मुख्यपृष्ठस्तंभप्रणवाक्षर : जनाक्रोश के उबाल को कब तक देखेगी सरकार

प्रणवाक्षर : जनाक्रोश के उबाल को कब तक देखेगी सरकार

-प्रणव प्रियदर्शी
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे को लेकर देश की राजधानी और वित्तीय राजधानी दोनों जगह जनाक्रोश उबाल पर है। देश के अन्य हिस्सों में भी विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, लेकिन खासकर दिल्ली और मुंबई की सड़कों पर चल रही हलचलें सरकार की नींद उड़ाए हुए हैं। इस बीच प्रदर्शनकारी लड़कियों और महिला पत्रकारों से दिल्ली पुलिस द्वारा बदसलूकी की खबरें भी आई हैं। २० जुलाई को इसी दिल्ली की सड़कों पर दिखी पुलिस की हैवानियत की यादें अभी धुंधली नहीं पड़ी हैं। ऐसे में ये खबरें लोगों को नए सिरे से उद्वेलित कर रही हैं, जिसका असर आनेवाले दिनों में और बड़े प्रदर्शनों के रूप में नजर आ सकता है।
सबकी एक मांग
ऐसी स्थिति में आखिर हालात किस तरह का मोड़ लेंगे? विरोध प्रदर्शन बड़े से बड़ा होता जाए तो भी सवाल यही है कि आखिर इनके जरिए क्या हासिल करने की कोशिश हो रही है? युवा आक्रोश तो समझ में आता है, लेकिन आखिरकार इस आक्रोश को शांत करने का क्या रास्ता हो सकता है? सीजेपी ने स्पष्ट कर दिया है कि वह ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे से कम किसी भी बात पर नहीं मानेगी। दिल्ली में नेहा बोरा से लेकर योगेंद्र यादव तक सभी एक सुर से कह रहे हैं कि ज्ञानेश कुमार को जाना होगा।
दूर की कौड़ी
मगर इसी बिंदु पर सवाल उठता है कि आखिर वैâसे? पिछली बार मामला एक केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का था, जिसे किसी भी क्षण हटाने का फैसला प्रधानमंत्री के अधिकार क्षेत्र में आता था। इस बार मामला मुख्य चुनाव आयुक्त का है, जिसे हटाना प्रधानमंत्री तो क्या सर्वोच्च न्यायालय के भी अधिकार क्षेत्र से बाहर की बात है। उन्हें हटाने की प्रक्रिया पहले से तय है। उन्हें सिर्फ महाभियोग द्वारा ही हटाया जा सकता है। संसद में महाभियोग प्रस्ताव को पारित करने के लिए दो तिहाई बहुमत की दरकार है जो विपक्षी दलों के लिए दूर की कौड़ी है।
आर-पार की लड़ाई
इस स्थिति के बावजूद मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस न केवल पूरी ताकत से इन विरोध प्रदर्शनों का समर्थन कर रही है, बल्कि नए-नए बयानों से इस राजनीतिक लड़ाई के मोर्चे को आगे और आगे खिसकाती जा रही है। रविवार को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कह दिया कि एघ्R प्रकिया की बदौलत चुनी गई तमाम सरकारों को तत्काल प्रभाव से बर्खास्त करके इन राज्यों में फिर से चुनाव कराए जाने चाहिए। इतना ही नहीं, उन्होंने प्रधानमंत्री और गृहमंत्री को भी अवैध करार दिया। स्वाभाविक ही सरकार की ओर से इसका कड़ा प्रतिवाद करते हुए कांग्रेस पर लोकतंत्र को बदनाम करने का आरोप लगाया गया। साफ है कि मामला आर-पार की लड़ाई का बनता जा रहा है।
किसकी अपील दमदार
ऐसी स्थिति में सबसे बड़ा सवाल यह होता है कि आम लोगों के बीच किसके आरोप ज्यादा स्वीकार्य होते नजर आते हैं। इसका असली मापदंड तो चुनाव ही हैं, लेकिन अभी चूंकि चुनाव की विश्वसनीयता ही संदिग्ध बताई जा रही है इसलिए उन्हें मापदंड के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। फिर इकलौता उपाय यह देखने का बचता है कि किसके आह्वान पर जनाक्रोश शांत होता नजर आता है और किसकी अपील पर विरोध प्रदर्शन और तीव्र होने लगते हैं।
आखिरी विकल्प
संभावना यही है कि सरकार भी अपना रुख अंतिम तौर पर तभी तय करेगी, जब इस सवाल का जवाब स्पष्ट रूप में सामने आ जाएगा। जब उसे लगेगा कि कांग्रेस के आरोपों को खारिज करने की उसकी कोशिशें सफल नहीं हो रहीं और पुलिसिया जोर भी इन प्रदर्शनों को काबू नहीं कर पा रहा, तभी वह ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे के विकल्प पर गंभीरता से विचार करेगी। लेकिन क्या सरकार के सुझाव पर ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दे देंगे? जरूर देंगे।
सरकार से रार नहीं
पहली वजह तो यही है कि ऐसा न करने पर अगर सरकार भी महाभियोग प्रस्ताव के पक्ष में हो गई तो ज्ञानेश कुमार को बचाने वाला कोई नहीं रहेगा। दूसरी वजह यह है कि अगर सरकार की पसंद बने रहे तो मुख्य चुनाव आय़ुक्त पद से हटने के बाद भी उन्हें देर-सवेर कोई और महत्वपूर्ण भूमिका मिल सकती है। लेकिन अगर किसी वजह से यह सरकार ही चली गई तो पद तो जाएगा ही, जेल जाने की नौबत आना भी खास मुश्किल नहीं होगा।
एनडीए दलों पर नजर
हां, जब तक बीजेपी न चाहे, तब तक उन्हें पद से हटाना मुश्किल इसलिए है, क्योंकि एनडीए की सभी पार्टियों का एकजुट समर्थन भी विपक्षी दलों को दो तिहाई बहुमत नहीं दिला सकता। यह अलग बात है कि एनडीए दलों का समर्थन खिसकने के बाद अविश्वास प्रस्ताव पर सामान्य बहुमत से ही यह सरकार गिर जाएगी। तो क्या मोदी सरकार उस तरह की स्थिति बनने का इंतजार करेगी?
(लेखक, वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।)

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