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सम-सामयिक : बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान के १० साल ‘सेल्फी अभियान’ से नहीं होगा बेटियों का ‘कल्याण’!

मनोज वार्ष्णेय

२२ जनवरी २०२६ को जब बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान का एक दशक पूरा होगा तो हमारे पास कहने के लिए दो बातें होंगी। एक यह कि इन दस वर्षों में केंद्र तथा राज्य सरकारों के लाख प्रयासों के बाद भी हमारी सोच रत्तीभर भी नहीं बदली है। अभी भी मासूम बच्चियां दैहिक शोषण से, उसके डर से तथा भविष्य के डर से आत्महत्या कर रही हैं। दूसरी बात यह कि जितने करोड़ में यह योजना आरंभ की गई, उसका आधा से अधिक सिर्फ इस बात का प्रचार करने में खर्च हुआ कि हमें बेटी को बचाना है और उसे पढ़ाना है। यह अभियान भले ही एक आंदोलन बना हो पर इस नारे और अभियान का हश्र वही हुआ है, जैसा कि जल बचाओ, जीवन बचाओ नारे का हुआ था।
सेल्फी से आगे?
भारत विश्व के उन देशों में सिरमौर है, जहां पर स्त्री के विभिन्न रूपों को अलग-अलग दर्जा दिया गया है। कहीं वह गृहलक्ष्मी है तो कहीं मातृशक्ति है और कहीं पुत्री के रूप में पूजी जाती है। नवरात्रि में तो यह देवी मां के रूप में नजर आती है। शायद यही सोच रही होगी केंद्र सरकार की जब उसने यह योजना आरंभ की होगी, लेकिन जिन लोगों को बेटियों को बचाना है और पढ़ाना है, वही उसके भक्षक बन रहे हैं और बेटियां, बेटी बचाओ की इबारत पढ़ते हुए यही सोच रही हैं कि काश कोई राजा राममोहन राय जैसा व्यक्ति आए और उन्हें भक्षक बने रक्षकों से बचा ले।
खैर, बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने २२ जनवरी २०१५ को हरियाणा के पानीपत से बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान या मिशन की शुरुआत की थी। महिला और बाल विकास मंत्रालय, स्वास्थ्य परिवार कल्याण तथा मानव संसाधन मंत्रालय ने मिलकर इसे अमली जामा पहनाया और इसकी लोकप्रियता इतनी थी कि यह पूरी दुनिया में चर्चित हुआ। इससे अधिक बड़ी बात क्या होगी कि जब यह मिशन आरंभ हुआ तो बेटियों के साथ सेल्फी खींचने तथा उसे प्रधानमंत्री को टैग करने के साथ ही हर माता-पिता गर्व से कहते थे, ‘हमारी बेटी की सेल्फी’।
अब स्थितियों पर एक नजर डालते हैं। लगभग १०० करोड़ की धनराशि के साथ इस योजना में कन्या जन्म को बढ़ावा देना, बच्चियों की सुरक्षा-शिक्षा के साथ ही उनकी आर्थिक सुरक्षा खास बातें थीं। आज सुरक्षा का आलम यह है कि बेटियां स्कूल की छत से कूदकर आत्महत्या कर रही हैं और जिम्मेदार बेटियों की सुरक्षा के स्थान पर खुद को सुरक्षित करने में पूरी एनर्जी लगा रहे हैं। मध्य प्रदेश में ११वीं की एक छात्रा ने आत्महत्या करने से पहले अपनी कॉपी में लिखा-टीचर हाथ पकड़ता था। राजस्थान में पांच तारा जैसे स्कूल में १८ माह से बुलीइंग झेल रही बच्ची ने आत्महत्या की और खुद सीबीएसई ने इसे स्वीकार भी किया।
सिर्फ प्रचार-प्रसार!
बच्चियों की जनसंख्या बढ़ाने और उनकी जन्म से पहले हत्या कर देने पर रोक लगाने के मामले में स्थिति यह है कि सारे उपाय करने के बाद भी अवैध गर्भपात आज देश के उन धंधों में पहली लिस्ट में है, जिनसे मोटा पैसा मिलता है। सरकार ने बच्चियों को आर्थिक संबल देने के लिए सोचा था कि वह सुकन्या समृद्धि से उन्हें आर्थिक ताकत देगी। इस योजना की सबसे अहम बात यह है कि इसमें १८ वर्ष बाद उच्च शिक्षा के लिए आधी रकम निकालने की छूट है। जरा सोचिए इस उम्र तक पहुंचने तक वह कहीं न कहीं दाखिला ले चुकी होती हैं और इंजीनियरिंग-डॉक्टरी या दूसरी शिक्षा क्षेत्र में फीस कम से कम बीस लाख तो होती ही है। १८ वर्ष में कुल जमा रकम से वह क्या कर पाएगी और वह भी आधी रकम से? हालांकि, उच्च शिक्षा में बेटियों का नामांकन बढ़ा है, लेकिन सरकार को इसके लिए उन्हें प्रोत्साहन स्वरूप लाडो योजना, ट्रांसपोर्ट वाउचर, स्कूटी-साइकिल देने के साथ ही हर राज्य की अपनी अलग योजनाएं हैं। ऐसे में बच्चियों के भविष्य के लिए सुनहरे सपने वैâसे पूरे होंगे? जहां पर मिड-डे मील मिलता है वहां पर तो आधे बच्चे सिर्फ इसे खाने की प्राथमिकता से ही आते हैं, उनमें कितनी बालिकाएं हैं इस पर किसी ने ध्यान दिया है क्या?
बच्चियों की सुरक्षा का आलम यह है कि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो ने कोरोना के समय बताया था कि महिलाओं के खिलाफ अपराध में तेरह प्रतिशत के आसपास हिंसा बढ़ी है। जब हिंसा की खबरें आती हैं तो ग्रामीण क्षेत्र या फिर शहरी क्षेत्र में रैलियों के माध्यम से जो संदेश जाते हैं, वह सिर्फ प्रचार तक ही सीमित होते हैं। कोई कारण नहीं है कि पांच वर्ष पूरे होने पर संसदीय समिति ने लोकसभा में खुलकर कहा था कि सरकार की प्रमुख योजना बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ में जो धनराशि खर्च हो रही है, वह सिर्फ प्रचार पर और उसने यहां तक कहा था कि अस्सी प्रतिशत तो हम मीडिया अभियानों पर खर्च कर रहे हैं। यह बात सरकार के लिए सबक थी, पर हुआ कुछ नहीं।
एजेंडा मंत्री खुश
बेटियों का स्वास्थ्य हो या फिर उनके विद्यालयों में सुविधाओं की बात, सिर्फ कागजी अभियान ही नजर आता है। आखिर इस योजना को सफलता क्यों नहीं मिल रही? शिक्षा जगत के लोगों का मानना है कि इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि यह योजना केवल प्रचार के लिए आक्रामक थी न कि बेटियां पढ़ें और सुरक्षित हों। राज्यों में इसकी देख-रेख के लिए नियमित बैठक नहीं होतीं, शिक्षकों के अतिरिक्त दूसरों की इसमें भागीदारी बस स्कूटी मिलने या फिर साइकिल मिलने तक सीमित है।
एक जो सबसे बड़ा कारण है वह यह है कि हम अभी भी उस युग में जी रहे हैं, जिसमें सनातनी भाव से बेटे हमेशा बेटियों से अधिक सुख-सुविधा पाते हैं। स्कूलों की स्थिति यह है कि वहां पर छत ही नहीं है और जो शौचालय या दूसरे सुविधा साधन हैं वे सामूहिक हैं न कि बेटियों के लिए सैपरेट। यहां सैपरेट से सीधा मतलब है कि महिला-पुरुष के लिए जो सुविधा क्षेत्र हों वे एक तयशुदा दूरी पर हों, जिससे बेटियां सुरक्षित महसूस कर सकें।
देश में शायद ही कभी ऐसे वैंâप लगते हों, जहां पर सिर्फ बच्चियों के स्वास्थ्य का परीक्षण हो, जहां पर उन्हें मिलनेवाली सुविधाओं की जानकारी उन्हें दी जाए और उनके साथ अगर कोई दुर्व्यवहार हुआ है तो उस पर तत्काल कार्रवाई हो। पांच तारा स्कूलों की बात करें या फिर सरकारी विद्यालयों की कहीं पर भी बालिकाओं के लिए कानूनी वैंâपों का आयोजन तो दूर, एक प्रतिनिधि तक नहीं है। पॉक्सो एक्ट मात्र कानूनी नियम बनकर रह गया है। जब बच्चियों के खिलाफ अपराध होता है तो धाराएं तलाशी जाती हैं, देखा जाता है कि अपराधी बालिग है या नाबालिग। इसके विपरीत यह नहीं देखते कि जब बच्ची से जिरह होती है तो वह बालिग है या नाबालिग? आंकड़े कुछ भी कहें, एक दशक की यात्रा और बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ का लाभ सिर्फ यह हुआ है कि यह एक अभियान के रूप में पूरे विश्व में भारत का प्रतिनिधि बन गया है और हमारी मानसिकता उसी रसातल में हिचकोले खा रही है, जिसमें हम सदियों से जी रहे हैं।
इसके साथ ही जब मंत्री, प्रधानाचार्य से यह पूछेंगे कि कोई बच्ची बुर्वेâ में तो नहीं आती तो बच्चियों को पढ़ाना प्राथमिकता में रहेगा या मंत्री जी को खुश करने का एजेंडा। सोचिए, वैâसे पढ़ेंगी बेटियां और वैâसे बचेंगी बेटियां आनेवाले भविष्य के लिए? क्या सिर्फ अभियानों से या किसी निर्णायक रणनीति से।

(लेखक राजस्थान से प्रकाशित नवज्योति के पूर्व साहित्य संपादक हैं)

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