वीना गौतम
गुजरात के राजकोट जिले के अंतर्गत अटकोट थाना क्षेत्र के एक गांव में निर्भया कांड जैसी घटना सामने आयी है। हाल के कुछ महीनों में इस तरह की आधा दर्जन से ज्यादा घटनाएं घट चुकी हैं। अटकोट की यह घटना इतनी वीभत्स है कि इसने न केवल देशभर में निर्भया कांड की याद दिला दी, बल्कि उससे भी कहीं ज्यादा देश को सिहराकर रख दिया है। यहां भी मासूम बच्ची के साथ बलात्कार करने में असफल रहे नृशंस बलात्कारी ने उसके प्राइवेट पार्ट में लोहे की रॉड जैसी चीज डालकर उसे जीने-मरने की सांसों के बीच छोड़ दिया है। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक लड़की की स्थिति स्थिर थी, कोई नहीं जानता कि क्या होगा? सवाल है बार-बार ये नृशंस बलात्कारी निर्भया कांड जैसी दरिंदगी को दोहराकर क्या पूरे देश को चिढ़ा नहीं रहे? हो सकता है यह सवाल बहुत कड़ुवा लगे, मगर यह जितना कडु़वा है, उतना ही सच है। अप्रत्यक्ष रूप से निश्चित ही ये बलात्कारी अपने कृत्य से देश को चिढ़ा रहे हैं, पर ये ऐसा क्यों कर रहे हैं?
डर नहीं है!
दरअसल, निर्भया जैसा कांड दोहराने वाले अपराधियों में दो बातें प्रमुख होती हैं। एक तो बलात्कार इनके लिए अपनी ताकत का प्रदर्शन है, ये सोचते हैं, ये जो चाहें वो कर सकते हैं, उन्हें कोई नहीं रोक सकता। यहां तक कि यह किसी की देह को भी जब चाहें अपनी ताकत से रौंद डालने की सोच रखते हैं। यह भावना समाज के प्रति एक नृशंस घोषणा जैसी है कि तुम्हारे कानून, तुम्हारी नैतिकता, तुम्हारी सभ्यता, तुम्हारे मूल्य, सबको मैं अपनी ताकत से रौंद रहा हूं। यह चिढ़ाना नहीं तो और क्या है? साथ ही इन नृशंस बलात्कारियों के मस्तिष्क में दूसरी जो प्रमुख बात होती है, वह यह है कि इन्हें किसी तरह की सजा से कोई डर नहीं लगता। निर्भया कांड के बाद कानून तो कठोर हुए, लेकिन क्या अपराधियों को तुरंत और निश्चित तथा स्पष्ट रूप से सजा मिली? जवाब है नहीं। भारत में बलात्कार और महिलाओं के खिलाफ अपराधों में कन्विक्शन रेट २८ से ३२ फीसदी के आसपास है। मतलब यह कि १० में से ७ बलात्कारी या नृशंस अपराधी हर हाल में कानून के शिकंजे से बच निकलते हैं। इसलिए अपराधियों की यह मानसिकता बनती जा रही है कि पकड़ भी लिए गए तो क्या हो जायेगा, जमानत मिल जायेगी, मैं गवाहों को दबा दूंगा, पीड़िता बदनाम होने के डर से पीछे हट जायेगी और समाज अपमान का घूंट पीकर चुपचाप रह जायेगा।
वास्तव में यही वह मानसिकता है, जिसके चलते तमाम कानूनों के बावजूद औरतों के खिलाफ अपराध की दर लगातार बढ़ती ही जा रही है, कम होने का नाम नहीं ले रही। अगर नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो ऑफ इंडिया (एनसीआरबी) के आंकड़ों को देखें तो २०२१ में जहां देशभर में बलात्कार की कुल ३१,६७७ घटनाएं घटी थीं यानी हर दिन औसतन ८६ बलात्कार की घटनाएं, वहीं २०२२ में २०२१ के मुकाबले ऐसी घटनाएं ४ फीसदी बढ़ गईं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि २०१२ में देश को हिला देने वाले राजधानी दिल्ली के निर्भया कांड के बाद चाहे बलात्कारियों के विरुद्ध कितने ही कठोर कानून क्यों न बनाये गये हों, बलात्कार और महिलाओं से संबंधित दूसरे अपराधों में किसी तरह की जरा भी कमी नहीं आई, बल्कि साल दर साल ये आंकड़े दिखा रहे हैं कि कानून चाहे जितना मजबूत हुआ हो, मीडिया चाहे जितनी हाय-तौबा मचाती हो और समाज में भी चाहे जितना आक्रोश हो, पर महिलाओं के विरुद्ध अपराधों के सिलसिले में जरा भी रोक या गिरावट नहीं आ रही। सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? आखिर बार-बार निर्भया कांड जैसी घटनाओं को अंजाम देनेवाले ये अपराधी कौन हैं?
महिलाएं ही दोषी?
यकीन मानिये, ये कहीं बाहर से नहीं आये न ही आसमान से टपके हैं। ये दुर्लभ और विकृत मानसिकता के नृशंस अपराधी इसी समाज की उपज हैं। वैसे भी बलात्कारी कभी भी किसी दूसरे समाज में जाकर बलात्कार की कोशिश नहीं करते, अपने ही समाज में ये यह कृत्य बार-बार दोहराते हैं, क्योंकि ये उसी समाज से पनपते हैं। तो फिर वह आपराधिक जड़ कहां है, जिसकी वजह से बार-बार देश का दिल दुखाकर पूरे समाज को आक्रोशित करने के बाद भी यह सिलसिला थमने का नाम नहीं लेता? इसकी जड़ कहीं और नहीं अपने समाज में ही है। आखिर हम बार-बार दुहाई इस बात की देते हैं कि निर्भया कांड के बाद भी महिलाओं के विरुद्ध इतने अमानवीय अपराधों का सिलसिला कम क्यों नहीं हो रहा? मगर क्या कभी हम इस सवाल से भी टकराते हैं कि निर्भया कांड के बाद हमारे समाज की सोच में क्या बदलाव हुआ? क्या उसके बाद से हमारे समाज ने बलात्कार की शिकार लड़कियों को दोषी मानने से मना कर दिया है? जी नहीं, आज भी समाज दबी जुबान से बलात्कार की शिकार किसी लड़की या महिला को ही ९० प्रतिशत दोषी ठहराता है। क्या निर्भया कांड के बाद हमारे समाज में हिंसा को मर्दानगी से जोड़कर देखने का सिलसिला खत्म हो गया है? जी नहीं, आज भी हमारे समाज में हिंसा को मर्दानगी से जोड़कर ही देखा जाता है। जो समाज इस तरह की घटनाओं के बाद हाय-तौबा मचाता है, क्या वही समाज सोशल मीडिया में बढ़ते पोर्न कंटेंट को लेकर भी कभी आक्रोशित होता है? क्या ऐसी वेबसाइटोें और इंटरनेट में ऐसे अमानवीय कंटेंट डालने वालों के विरुद्ध कभी लोग एकत्र होकर आंदोलन करते हैं? जी नहीं, बल्कि सॉफ्ट पोर्न को समाज का एक बड़ा तबका सही ठहराता है।
हाल के दिनों में ऐसे कई विश्लेषण सामने आये हैं, जब लोग नेट पर उपलब्ध सॉफ्ट पोर्न को सेफ्टी वॉल्ब की तरह देखने की कोशिश की है। मतलब यह कि इनके कारण समाज में यौन अपराधों की दर कम है। बड़े पैमाने पर लोग सॉफ्ट पोर्न देखकर ही संतुष्ट हो जाते हैं। यह निरानिर एक ऐसे कुकृत्य का बचाव है, जो अपने साथ कई तरह की हिंसक गतिविधियों को जन्म देता है। जब तक हमारा समाज अपने घर, परिवार, स्कूल और मुहल्ले में स्त्री सम्मान को व्यक्त नहीं करेगा, जब तक हम वास्तविक जीवन में इर्द-गिर्द की महिलाओं के प्रति सम्मान नहीं दर्शाएंगे, तब तक इस तरह के कांडों से हमें कोई कानून नहीं बचा सकता। आज भी भारत के समाज में महिलाओं को वस्तुओं की तरह ही देखा जाता है। सच बात यही है कि समाज ही ऐसे अपराधियों को पैदा करने के लिए जरखेच जमीन और वातावरण मुहैया कराता है, जिससे बार-बार निर्भया जैसी दरिंदगी हमारे सामने आती है और हम सिर्फ हाय-तौबा मचाकर ही रह जाते हैं।
दोषी समाज!
याद रखिए, इस तरह की लगातार घट रही घटनाएं सिर्फ घटनाएं ही नहीं, बल्कि समाज की विस्फोटक स्थिति होते जाने की चेतावनी हैं। ये बलात्कारी सिर्फ किसी असहाय को अपनी ताकत का शिकार नहीं बनाते, बल्कि समूची सभ्यता और संस्कृति को मटियामेट करते हैं। जब-जब ऐसा कांड होता है, तो पूरा समाज खुद को निर्बल और लाचार महसूस करता है। हर ऐसे कांड के बाद महिलाओं के दिलोदिमाग में सबसे पहला सवाल यही आता है कि तुम्हें कोई कानून नहीं बचा पायेगा, किसी तरह की नैतिकता अपराधियों को झिझकने तक के लिए मजबूर नहीं करेगी और समाज कांड हो जाने के बाद एक निर्जीव आक्रोश दिखाकर हर बार शांत हो जायेगा। वास्तव में यह अपराध किसी व्यक्ति के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे समाज और पूरी सामाजिक व्यवस्था की अवमानना है। जब बार-बार इस तरह की घटनाएं दोहरायी जाती हैं, तो यह अपराधियों की ताकत का प्रदर्शन ही नहीं, उनकी वैचारिकता की भी विजय है कि वह जो चाहें कर सकते हैं। इसलिए यह सिर्फ किसी महिला के लिए जिसके साथ ये घटना घटती है, अपमान नहीं है, बल्कि पूरे समाज का अपमान है। इसलिए जितना जल्दी हो कानून के साथ समाज को भी जागना होगा और मिलकर इन दरिंदों के विरुद्ध खड़ा होना होगा, नहीं तो ये हमेशा इसी तरह रह-रहकर समाज को मुंह चिढ़ाते रहेंगे।
(लेखिका विशिष्ट मीडिया एवं शोध संस्थान, इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर में कार्यकारी संपादक हैं)
