-कोर्ट के आदेश की अनदेखी पर क्लर्क और
सेक्शन इंजीनियर को बनाया ‘बलि का बकरा’
-जिम्मेदार बड़े अधिकारियों पर प्रशासन की मेहरबानी
सुरेश गोलानी / मुंबई
संरक्षण आदेश पारित होने के बावजूद स्थानीय भाजपा विधायक नरेंद्र मेहता की कथित शिकायत पर विकास कार्य रोकने का नोटिस जारी करने के मामले में मुंबई उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रवींद्र घुगे और न्यायमूर्ति गौतम अंखड की खंडपीठ ने हाल ही में मीरा-भायंदर महानगरपालिका के आयुक्त राधाबिनोद शर्मा को फटकार लगाते हुए तीखा सवाल पूछा था कि ‘क्या न्यायालय से बड़ा विधायक का आदेश है?’
इस मामले में प्रशासनिक किरकिरी से बचने के लिए मनपा आयुक्त राधाबिनोद शर्मा के आदेश पर आनन-फानन में सेक्शन इंजीनियर सचिन पाटील और विधि विभाग के लिपिक (क्लर्क) स्वप्निल गायकवाड को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, न्यायालय के आदेश की जानकारी दबाने का आरोप मनपा के पैनल में शामिल संबंधित वकील और विधि विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों पर बनता है, लेकिन इन प्रभावशाली विधिक चेहरों पर कार्रवाई करने के बजाय, प्रशासन ने उन्हें एक तरह से क्लीन चिट देकर क्लर्क और सेक्शन इंजीनियर को ‘बलि का बकरा’ बना दिया है। प्रशासन ने गायकवाड के निलंबन का आधार यह बनाया है कि उनके पास विभाग के आवक-जावक (इनवर्ड-आउटवर्ड) पत्रों की जिम्मेदारी थी। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि सेक्शन इंजीनियर सचिन पाटील पर इतनी बड़ी गाज तो गिरा दी गई है, लेकिन इस पूरे मामले में उनकी वास्तविक भूमिका क्या थी, यह बात अब भी पूरी तरह से रहस्य में है। प्रशासनिक गलियारों में अब यह चर्चा जोरों पर है कि क्या मनपा प्रशासन बड़े अधिकारियों व वकीलों को बचाने के लिए निचले स्तर के कर्मचारियों पर कार्रवाई का नाटक कर रहा है। विपक्ष की मांग है कि अगर मामले की निष्पक्ष जांच करनी है, तो फाइलें दबाने और हाई कोर्ट के आदेशों की अनदेखी करने वाले सभी जिम्मेदार विधिक अधिकारियों पर भी समान रूप से कड़ी और दंडात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए।
कठपुतली राज
गौरतलब है कि न्यायालय की फटकार और बड़े अधिकारियों को बचाकर निचले स्तर के कर्मचारियों पर निलंबन की अन्यायपूर्ण कार्यवाही ने फिर एक बार मनपा की भ्रष्ट कार्यप्रणाली और सत्ताधारी भाजपा द्वारा चलाए जा रहे ‘कठपुतली शासन’ में अत्यधिक राजनीतिक हस्तक्षेप का पर्दाफाश करके रख दिया है।
