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संपादकीय : फांस कसता जा रहा है!

आधे से अधिक महाराष्ट्र के सूखे की आग में झुलसने के दौरान ही मौसम विभाग ने राज्य के अधिकांश हिस्सों से मानसून की वापसी की आधिकारिक घोषणा कर दी है। सूखे के थपेड़ों के कारण भरे मानसून में किसान मौत को गले लगा रहे थे, ऐसे में कुदरत ने लौटती बारिश के धागे भी काटकर राज्य के किसानों का क्रूर मजाक ही उड़ाया है, ऐसा कहना पड़ेगा। लौटता मानसून जाते-जाते बारिश की थोड़ी-बहुत ही सही, बौछारें तो जरूर करेगा, ऐसी उम्मीद किसान लगाए बैठे थे। मगर वह भी पानी में मिल गई। महाराष्ट्र के ३६ में से बीस से अधिक जिलों में इस साल बारिश की भारी कमी बनी रही। बारिश की इतनी बड़ी किल्लत महाराष्ट्र ने आज तक कभी महसूस नहीं की थी। शुरुआत में ही देर से आए मानसून ने आधे से ज्यादा महाराष्ट्र पर पहले ही दिन से आंखें तरेर ली थीं। इस वजह से एक तो बुवाई टल गई और बुवाई के बाद फिर बारिश जो गायब हुई, वह वापस लौटी ही नहीं। इसके चलते किसानों का खरीफ की बुवाई का खर्च बेकार चला गया। जिनके बीज अंकुरित हुए, उनकी फसलें जुलाई की बारिश में जैसे-जैसे हरी-भरी हो गई थीं। मगर उसके बाद पूरे दो महीने बारिश के ओझल रहने से मराठवाड़ा, विदर्भ और मध्य महाराष्ट्र के लगभग सभी जिलों की फसलें झुलस गर्इं। सोलापुर जिले में तो सूखे ने मानो कोहराम ही मचा रखा है। राज्य में बारिश की सर्वाधिक ५८ प्रतिशत कमी सोलापुर जिले में दर्ज की गई। पूरा सोलापुर जिला सूखे में झुलस रहा था, तब वहां के अधिकारियों ने
पालक मंत्री का सूखा दौरा
आयोजित किया तो सिंचाई की सुविधा वाले एक खेत में। पूरे जिले की फसलें झुलसी हुर्इं होने के बावजूद ठीक सिंचाई की व्यवस्था वाले हरे-भरे खेत को ढूंढकर अधिकारी पालक मंत्री को वहां ले जा रहे हों, तो यह सूखाग्रस्त किसानों का मजाक उड़ाना ही है। सूखे को लेकर राज्य का प्रशासन कितना गंभीर है, यह इसी से साफ होता है। सोलापुर के बाद बीड में ५१, हिंगोली में ४९, जालना में ४८, अहिल्यानगर में ४६, तो धाराशिव जिले में बारिश की ४६ प्रतिशत कमी है। सिंधुदुर्ग जैसे कोंकण तटीय इलाके के सर्वाधिक बारिश वाले जिले में भी इस साल पूरे ३६ प्रतिशत कम बारिश दर्ज हुई। इससे राज्य के अन्य जिलों में अकाल की स्थिति कितनी भयानक है, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। इस साल का मानसून जैसे आया था, वैसे ही खाली हाथ लौट गया। सूखा पीछे छोड़ गया मानसून महाराष्ट्र के सामने जो संकट खड़ा कर गया है, वह बेहद खौफनाक है। इससे पहले महाराष्ट्र ने सूखा और अतिवृष्टि दोनों झेले हैं। मगर इस साल मानसून ने जैसा धोखा दिया है, वैसा पहले कभी नहीं हुआ था। इतनी नाममात्र की बारिश और बारिश की इतनी बड़ी किल्लत राज्य ने कभी नहीं देखी थी। लौटते हुए सूखे मानसून ने राज्यभर के किसानों के हलक का पानी सुखा दिया। मवेशियों के चारे का निवाला छीन लिया। कुओं और तालाबों को सूखा छोड़कर पीने के पानी का भी गंभीर संकट खड़ा कर दिया। अमूमन मुख्य मानसून में कितनी भी कम बारिश क्यों न हो, विदर्भ, मराठवाड़ा, उत्तर महाराष्ट्र और मध्य महाराष्ट्र के जिलों में लौटती बारिश
हर साल यकीनन
होती ही है। आखिरी महीने में होने वाली इसी बारिश पर रबी की फसलों का मौसम टिका होता है। मगर लौटती बारिश का यह वरदान भी कुदरत ने इस साल छीन लिया। आमतौर पर सर्दियों से पहले अक्टूबर महीने में पंद्रह-बीस दिनों के लिए तापमान बढ़ता है। मगर यह ‘अक्टूबर हीट’ इस साल सितंबर से ही शुरू हो गई। पिछले डेढ़ महीने से महाराष्ट्र में हर तरफ कड़कती धूप है। तापमान का पारा गर्मियों की तरह ३६ और ३७ डिग्री पर पहुंच गया है। इस वजह से जंगलों-खेतों में मवेशियों के लायक जो हरी घास उगी थी, वह भी खेतों की फसलों की तरह ही झुलस गई। अक्टूबर महीने में ही मवेशियों के चारे का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। ग्रामीण इलाकों में दो-पांच एकड़ जमीन वाले छोटे किसानों के पास खुद खाने लायक कुछ नहीं उगा, वहां दुधारू मवेशियों और ढोर-डांगरों का हाल तो पूछिए ही मत। महाराष्ट्र ने आज तक कभी नहीं देखा हो, ऐसा आने वाले नौ-दस महीनों का भयानक सूखा पीछे छोड़कर इस साल का मानसून लौट गया है। सूखे से हाहाकार मचा हुआ है, तब लौटती बारिश ही सही, किसानों के आंसू पोंछने दौड़ी चली आएगी, यह आखिरी उम्मीद भी अब टूट गई है। सूखे ने अपना फांस कस लिया है। मराठवाड़ा-विदर्भ में अभी से ही किसानों की खुदकुशी का सिलसिला शुरू हो गया है। सूखा घोषित कर दिया, इसका मतलब सरकार की जवाबदेही खत्म हो गई, ऐसा नहीं है। मानसून लौटा तो खेतों की मेड़ तक पहुंचा शासन भी मंत्रालय लौट आया। सूखे के थपेड़ों में फंसे किसान तुरंत मदद की आस में हैं। वह नहीं मिली तो किसान आखिर जिएं तो वैâसे?

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