-हरिगोविंद विश्वकर्मा
लालच बहुत अच्छी चीज है। लालच आदमी के अंदर ऊंची-ऊंची महत्वाकांक्षाएं पैदा करता है। लालच न हो तो आदमी आगे कैसे बढ़ेगा? संतोष को महिमामंडित करनेवाले लोगों ने देश का बहुत नुकसान किया है। वे कहते हैं कि जितना मिले, उसी में संतोष करो। अरे भाई, अब कोई एक रोटी में संतोष कर ले तो चार रोटी कमाने की कोशिश क्यों करेगा? और अगर चार रोटी कमाने की कोशिश नहीं करेगा, तो आठ रोटी वाले के बराबर कैसे पहुंचेगा? इसलिए लालची होना तरक्की की पहली शर्त है।
लालची आदमी कभी खाली नहीं बैठता। वह हमेशा सोचता रहता है। उसे हमेशा कुछ न कुछ चाहिए। अगर नौकरी है तो प्रमोशन चाहिए। प्रमोशन मिल गया तो बड़ी कुर्सी चाहिए। बड़ी कुर्सी मिल गई तो बड़ी गाड़ी चाहिए। गाड़ी मिल गई तो गाड़ी के आगे-पीछे लालबत्ती चाहिए। इसके बाद आदमी बंगले की हसरत करने लगता है। अब बताइए लालच न होती तो वह बंगले की कल्पना करता? नहीं न… इसीलिए आदमी के लालच की इच्छा का सम्मान होना चाहिए! लालच आदमी को फर्श से अर्श तक पहुंचा देता है।
संतोषी आदमी की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह किसी को परेशान नहीं करता। उसे जो मिल गया, उसी में खुश रहता है। न किसी की कुर्सी पर नजर होती है, न किसी की जमीन पर। ऐसा आदमी समाज के लिए घातक है! उसके कारण दूसरे लोगों को मेहनत करने का मौका ही नहीं मिलता। इसके उलट लालची आदमी दूसरों की संपत्ति देखकर प्रेरित होता है। वह सोचता है कि जब पड़ोसी के पास दो मकान हैं तो मेरे पास चार क्यों नहीं हैं? इस तरह पड़ोसी की तरक्की समाज में प्रतिस्पर्धा बनाए रखती है। पड़ोसी न हो तो आदमी तरक्की की प्रेरणा कहां से लाए?
लालच का एक बड़ा फायदा यह भी है कि आदमी हर जगह फायदा ही फायदा देखता है। लालची आदमी घाटे का सौदा कतई नहीं करता। लालची आदमी के लिए शादी भी सौदा है। वह शादी भी बहुत जांच-परख के बाद करता है। वह चाहता है कि जीवनसाथी ऐसा मिले जिससे फायदा हो। जिस शादी में घाटा लगता है, वह उसे करता ही नहीं। लालच से आदमी की याददाश्त तेज होती है। उसे याद रहता है कि अब किसको कब फोन करना है और किसकी शादी में कितना महंगा लिफाफा देना है। हालांकि, वह यह भी याद रखता है कि किसने उसके लिफाफे में कम पैसे डाले थे। हिसाब-किताब में लालची आदमी का कोई मुकाबला नहीं कर सकता।
लालच आदमी को अवसरवादी भी बनाता है। वह हवा का रुख देखकर अपनी दिशा बदल लेता है। आज जिसके खिलाफ था, कल उसके साथ खड़ा हो सकता है। मूर्ख-टाइप लोग इसे सिद्धांतहीनता कहते हैं, पर लालची आदमी इसे व्यावहारिक बुद्धि मानता है। आखिर सिद्धांतों से पेट थोड़े ही भरता है! पेट भरने के लिए रोटी चाहिए और रोटी के लिए पैसा। पैसा कमाने के लिए लालच। गणित बिल्कुल सीधा है।
लालच का विरोध करनेवाले कहते हैं कि लालच बुरी बला है। लेकिन वे यह नहीं बताते कि दुनिया में बड़ी-बड़ी इमारतें, साम्राज्य और तिजोरियां किसके संतोष से बनी हैं! अगर हर आदमी कह देता कि मेरे पास पर्याप्त है तो धन जमा करने की महान परंपरा का क्या होता? बैंक वालों को किस बात का गर्व होता और तिजोरियां किसके इंतजार में बैठी रहतीं?
इसलिए लालच को बुरा कहना बंद हो। लालच रखें, खूब रखें। बस छोटी-सी सावधानी बरतिए। लालच करते समय यह मत भूलें कि सामने वाला भी लालची हो सकता है। क्योंकि लालच की दुनिया में सबसे बड़ा संकट यही है कि हर आदमी ज्यादा चाहता है, लेकिन किसी को ज्यादा देना नहीं चाहता।
