-नागरिकों की मानव-श्रृंखला ने सरकार से पूछा-जरूरत साबित किए बिना हजारों पेड़ क्यों काटे जाएं?
उमन गुप्ता
ठाणे में प्रस्तावित इंटीग्रल रिंग मेट्रो को लेकर नागरिकों का विरोध अब सड़क से प्रशासन के दरवाजे तक पहुंच गया है। लगातार दूसरे सप्ताह ठाणेकरों ने पोखरण रोड नंबर-२ पर मानव-श्रृंखला बनाकर परियोजना का विरोध किया। नागरिकों का सवाल सीधा है। जब मेट्रो लाइन ४ और ५ पहले से निर्माणाधीन हैं, तो शहर के भीतर एक और रिंग मेट्रो की जरूरत आखिर किस आधार पर तय की गई?
विरोध का सबसे बड़ा मुद्दा पेड़ों की कटाई है। आंदोलनकारियों के मुताबिक, परियोजना के लिए करीब ३,९०० पेड़ों को काटने की अनुमति दी गई है। पर्यावरण कार्यकर्ता रोहित जोशी ने आरोप लगाया कि पिछले छह महीनों से ठाणे में नागरिक प्रतिनिधित्व वाली ट्री अथॉरिटी कमेटी गठित नहीं हुई है और ऐसे में पेड़ों की कटाई को लेकर प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। यानी एक तरफ सरकार मुंबई महानगर क्षेत्र को आधुनिक, तेज और हरित बनाने का दावा कर रही है, दूसरी तरफ विकास परियोजनाओं की कीमत अगर हजारों पेड़ों से वसूली जाएगी तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
‘पहले साबित करो, फिर पेड़ काटो’
आंदोलनकारियों का तर्क है कि मेट्रो लाइन ४ और ५ पूरी होने के बाद उनकी वास्तविक यात्री क्षमता और उपयोगिता का आकलन किया जाना चाहिए। उसके बाद ही नई रिंग मेट्रो की आवश्यकता पर पैâसला हो। नागरिकों ने ठाणे की बस सेवा को मजबूत करने, उसकी आवृत्ति बढ़ाने और उन इलाकों तक कनेक्टिविटी पहुंचाने की मांग भी की है, जहां सार्वजनिक परिवहन कमजोर है।
परियोजना समर्थकों का तर्क है कि इसका उद्देश्य ठाणे की आंतरिक यातायात समस्या कम करना है। लेकिन विरोध कर रहे नागरिक पूछ रहे हैं कि क्या ट्रैफिक कम करने के नाम पर पर्यावरणीय कीमत अनिवार्य है? यह सवाल इसलिए भी गंभीर है क्योंकि ठाणे पहले ही तेजी से बढ़ते शहरीकरण, ट्रैफिक, पानी और प्रदूषण की चुनौतियों से जूझ रहा है।
विकास बनाम पर्यावरण की असली परीक्षा
महाराष्ट्र में इसी समय डेटा सेंटरों को लेकर भी पर्यावरणीय चिंताएं सामने आ रही हैं। ठाणे के प्रस्तावित बड़े डेटा सेंटर के खिलाफ स्थानीय नागरिक पानी, बिजली, गर्मी और शोर को लेकर विरोध कर चुके हैं। राज्य सरकार अब डेटा सेंटरों के लिए अलग नीति और पर्यावरणीय मानक तैयार करने की दिशा में बढ़ रही है। ऐसे माहौल में ठाणे मेट्रो का विवाद सरकार के लिए सिर्फ एक स्थानीय परियोजना का मामला नहीं रह गया है। यह इस बड़े सवाल की परीक्षा है कि महाराष्ट्र का विकास मॉडल आखिर वैâसा होगा। कंक्रीट का जंगल या नागरिकों के लिए रहने लायक शहर? सरकार को परियोजना के विरोध को विकास-विरोधी बताकर खारिज करने के बजाय लागत, यात्री क्षमता, पेड़ों की संख्या, वैकल्पिक मार्ग और पर्यावरणीय प्रभाव का पूरा हिसाब जनता के सामने रखना चाहिए। क्योंकि ठाणेकरों का सवाल सिर्फ ३,९०० पेड़ों का नहीं है, सवाल यह है कि विकास के नाम पर अगली बार कितने पेड़ काटे जाएंगे और उसकी कीमत कौन चुकाएगा?
