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दिल्ली लाइव : सुरक्षा की आड़ में सख्ती?

-अरुण कुमार गुप्ता
राजधानी में सुरक्षा के नाम पर बैरिकेड कितने ऊंचे होंगे, प्रदर्शनकारियों पर पहरा कितना सख्त होगा और आम नागरिक की आवाज को कितनी जगह मिलेगी? दिल्ली पुलिस की सुरक्षा रणनीति की समीक्षा के बीच ये सवाल लोकतांत्रिक अधिकारों और कानून-व्यवस्था के संतुलन को लेकर अहम हो गए हैं। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक में महिला सुरक्षा, संगठित अपराध, नशा तस्करी और विरोध प्रदर्शनों के प्रबंधन जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई। लेकिन सवाल यह भी है कि सुरक्षा की समीक्षा के साथ पुलिस की जवाबदेही की समीक्षा कितनी जरूरी मानी जा रही है? राजधानी में अपराधियों, नशा तस्करों और संगठित गिरोहों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता। महिलाओं की सुरक्षा और आम लोगों का निर्भय आवागमन पुलिस की प्राथमिक जिम्मेदारी है। मगर कानून-व्यवस्था बनाए रखने की आड़ में शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों के अधिकार प्रभावित नहीं होने चाहिए। किसी भी प्रदर्शन में पुलिस की कार्रवाई का आकलन उसके उद्देश्य से ही नहीं, बल्कि उसके तरीके और अनुपात से भी होना चाहिए। दिल्ली में राजनीतिक प्रदर्शनों और चुनावी मुद्दों पर विरोध के बीच पुलिस की भूमिका लगातार चर्चा में रही है। भीड़ को नियंत्रित करना पुलिस का काम है, लेकिन प्रदर्शनकारियों को रोकने, हिरासत में लेने या बल प्रयोग करने के पैâसलों में स्पष्ट नियम और पारदर्शिता भी जरूरी हैं। यदि किसी कार्रवाई पर सवाल उठते हैं, तो उनकी निष्पक्ष जांच और जवाबदेही तय होनी चाहिए। राजधानी की सुरक्षा केवल सड़कों पर पुलिस बल बढ़ाने या बैरिकेड लगाने से सुनिश्चित नहीं होती। नागरिकों का भरोसा भी उतना ही जरूरी है। सरकार और पुलिस को यह स्पष्ट करना होगा कि सुरक्षा व्यवस्था शांतिपूर्ण विरोध को बाधित किए बिना वैâसे लागू होगी।
वोट का अधिकार कैसे से बचेगा?
दिल्ली की ड्राफ्ट मतदाता सूची से ४७,५६,७२२ नाम बाहर होने के आंकड़े ने चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेष गहन पुनरीक्षण के तहत १.४५ करोड़ से अधिक मतदाताओं वाली सूची में से करीब ४७.६ लाख नाम ड्राफ्ट सूची में शामिल नहीं हैं। अब प्रभावित मतदाताओं के लिए ३० अक्टूबर तक दावा और आपत्ति दर्ज कराने का अवसर है। चुनाव अधिकारियों के मुताबिक, घर-घर जाकर गणना के दौरान जिन मतदाताओं के फॉर्म नहीं मिल पाए, उन्हें अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत या दोहरी प्रविष्टि जैसी श्रेणियों में रखा गया, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि इन श्रेणियों में दर्ज हर नाम की वास्तविक स्थिति की जांच कितनी प्रभावी ढंग से हुई? किसी पात्र मतदाता का नाम गलती से छूट गया हो, तो उसे वापस जोड़ने की प्रक्रिया आसान और समयबद्ध होनी चाहिए। चुनाव अधिकारियों ने छूटे हुए पात्र मतदाताओं के नाम शामिल कराने के लिए फॉर्म-६ के जरिए आवेदन और दस्तावेज जमा करने की व्यवस्था की है। बूथ लेवल अधिकारी भी दोबारा सत्यापन अभियान में लगाए गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, २२ अक्टूबर तक फॉर्म-६ के २,५०,७५४ आवेदन मिले थे। इनमें नए मतदाता और एसआईआर के दौरान छूटे नामों को जुड़वाने वाले लोग, दोनों शामिल हैं।

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