सामना संवाददाता / मुंबई
मरीज बीमारी से लड़ने के लिए दवा खरीदता है, लेकिन महाराष्ट्र में कुछ दवा कारखानों की हकीकत ने इलाज के भरोसे को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है। एफडीए की ताबड़तोड़ कार्रवाई में ६२ दवा निर्माण इकाइयों के लाइसेंस रद्द किए गए हैं। जून से अगस्त २०२६ के बीच हुई जांच में दवा बनाने से लेकर बेचने तक की व्यवस्था में गंभीर खामियां सामने आई हैं। एफडीए ने इस दौरान राज्यभर में २,९०२ निरीक्षण किए। इनमें ६०७ दवा निर्माण इकाइयां और २,२९५ बिक्री प्रतिष्ठान शामिल थे। कार्रवाई की जद में ८८० प्रतिष्ठान आए। ६७७ लाइसेंस निलंबित और २०३ लाइसेंस रद्द किए गए। रद्द लाइसेंसों में ६२ दवा निर्माण इकाइयों के अलावा १४१ मेडिकल स्टोर शामिल हैं।
मेडिकल स्टोर भी सवालों के घेरे में
दवाओं की बिक्री में भी गंभीर लापरवाही सामने आई। बिना बिल और जरूरी प्रिस्क्रिप्शन के दवाएं बेची गर्इं। एक्सपायर्ड दवाएं बिक्री योग्य स्टॉक के साथ रखी मिलीं। इंसुलिन और वैक्सीन जैसी तापमान-संवेदनशील दवाओं को जरूरी २ से ८ डिग्री सेल्सियस के बजाय सामान्य तापमान पर रखने के मामले भी पकड़े गए। फडीए ने १०४ छापेमारी और जब्ती अभियान चलाकर करीब ११.४१ करोड़ रुपए की अवैध दवाएं और कॉस्मेटिक्स जब्त किए। २० एफआईआर दर्ज हुर्इं और २१ लोगों को गिरफ्तार किया गया।
अब सरकार से जवाब चाहिए!
एफडीए आयुक्त तुकाराम मुंढे ने मरीजों की सुरक्षा और दवाओं की गुणवत्ता को विभाग की प्राथमिकता बताया है। लेकिन सवाल बड़ा है कि ये गड़बड़ियां इतनी देर तक चलती वैâसे रहीं? इन कंपनियों की कितनी दवाएं बाजार में पहुंचीं? कितने मरीजों तक उनका इस्तेमाल हुआ? क्या बाजार में मौजूद उनके पुराने बैचों की व्यापक जांच होगी?
कहीं रिकॉर्ड गायब, कहीं गुणवत्ता संदिग्ध!
जांच में कई फैक्ट्रियों में पर्याप्त तकनीकी कर्मचारी नहीं मिले। क्वालिटी-कंट्रोल टेस्टिंग में गंभीर खामियां, बैच मैन्युफैक्चरिंग रिकॉर्ड अधूरे और उत्पादन से जुड़े दस्तावेजों में गड़बड़ियां मिलीं। कुछ जगह ‘मानक गुणवत्ता का नहीं’ यानी निर्धारित मानकों पर खरी न उतरने वाली दवाओं के निर्माण के मामले सामने आए। कुछ इकाइयां ऐसी दवाएं भी बना रही थीं, जो उनके लाइसेंस में अधिकृत नहीं थीं। कच्चे माल के वजन से लेकर बैच उत्पादन, परीक्षण, स्टरलाइजेशन और ऑटोक्लेव लॉग तक में विसंगतियां मिलीं। कई जगह दवाओं की वार्षिक गुणवत्ता समीक्षा तक नहीं की जा रही थी।
