-१९१ में से ९६ ताप बिजलीघर गंभीर स्थिति में; बढ़ती मांग और घटते भंडार ने सरकारी तैयारियों पर उठाए सवाल
देश में कोयले की रिकॉर्ड आपूर्ति के सरकारी दावों के बीच बिजली उत्पादन की चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के आंकड़ों के अनुसार, १९ अक्टूबर तक देश के १९१ कोयला आधारित बिजलीघरों में से ९६ के पास तीन दिन से भी कम बिजली उत्पादन के लिए पर्याप्त कोयला बचा था। सितंबर के मध्य में ऐसे बिजलीघरों की संख्या ६० थी। यानी महज एक महीने में गंभीर स्थिति वाले संयंत्रों की संख्या ३६ बढ़ गई। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सरकार कोयले की आपूर्ति बढ़ाने का दावा कर रही है, तो बिजलीघरों के भंडार लगातार क्यों घट रहे हैं?
केंद्रीय बिजली मंत्रालय के अनुसार, बिजलीघरों को प्रतिदिन रिकॉर्ड २६ लाख टन कोयला भेजा जा रहा है। सरकार का कहना है कि खनन क्षेत्रों में बारिश, बिजली की असाधारण मांग और जलविद्युत उत्पादन में कमी के कारण आपूर्ति पर दबाव बढ़ा है। अधिकारियों ने स्थिति जल्द सामान्य होने की उम्मीद जताई है।
आंकड़े बताते हैं कि सितंबर में कोयले से बिजली उत्पादन पिछले वर्ष की तुलना में १३.३ प्रतिशत बढ़ा, जबकि जलविद्युत उत्पादन में २० प्रतिशत गिरावट आई। इससे ताप बिजलीघरों पर निर्भरता बढ़ गई। गुजरात में बिजली की अधिक मांग के बीच उद्योगों से शाम के समय खपत सीमित करने को कहा गया। हालांकि केंद्रीय बिजली मंत्रालय ने राज्य में बिजली अथवा कोयले की कमी से इनकार किया है। यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। तीन दिन से कम कोयला भंडार होने का अर्थ बिजलीघर बंद होना नहीं है। लगातार नई आपूर्ति मिलने पर उत्पादन जारी रह सकता है। लेकिन इतने अधिक संयंत्रों का गंभीर भंडार श्रेणी में पहुंचना आपूर्ति प्रबंधन की कमजोरी का संकेत अवश्य है। सवाल यह भी है कि खदानों में उपलब्ध कोयला समय पर बिजलीघरों तक क्यों नहीं पहुंच पा रहा? रेलवे परिवहन, भंडारण और मांग के पूर्वानुमान की जिम्मेदारी किसकी है? सरकार को अब केवल भेजे गए कोयले का रिकॉर्ड नहीं, बल्कि बिजलीघरों में वास्तव में उपलब्ध सुरक्षित भंडार का हिसाब भी देना होगा।
