हरिगोविंद विश्वकर्मा
इस देश का भगवान ही मालिक। अजीब तरह के लोग हो गए हैं। एकदम विचित्र। मुझसे इस्तीफा मांग रहे हैं। जिद पकड़ ली है इस्तीफा लेने की। इन्हें मांगने के लिए कुछ और नहीं मिला तो इस्तीफा ही मांगने लगे। अब लेंगे तो मेरा इस्तीफा ही। मजाक बना दिया है इस्तीफे को। लगता है मेरा इस्तीफा पालने में रखकर झुलाएंगे। माफ करना भाई, आप लोग गलत जगह आ गए। यहां इस्तीफा नहीं मिलेगा। मैं जनता का सेवक हूं। जनसेवा मेरा धर्म है। मैं इस्तीफा क्यों दूं।
मेरा धर्म…
जनता की सेवा मेरा धर्म है। मेरे धर्म से मुझे कोई ताकत विचलित नहीं कर सकती है। मैं इस्तीफा दे दूंगा तो जनता का क्या होगा? कौन करेगा उसकी सेवा? सब लूट-खसोट मचाएंगे। भ्रष्टाचार करेंगे। जनता को परेशान करेंगे। जैसे पहले करते थे। तभी तो मुझसे इस्तीफा मांग रहे हैं। जैसे इस्तीफा नहीं लड्डू है, मांगने पर दे दूं। सब चिल्ला रहे हैं… इस्तीफा दे दो-इस्तीफा दे दो! कैसा इस्तीफा भाई? इनको पता नहीं है। मैं जनता का सेवक हूं। जनसेवा मेरा धर्म है। मैं इस्तीफा क्यों दूं।
साजिश…
कहीं, यह कोई साजिश तो नहीं है? साजिश ही है। अंतर्राष्ट्रीय साजिश। जरूर, ऐसी ही बात है। तभी तो सब के सब एक ही राग अलाप रहे हैं। सड़क पर छाती पीट रहे हैं। दुहाई दे रहे हैं। कह रहे हैं, इस्तीफा नहीं दे रहा है! रोओ बेटा, या खुदकुशी कर लो। तुम्हारा नाम भी खुदकुशी करनेवालों की सूची में डलवा दूंगा। और हां, इस्तीफा तो भूल जाओ। इनको पता नहीं है। मैं जनता का सेवक हूं। जनसेवा मेरा धर्म है। मैं इस्तीफा क्यों दूं।
फैशन…
हद है। अपने देश में इस्तीफा मांगना फैशन बन गया है। यह बहुत बुरी बात है। यह तुरंत बंद होनी चाहिए। तपाक से कह देते हैं, इस्तीफा दे दो। शर्म नहीं आती। जैसे इन्होंने ही कुर्सी दी है, जो इनके कहने पर इस्तीफा दे दिया जाए। किसी नेता से पूछिए, मिलती है आसानी से कुर्सी। कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं। कितनों के पैरों पर गिरना पड़ता है। चमचागीरी भी करनी पड़ती है। गधे को भी बाप कहना पड़ता है। इतना करने के बाद जनता की सेवा का मौका मिलता है और गैरजिम्मेदार लोग चाहते हैं, मैं पद छोड़ दूं। मैं हर चाल समझता हूं। मैं जनता का सेवक हूं। जनसेवा मेरा धर्म है। मैं इस्तीफा क्यों दूं।
हैसियत…
इस्तीफा मांगनेवालों की हैसियत क्या है? कौन हैं, ये लोग? क्या करते हैं? केवल इस्तीफा ही मांगते हैं या कुछ काम भी करते हैं? इन्हें इस्तीफा मांगने का हक किसने दिया? मेरी पार्टी इस्तीफा नहीं मांग रही है। मेरे आका संतुष्ट हैं और सड़क छाप चाहते हैं। इस्तीफा दे दूं। इन्हें इस्तीफा मांगने की सनक-सी चढ़ गई है। कहीं कोई मर गया, तब इस्तीफा। कहीं आग लग गई तब इस्तीफ़ा। किसी ने खुदकुशी कर ली, तब इस्तीफा। जैसे इस्तीफा नहीं, सिन्नी है। इसे दे दो, उसे दे दो। जो मांगे, उसे दे दो। मैं सिन्नी नहीं बांटता भाई। मैं तो जनता का सेवक। जनसेवा मेरा धर्म है। फिर मैं इस्तीफा क्यों दूं।
ईमानदार
मैं ईमानदार आदमी। केवल सेवा करता हूं। वह भी जनता की सेवा। मैं अपना काम करता हूं। जनता अपना काम करती है यानी वोट देती है। जनता ने मुझे अपनी सेवा के लिए चुना है। तो ईमानदारी से सेवा कर रहा हूं। जनता भी जान गई है, मैं बहुत ईमानदार हूं। इसीलिए तो जनता अकसर कहती है, बहुत अच्छा नेता है। सेवा करता है। नेता नहीं गऊ है, एकदम गऊ। लेकिन विरोधियों को मेरी ईमानदारी पर डाउट है। इन्हें जनता पर भी डाउट है। आज तक किसी ने शक नहीं किया। ये लोग शक कर रहे हैं। लोकतंत्र का अपमान कर रहे हैं। लोकतंत्र का गला घोंट रहे हैं इसीलिए मेरा इस्तीफा मांग रहे हैं। मैं जनता का सेवक हूं। जनसेवा मेरा धर्म है। मैं इस्तीफा क्यों दूं।
कलियुग…
घनघोर कलियुग है। हे राम, क्या किया जाए? लोग इतने स्वार्थी भी हो सकते हैं। इस्तीफे के लिए सड़क पर आ गए। जनता क्या सोचेगी। हालांकि, जनता सोचती नहीं। जनता सोचती तो जरूर सबक सिखाती। हे जनता जनार्दन, इन्हें माफ मत करना। और हां, इस्तीफा मेरे पास है नहीं, होता तब न देता। इस्तीफा मांगने वालों, मेरी सलाह है। गंदे और फटे कपड़े पहन लो। मैं एक कटोरा दे दूंगा। फिर मजे से मांगो, इस्तीफा नहीं भीख। खूब मिलेगी समझे और सुनो, इस्तीफा तो तुम भूल जाओ। मैं जनता का सेवक हूं। जनसेवा मेरा धर्म है। मैं इस्तीफा क्यों दूं।
