राजेश विक्रांत
अमेठी के जाने माने कवि श्री राम लखन त्रिपाठी ‘अकिंचन’ की पुस्तक साहित्यिक सृजन (कोष) को यदि कविताओं का इंद्रधनुष कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी क्योंकि इस पुस्तक में विविध रंगों की कविताएं हैं। कविता के हरेक रंग हैं बजाय इसके कि कवि का मूल स्वर धार्मिक है। उदाहरण के तौर पर मां के चरणों में, वीर वसुंधरा, भरत व्यथा, हिंदी की महिमा, प्रभु श्री राम के चरणों में, राष्ट्र प्रहरी श्री जटायु जी, रत्ना- विरह, दीनों की दशा, वसंत, प्रेम, मीरा स्मृति, वंशी, हवन हो रहा है वतन के लिए, राखी, विदाई, पूज्य ब्रह्मचारी जी की तप स्थली, ग्रामीण प्रवेश, गणतंत्र दिवस, सीमा से सैनिक का खत, शहीदों को श्रद्धांजलि, नव वर्ष की शुभकामना, विद्या धाम, स्वर्गीय श्री असविन्द जी को श्रद्धांजलि, जन्मदिवस, जन्मभूमि को प्रणाम आदि इस पुस्तक में कुल 55 कविताएं हैं। इस पुस्तक का विमोचन पिछले दिनों अवधी साहित्य संस्थान अमेठी के स्थापना दिवस कार्यक्रम में संपन्न हुआ था। उसे मौके पर कवि श्री राम लखन त्रिपाठी अकिंचन को डॉ अर्जुन पांडेय, डॉ राम बहादुर मिश्रा, डॉ अमिता दुबे, प्रोफेसर हेमराज मीणा, जियालाल आर्य आदि साहित्यकारों ने संस्थान की ओर से गोस्वामी तुलसीदास साहित्य सम्मान से सम्मानित भी किया था।
पुस्तक में हिंदी और अवधी के काव्य पुष्प हैं जो अकिंचन की अप्रतिम काव्य प्रतिभा के द्योतक हैं। मां के चरणों में कविता देखिए- मोहि पंथ निहारत बेरि भई, मोरी माई बिलम्ब कहां करती हो।आरत-दीन-अनाथन का, उपकार सदा तुम्हीं करती हो। दीन-मलीन दुःखी अंगहीन की, मातु सहाय तुम्हीं करती हो। पूत कपूत हुआ करते, मातु कृपालु कृपा करती हो। बारी हमार अहै अबकी, मोरी माई बिलम्ब कहां करती हो।
कविता वीर वसुंधरा (राजस्थान) में कवि का विचार दृष्टव्य है- राजाओं की मातृ-भूमि का सादर वन्दन।
कण-कण धूल प्रसाद, यहाँ की माटी चन्दन।शूर-भूमि सिर मौर, तुझे शत बार नमन है।शत-शत कोटि प्रणाम, तुम्हारा अभिनन्दन है।लोहित लाल-लाल माटी, ये मुझे बताती। कितना है बलिदान तुम्हारी पत्थर छाती। राणा-सांगा-वीर पद्मिनी, मीरा की यह माटी। बार-बार वीरत्व जगाती, हल्दी वाली घाटी। जब तक सूरज चांद रहेगा, मानव का इतिहास रहेगा। तब तक जननी इस धरती पर तेरा जय-जयकार रहेगा। जय हिन्द जय भारत।
हिंदी के बारे में कवि ने हिंदी की गरिमा में लिखा है- सूर के सागर से निकसीं, श्री कृष्ण के बेनु पे बाजी थी हिन्दी। रसखान कबीर बिहारी रहीम, मीरा की बीना पे बाजी थी हिन्दी। संत शिरोमणि राम के दास, तुलसी की भाषा की माई थी हिन्दी। जिमि नारि सुशील सुहागिन सुन्दर, भाल के बीच विराजत बिन्दी।
कुल मिलाकर मझवारा, अमेठी के निवासी कवि ‘अकिंचन’ की पुस्तक ‘साहित्यिक सृजन (कोष) एक अद्भुत काव्य पुस्तक है। इस उम्र में भी ( कवि का जन्म 1937 में हुआ था) कवि की ऊर्जा देखने लायक है। पुस्तक को अवधेश नारायण त्रिपाठी ‘पिंटू’ ने प्रकाशित किया है। तकरीबन 50 पृष्ठों की इस पुस्तक की कीमत 101 रुपए है। जो पाठक बेहतरीन कविताओं के शौकीन है उन्हें यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए।
