। रुपइया गिरेला त बाजार फिसल जाला। रुपईया गिरता त गिरई देव। आ अंत में एक बात कहिला रुपइया त ऊ कागज ह, गिर उठ के अपना कीमत ढूंढ लेला। हमनी त आदमी ह, गिरत-गिरत कब कीमत बढ़े, कब घटे, ई त जाने ऊपरवाला! बाकी रुपइया गिरल पर रोअहीं मत, पहिले अपना गिरल सोचल जाव, त यकीन मान, अर्थव्यवस्था से पहिले मनोदशा सँभरे लागी।

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