एड. कनई बिस्वास
भाग:७८
भारतीय न्याय संहिता, २०२३ में न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए केवल झूठी गवाही देने को ही नहीं, बल्कि किसी को झूठी गवाही देने के लिए धमकाना, झूठे साक्ष्य का जानबूझकर उपयोग करना और झूठे प्रमाणपत्र जारी करना भी गंभीर अपराध माना गया है। न्यायााय औरं सरकारी संस्थाएं सत्य तथ्यों पर निर्णय लेती हैं। यदि कोई व्यक्ति इस प्रक्रिया को धोखा देने का प्रयास करता है तो वह कानून के अनुसार, दंड का भागी बनता है। धारा २३२, २३३ और २३४ ऐसे ही अपराधों से संबंधित हैं।
केस स्टडी – १: ‘झूठी गवाही देने के लिए किसी व्यक्ति को धमकाना’ (धारा २३२)
एक हत्या के मुकदमे में मुख्य प्रत्यक्षदर्शी गवाह को आरोपियों ने धमकी दी कि यदि उसने उनके पक्ष में झूठा बयान नहीं दिया तो उसके परिवार को गंभीर नुकसान पहुंचाया जाएगा। भय के कारण गवाह ने प्रारंभिक बयान बदलने का प्रयास किया, लेकिन बाद में उसने पूरी घटना न्यायालय को बता दी।
फैसला – यदि यह सिद्ध हो जाता है कि आरोपी ने किसी व्यक्ति को झूठी गवाही देने के लिए धमकाया, तो उसके विरुद्ध धारा २३२ के तहत कार्रवाई की जाएगी।
समझें: धारा २३२ का उद्देश्य गवाहों को भयमुक्त वातावरण प्रदान करना है, ताकि वे न्यायालय के समक्ष बिना किसी दबाव के सत्य बयान दे सकें।
केस स्टडी- २: ‘झूठा होने की जानकारी होने के बावजूद साक्ष्य का उपयोग करना’ (धारा २३३)
एक व्यक्ति को यह पता था कि उसके पास मौजूद दस्तावेज फर्जी हैं। इसके बावजूद, उसने उन्हें असली बताकर न्यायालय में प्रस्तुत किया, ताकि मुकदमे का निर्णय अपने पक्ष में कराया जा सके। दस्तावेजों की वैज्ञानिक जांच में उनकी जालसाजी सिद्ध हो गई।
फैसला – यदि यह सिद्ध हो जाता है कि आरोपी ने झूठा होने की जानकारी के बावजूद साक्ष्य का उपयोग किया, तो उसके विरुद्ध धारा २३३ के तहत कार्रवाई की जाएगी। समझें: धारा २३३ केवल झूठे साक्ष्य बनाने वाले को ही नहीं, बल्कि उसे झूठा जानते हुए भी इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति को भी दंडित करती है। न्यायालय को गुमराह करने का हर प्रयास अपराध है।
केस स्टडी- ३: ‘झूठा प्रमाणपत्र जारी करना या उस पर हस्ताक्षर करना’ (धारा २३४)
एक चिकित्सक ने धन के लालच में बिना किसी चिकित्सीय जांच के एक व्यक्ति के नाम गंभीर बीमारी का झूठा प्रमाणपत्र जारी कर दिया। उस प्रमाणपत्र का उपयोग न्यायालय में कार्यवाही टालने और सरकारी लाभ प्राप्त करने के लिए किया गया। जांच में प्रमाणपत्र पूरी तरह असत्य पाया गया।
फैसला – यदि यह सिद्ध हो जाता है कि आरोपी ने जानबूझकर झूठा प्रमाणपत्र जारी किया या उस पर हस्ताक्षर किए तो उसके विरुद्ध धारा २३४ के तहत कार्रवाई की जाएगी।
समझें: धारा २३४ का उद्देश्य सरकारी, न्यायिक और प्रशासनिक कार्यवाही में प्रस्तुत किए जाने वाले प्रमाणपत्रों की सत्यता और विश्वसनीयता बनाए रखना है। झूठा प्रमाणपत्र जारी करना या उस पर हस्ताक्षर करना गंभीर अपराध है।
(अगले अंक में: धारा २३५, २३६ और २३७ – झूठा होने की जानकारी के बावजूद प्रमाणपत्र को सही बताकर उपयोग करना, ऐसी घोषणा में झूठा कथन करना जिसे कानून साक्ष्य के रूप में स्वीकार करता है तथा ऐसी झूठी घोषणा को सही बताकर उपयोग करने से संबंधित अपराधों को सरल उदाहरणों के माध्यम से समझेंगे।)
