मुख्यपृष्ठस्तंभब्रजभाषा व्यंग्य: ईंधन बचाओ रील बनाओ

ब्रजभाषा व्यंग्य: ईंधन बचाओ रील बनाओ

नवीन सी. चतुर्वेदी

घुटरू आज के अखबार देखे? कैसे पूरे-पूरे पेज के बिज्ञापन छापे गये हैं? कहां सों आतौ होयगौ इतनों पैसा? मोय तौ लगै है कि दुनिया में जो तेल और गैस की कीमत बढ़ रही हैं नें वा कौ असली कारण यै फुटबॉल कौ महाकुंभ ही न होय!
वा री बत्तो, बड़ी दूर की कौड़ी ढूंढ कें लाई! कहावत यों ही थोरें ही बनी हैं कि ‘मौला करे मदार किसी के सर ऊपर’ और दूसरी वौ कहावत कि ‘तेल तो तिली में से ही निकलेगा भैये’! अब तौ मो कों हू लग रह्यौ है कि फुटबॉल के महाकुंभ कौ खर्चा अपनी जेब’न सों ही बसूल कियौ जाय रह्यौ है!
घुटरू ऐसी ही एक और हू तौ कहावत है नें, वौ बारी कि ‘घर में नहीं है खाने को अम्मा चली जनाने को’! फुटबॉल खेलवे वारे काहू से देस की अर्थ व्यवस्था कों अगर मेग्निफिसेंट ग्लास लगाय कें देखौ जायगौ तौ तू हण्ड्रेड परसेंट मान कें चल कि सब के यहां ‘तीन बुलाये तेरह आये देउ दार में पानी’ जैसे ही हाल दिखंगे! मगर मजाल है काहू के कान पै जूं तक रेंग रही होय! सब के सब दीवाने भये जाय रहे हैं फुटबॉल के महाकुंभ के पीछें मजा तौ तब और आवै जब ये बड़े-बड़े रहीस कर्जगीर देस, गरीब देस’न कों लेक्चर सुनायवे लगें!
हां बत्तो तुलसीदास या मारें ही तौ कह गये हैं कि ‘पर उपदेस कुसल बहुतेरे’! वैसें उपदेस दैवे में नेता लोग’न कौ कोऊ हाथ नांय पकर सवैâ! जब सों ऊर्जा संकट और ईंधन बचायवे की बात चली है कछू नेता तौ बिचारे सच्चऊं पाई पाई बचायवे में न केवल लगे भये हैं बल्कि ईंधन के बचे भये पैसा सों रील बनाय-बनाय कें डार हू रहे हैं! भाई लोग’न कों पतौ तौ चलनों चैंयें कि जो कहा है वो किया भी जा रहा है! और ऐसे त्याग करे कौ का फायदा जा की खबर लोग’न तक पहुंच ही न पावै! ट्रेन की टिकट ही देख लै, बाकयदा लिखौ होवै कि कितनी खैरात दीनी जाय रही है! घुटरू तेरी बात तौ सही है मगर कभू-कभू यों हू लगै है कि अब तौ सत्तर अस्सी साल है गये! और कबतक यै सब चलतौ रहैगौ ?
प्रज्ज्वलित दीप कब करौगे आप
सेर भर घी हू कम परौ है का

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