भारत जैसे देश में देवताओं और राजनेताओं की संपत्ति दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। खुद को मंदिर ट्रस्टी कहनेवाले लोग देवताओं की संपत्ति के चलते साहूकारी कर रहे हैं। कभी यह पैसा राजनीतिक संस्थानों की तरफ मोड़ दिया जाता है, कभी सरकार इस पैसे पर हाथ सफाई करती है तो कभी मंदिरों का पैसा डूबते सहकारी बैंकों की मदद के तौर पर ऐसे बैंकों में एफडी के तौर पर दिया जाता है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि ये सभी लेन-देन गलत और गैरकानूनी हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट पैâसला दिया है कि मंदिरों में देवताओं के नाम पर जमा धन का इस्तेमाल वित्तीय संकट में फंसे सहकारी बैंकों को बचाने के लिए नहीं किया जा सकता। यह मामला केरल राज्य का है। तिरुनेलवेली देवस्थान का पैसा पांच सहकारी बैंकों में रखे जाने पर बवाल मच गया था। क्या आप बैंकों को बचाने के लिए मंदिर के पैसे का इस्तेमाल करना चाहते हैं? सहकारी बैंक संकट में हैं। ऐसे समय में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि मंदिर के पैसे को एक सक्षम राष्ट्रीयकृत बैंक में रखा जाना चाहिए, जो अधिक ब्याज देता हो। मंदिर का पैसा देवताओं का पैसा है इसलिए उस पैसे को सुरक्षित रखा जाना चाहिए। न्यायालय ने न केवल यह कहा कि इसका उपयोग मंदिर के हित में किया जाए, बल्कि पांच सहकारी बैंकों को मंदिर के सावधि जमा खाते बंद करके पूरी राशि मंदिर को लौटाने का भी आदेश दिया। सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय की तारीफ की जानी चाहिए। देवताओं का धन अंतत: जनता या भक्तों की आस्था से संचित धन है। हालांकि, उस धन के खजाने पर ट्रस्टी बनकर बैठे लोग मनमानी करते हैं और धन का उपयोग वहां करते हैं, जहां उसका उपयोग नहीं होना चाहिए। भाजपा काल में यह होने लगा है कि मंदिर पर आधिपत्य हो, ताकि देवताओं के धन का उपयोग अपने राजनीतिक हितों के लिए किया जा सके। मंदिर का धन करोड़ों-करोड़ों में है और उस धन पर
सरकार की वक्र दृष्टि
पड़ती ही है। मौजूदा सरकार एक व्यापारी है। धन को इस तरह सुरक्षित जमा रखना ‘व्यापार’ नहीं है। मोदी सरकार की भूमिका इस धन से लाभ कमाना है इसीलिए शिवसेना सरकार द्वारा मुंबई महानगरपालिका के खजाने में रखे गए ९० हजार करोड़ रुपए का मजाक उड़ाते हुए मोदी सरकार ने उस पर कब्जा जमा लिया है। प्रधानमंत्री केयर फंड में भी जनता का ही पैसा आया, लेकिन देश अभी भी यह नहीं समझ पा रहा है कि उस पैसे का क्या हुआ। प्रधानमंत्री ने अपना निजी कोष बनाया, लेकिन इसके लिए सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल किया इसलिए हजारों करोड़ रुपए का धन प्रधानमंत्री के निजी ट्रस्ट में आ गया। यहां तक कि यह पता लगाने के लिए कि इस धन का वास्तव में कहां उपयोग किया गया या किया जा रहा है, सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का प्रयास भी विफल रहा। देश के मंदिरों, चर्चों और मस्जिदों में अपार धन है। देश में अमीर मंदिर हैं। तिरुवनंतपुरम का श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर दुनिया के सबसे अमीर मंदिरों में से एक है। इस मंदिर में अरबों डॉलर की संपत्ति है। आंध्र प्रदेश का तिरुपति बालाजी मंदिर, जम्मू-कश्मीर का वैष्णो देवी मंदिर, शिरडी का सार्इंबाबा मंदिर और तमिलनाडु के श्रीरंगम का श्री रंगनाथ स्वामी मंदिर धनी मंदिरों में गिने जाते हैं। इन मंदिरों के बैंक खातों में करोड़ों रुपए जमा हैं। यह धन गुप्त दान देने वाले धनवानों और भक्तों की बदौलत जमा हुआ है। इस धन का उपयोग जनहित में किया जाना चाहिए। कई मंदिर सामाजिक, शैक्षणिक और स्वास्थ्य संबंधी उद्देश्यों के लिए उदारतापूर्वक दान देते हैं। कई मंदिर शैक्षणिक संस्थान और अस्पताल चलाते हैं। इससे गरीब लोगों को लाभ तो होता ही है, बल्कि सरकार भी इन देवताओं के धन से पाली-पोसी जाती है। शिरडी के सार्इंबाबा संस्थान ने महाराष्ट्र सरकार को
पांच सौ करोड़ का कर्ज
दिया। फडणवीस सरकार ने निलवंडे बांध को पूरा करने के लिए सार्इंबाबा मंदिर से कर्ज लिया। राज्य में ऐसा पहली बार हुआ। चूंकि राज्य में रुकी हुई परियोजनाओं को पूरा करने के लिए सरकारी खजाने में पैसे नहीं थे इसलिए फडणवीस सरकार के लिए मंदिरों से कर्ज लेने की नौबत आई। यह कर्ज चुकाया गया या डूब गया यह कोई नहीं जानता। शिरडी मंदिर संस्थान ने भी शिरडी में हवाई अड्डे के निर्माण के लिए महाराष्ट्र हवाई अड्डा विकास कंपनी को ५० करोड़ रुपए दिए थे। देवेंद्र फडणवीस ने निलवंडे बांध के लिए शिरडी मंदिर से ५०० करोड़ रुपए का कर्ज लिया वो ब्याज मुक्त था। यह भी मंदिर के पैसे का दुरुपयोग है, क्योंकि अब तक इस कर्ज का कितना हिस्सा चुकाया गया है? क्या सरकार शिरडी संस्थान से कर्जमाफी के लिए आवेदन करनेवाली है? जनता को इन सवालों के जवाब मिलने चाहिए। शेगांव का गजानन महाराज संस्थान, पंढरपुर का विठ्ठल-रखुमाई मंदिर, मुंबई का सिद्धिविनायक मंदिर जैसे मंदिर समाज को उत्कृष्ट सेवा प्रदान करते हैं। शेगांव मंदिर का कार्य अनुकरणीय माना जाता है, जहां खजाने में एकत्रित धन जनहित में खर्च किया जाता है। इस मंदिर में जमा तिजोरी के एक-एक पैसे का इस्तेमाल जनता की सेवा के लिए किया जाता है। यह ईश्वर सेवा महत्वपूर्ण है। भारत में कुल २० लाख पंजीकृत मंदिर हैं। वहां बड़ी आर्थिक गतिविधि होती है। मंदिरों का वित्तीय कारोबार लगभग ४० अरब अमेरिकी डॉलर का है। इनमें से लाखों मंदिर सरकार के नियंत्रण में हैं। इसके माध्यम से देवताओं के धन का उपयोग किया जाता है और मनचाही राजनीति की जाती है। भाजपा ने इस तकनीक में अच्छी तरह से महारत हासिल कर ली है और लोगों को देवी-देवताओं की राजनीति में उलझाकर रखा है। मंदिरों की समितियों में अपने लोगों को नियुक्त करके, भाजपा और उसके सहयोगी संगठनों ने भगवान, मंदिरों और मंदिरों के पैसों पर अपना कब्जा कर लिया है। क्योंकि लोग ठंडे हैं। जो भी है भगवान देख लेंगे, लेकिन क्या देवता जागे हैं?
