विशेष प्रतिनिधि / मुंबई
महाराष्ट्र सरकार की आधिकारिक मासिक पत्रिका ‘लोकराज्य’ में भारत रत्न डॉ. भीमराव आंबेडकर की तस्वीर उलटी प्रकाशित होने का मामला अब राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में बड़ा विवाद बन गया है। इसे महज़ प्रिंटिंग मिस्टेक नहीं, बल्कि सरकार की संपादकीय व्यवस्था की अक्षम्य लापरवाही बताया जा रहा है।
सरकार की योजनाओं, निर्णयों और जनकल्याणकारी कार्यों का आधिकारिक दस्तावेज मानी जाने वाली ‘लोकराज्य’ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका में इतनी गंभीर चूक आखिर कैसे हो गई? सबसे बड़ा सवाल यह है कि इसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी तय होगी?
जानकारी के अनुसार, फिलहाल ‘लोकराज्य’ में नियमित संपादक का पद रिक्त है और केवल दो सहसंपादक कार्यरत हैं। ऐसे में अंतिम संपादकीय स्वीकृति और प्रकाशन की जिम्मेदारी सूचना एवं जनसंपर्क महासंचालनालय के महानिदेशक की मानी जाती है। किसी भी अंक को छपाई के लिए भेजने से पहले उसकी अंतिम जांच और अनुमोदन करना महानिदेशक का दायित्व होता है। ऐसे में इस गंभीर चूक की जिम्मेदारी शीर्ष स्तर पर तय किए बिना केवल कनिष्ठ कर्मचारियों पर कार्रवाई करना उचित होगा क्या? यह सवाल अब जोर पकड़ रहा है।
इस विवाद ने वर्ष 2000 की उस घटना की भी याद ताज़ा कर दी है, जब ‘लोकराज्य’ में छत्रपति शाहू महाराज के चित्र के साथ प्रकाशित जानकारी में टाइपिंग की गलती हुई थी। उस समय विधानसभा में भारी हंगामे के बाद तत्कालीन महानिदेशक संजय चहांदे का तत्काल तबादला कर दिया गया था। यदि उस समय शीर्ष अधिकारी को जिम्मेदार माना गया था, तो आज बाबा साहेब आंबेडकर की तस्वीर उलटी छपने जैसी कहीं अधिक गंभीर चूक के मामले में वही कसौटी क्यों नहीं अपनाई जा रही है?
इसी के साथ एक और बहस तेज हो गई है। सूचना एवं जनसंपर्क महासंचालनालय जैसे संवेदनशील विभाग का नेतृत्व पिछले कई वर्षों से भारतीय पुलिस सेवा (IPS) के गैर-मराठी भाषी अधिकारी के पास क्यों है? आलोचकों का कहना है कि यह विभाग कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि शासन की आधिकारिक सूचना, भाषा, संस्कृति और संपादकीय जवाबदेही से जुड़ा है। इसलिए इस पद पर अनुभवी भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के मराठी भाषी अधिकारी की नियुक्ति की जानी चाहिए।
बताया जा रहा है कि वर्ष 2014 से विभाग के सचिव और महानिदेशक के रूप में गैर-मराठी भाषी आईपीएस अधिकारी कार्यरत हैं। अब मांग उठ रही है कि इस व्यवस्था की भी समीक्षा की जाए और विभाग की प्रकृति के अनुरूप प्रशासनिक अनुभव रखने वाले अधिकारी को जिम्मेदारी सौंपी जाए।
सबसे बड़ा सवाल अब यही है कि क्या इस मामले में भी वर्ष 2000 जैसा ही प्रशासनिक मापदंड लागू होगा, या फिर इस बार किसी और को बलि का बकरा बनाया जाएगा? क्या शीर्ष स्तर की जवाबदेही तय होगी या मामला निचले कर्मचारियों तक सीमित कर दिया जाएगा? इन सवालों ने सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया है।
बाबा साहेब आंबेडकर जैसे महान राष्ट्रनिर्माता की तस्वीर से जुड़ी यह घटना केवल एक संपादकीय भूल नहीं, बल्कि शासन की जवाबदेही की भी परीक्षा बन गई है। अब सबकी निगाहें इस पर टिकी हैं कि सरकार निष्पक्ष जांच कर वास्तविक जिम्मेदारों पर कार्रवाई करती है या नहीं।
