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कोर्ट-रूम : फर्जी डिक्री, झूठा आरोप और अपराधी को शरण…. धारा २४७, २४८ और २४९

-एड. कनई बिस्वास
भाग:८३

न्यायालय से कपटपूर्वक फर्जी डिक्री लेना, किसी व्यक्ति को नुकसान पहुंचाने के लिए बेबुनियाद आपराधिक आरोप लगाना या अपराधी को कानूनी दंड से बचाने के लिए शरण देना अपराध है। भारतीय न्याय संहिता की धारा २४७, २४८ और २४९ ऐसे ही कृत्यों को दंडनीय बनाती हैं।
केस स्टडी-१: ‘कपट से फर्जी डिक्री लेना’ (धारा २४७)
एक व्यक्ति ने मिलीभगत कर अदालत से २५ लाख रुपये की ऐसी डिक्री प्राप्त कर ली, जबकि वास्तव में कोई रकम देय ही नहीं थी।
अदालत क्या देखेगी?
क्या रकम वास्तव में देय थी? क्या आरोपी ने जानते हुए अपने पक्ष में डिक्री प्राप्त की? क्या यह काम बेईमानी या कपट से किया गया?
फैसला- ये तत्व सिद्ध होने पर धारा २४७ के तहत कार्रवाई हो सकती है।
समझें: यह धारा केवल रकम तक सीमित नहीं है। ऐसी संपत्ति की डिक्री कपटपूर्वक प्राप्त करना भी इसके दायरे में आ सकता है, जिस पर दावा करने वाला हकदार नहीं है।
केस स्टडी-२: ‘नुकसान के लिए झूठा आपराधिक आरोप’ (धारा २४८)
भूमि विवाद की रंजिश में एक व्यक्ति ने पड़ोसी पर डकैती का आरोप लगा दिया। उसे मालूम था कि ऐसी कोई घटना हुई ही नहीं और आरोप लगाने का कोई वैध आधार नहीं था।
अदालत क्या देखेगी?
क्या आरोपी ने आपराधिक कार्यवाही शुरू की या झूठा आरोप लगाया? क्या उसे मालूम था कि इसके लिए कोई न्यायसंगत या वैध आधार नहीं है? क्या उसका उद्देश्य दूसरे व्यक्ति को क्षति पहुंचाना था?
फैसला- ये तत्व सिद्ध होने पर धारा २४८ के तहत कार्रवाई हो सकती है।
समझें: शिकायत का जांच में साबित न होना अपने आप धारा २४८ का अपराध नहीं है। जानबूझकर बेबुनियाद आरोप और क्षति पहुँचाने की नीयत साबित होना महत्वपूर्ण है।
केस स्टडी-३: ‘अपराधी को शरण देना’ (धारा २४९)
एक व्यक्ति को मालूम था कि उसके मित्र ने गंभीर अपराध किया है। उसे कानूनी दंड से बचाने के लिए उसने अपने घर में छिपाया और गिरफ्तारी से बचने में सहायता की।
अदालत क्या देखेगी?
क्या आरोपी जानता था या उसे विश्वास करने का कारण था कि संबंधित व्यक्ति ने अपराध किया है? क्या उसने उसे शरण दी या छिपाया? क्या उद्देश्य उसे कानूनी दंड से बचाना था?
फैसला- आवश्यक तत्व सिद्ध होने पर धारा २४९ के तहत कार्रवाई हो सकती है।
समझें: अपराध करने वाले व्यक्ति को दंड से बचाने की नीयत से शरण देना अपराध है। हालांकि इस धारा में पति या पत्नी द्वारा दी गई शरण के संबंध में वैधानिक अपवाद भी है।
धारा २४७ से २४९ का संदेश साफ है- न्यायालय से कपटपूर्वक फर्जी डिक्री लेना, किसी को नुकसान पहुँचाने के लिए जानबूझकर बेबुनियाद आपराधिक आरोप लगाना और अपराधी को दंड से बचाने के लिए शरण देना, तीनों आपराधिक जिम्मेदारी पैदा कर सकते हैं।
(अगले अंक में: धारा २५०, २५१ और २५२ – अपराधी को दंड से बचाने के बदले उपहार या लाभ लेना, अपराधी को बचाने के बदले उपहार या संपत्ति लौटाने की पेशकश करना तथा चोरी की संपत्ति वापस दिलाने के नाम पर लाभ लेने से जुड़े अपराधों को सरल उदाहरणों से समझेंगे।)

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