-एम एम एस
छत्तीसगढ़ में इस बार गरबा करने से पहले डांडिया चलाना नहीं, नियमावली पढ़ना जरूरी होगा। वक्फ बोर्ड अध्यक्ष डॉ. सलीम राज ने मुस्लिम युवाओं से कहा है कि गरबा में जाएं तो आयोजन समिति की अनुमति लें, मूर्ति पूजा करें, तिलक लगाएं और कलावा बांधें। उन्होंने यह भी समझाया कि गरबा मनोरंजन नहीं, माता की आराधना है।
उधर,ं बजरंग दल ने गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक सहित अपनी मांगों और निर्देशों का पुलिंदा प्रशासन को सौंप दिया। यानी प्रवेश द्वार पर आयोजक कम, धार्मिक पासपोर्ट अधिकारी ज्यादा चाहिए। अगला चरण आधार कार्ड से आस्था जोड़ने और डांडिया पर धार्मिक मुहर लगाने का होगा।
पहला काउंटर पूछेगा, नाम क्या है?
दूसरा, तिलक कहां है?
तीसरा, कलावा बंधा है?
चौथा, आप नृत्य करने आए हैं या पूरी आराधना के भाव से?
यदि कदम ताल में हैं, लेकिन नीयत मनोरंजन की निकली तो प्रवेश संदिग्ध! डांडिया सही पकड़ा है, मगर धार्मिक भावना का प्रमाणपत्र अधूरा है तो वापस जाइए।
वक्फ बोर्ड कह रहा है कि अनुमति लेकर परंपराएं निभाओ, बजरंग दल कह रहा है गैर-हिंदू भीतर न आएं। बेचारा ‘सनातनी मुस्लिम’ दोनों की बात माने तो पहले प्रवेश की अनुमति ले, फिर प्रवेश न करे। इसे कहते हैं शत-प्रतिशत नियम पालन!
सबसे दिलचस्प बात यह है कि ये सरकारी आदेश नहीं, संगठनों की अपीलें और मांगें हैं। फिर भी माहौल ऐसा बनाया जा रहा है जैसे गरबा पंडाल नहीं, सीमा चौकी हो और हर डांडिया राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय।
धार्मिक आयोजन की मर्यादा तथा महिलाओं की सुरक्षा जरूरी है। पहचान छिपाना या छेड़छाड़ करना अपराध है और उस पर कार्रवाई होनी चाहिए। मगर हर व्यक्ति की आस्था नापने के लिए कोई यंत्र अभी बना नहीं है। गजब गरबा होगा… गरबा में संगीत बजेगा या नियमों की उद्घोषणा? आयोजक नृत्य कराएं या वक्फ बोर्ड और बजरंग दल की संयुक्त प्रवेश-परीक्षा लें!
