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संपादकीय :हमारे डरपोक बुद्धिजीवी

बिना किसी कारण के आंदोलनकारियों पर लाठियों का प्रयोग न करें, ऐसा सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्पष्ट रूप से कहे जाने के बावजूद दिल्ली और मुंबई की मगरूर पुलिस बेलगाम होकर आंदोलनकारियों की पिटाई कर रही है। लोगों के एकत्र होने और शांतिपूर्ण सत्याग्रह करने पर सुप्रीम कोर्ट ने कोई रोक नहीं लगाई है, लेकिन अमित शाह जैसे माफिया गृहमंत्री ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को पैरों तले रौंदकर सत्याग्रहियों के खिलाफ बर्बर बल प्रयोग शुरू कर दिया है। दिल्ली में महिला सत्याग्रहियों और महिला पत्रकारों के साथ पुलिस ने बेहद निर्दयता से व्यवहार किया। उनके शरीर के साथ पुरुष पुलिसकर्मियों ने छेड़छाड़ की। सांसद जॉन ब्रिटास, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव एम ए बेबी, केरल विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष पी. विजयन जब शांतिपूर्ण तरीके से सत्याग्रह कर रहे थे, तब उन्हें घसीटकर ले जाया गया और जेल वैन में ठूंस दिया गया। सांसद ब्रिटास के साथ पुलिस ने मारपीट की। दिल्ली पुलिस का ही भूत मुंबई पुलिस के सिर पर सवार हो गया। शिवाजी पार्क इलाके में सत्याग्रह से कर रहे बच्चों को क्रूरता से खींचते हुए वैन में बंद कर दिया गया। इसमें बड़ी संख्या में छात्राएं शामिल हैं। ऐसा करके अमित शाह एक तरह से प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ जनता का गुस्सा बढ़ा रहे हैं। खुद प्रधानमंत्री न बन पाने के कारण शाह एक तरह से मोदी से बदला ले रहे हैं। जब युवा सड़क पर उतरकर तानाशाही का विरोध सत्याग्रह कर रहे हैं, उस समय देश की नामचीन हस्तियां अपने आरामदायक जीवन में मस्त हैं। भारतरत्न, पद्मश्री, पद्मभूषण, ज्ञानपीठ और साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता सरकार की कठपुतलियां बन चुके हैं।
`नटवर्य’ और `कलाकार’ मंडली
बच्चों पर हो रहे अत्याचारों को खुली आंखों से देखते हुए दमनकारी नीति का समर्थन कर रही है। हिटलर और मुसोलिनी के दौर में भी वहां के विचारक, लेखक और कलाकार ऐसे ही मुंह में दही जमाकर चुप बैठे थे और बाद में आक्रोशित जनता ने इन तमाम दिखावटी लोगों की अच्छी खबर ली। इस पर हरिशंकर परसाई ने बहुत सटीक बात कही है। वे कहते हैं, `इस देश के बुद्धिजीवी शेर हैं, लेकिन वे सियारों की बारात में बैंड बजाते हैं।’ ये बुद्धिजीवी भारत के हालात खुली आंखों से देख रहे हैं। नब्बे प्रतिशत लोग सरकार की चाटुकारिता में ही भलाई मान रहे हैं। पर्दे और नाटक के नायक बड़े-बड़े भारी-भरकम संवाद बोलते हैं, लेकिन जब देश संकट में होता है, तो अपने मुंह पर टेप चिपकाकर बैठ जाते हैं। `लाडली बहनों’ की तरह ये बुद्धिजीवी भी सरकार के लाभार्थी बने हुए हैं। इनमें से कुछ लोगों की आवाज सामान्य दिनों में बुलंद होती है और वे बेबाकी से अपनी बात रखते हैं। वे देशभक्ति वाली फिल्मों में काम करते हैं, लेकिन जब सत्ताधारियों की मनमानी और गुंडागर्दी शुरू होती है, तब यही मंडली फडणवीस से लेकर मोदी तक के तानाशाहों का गुणगान करने लगती है। इसी वजह से प्रकाश राज, नसीरुद्दीन शाह, इमरान खान और यहां तक कि जया बच्चन जैसे कलाकार अधिक राष्ट्रवादी साबित होते हैं। पूर्व क्रिकेटर संजय मांजरेकर ने भी पुलिस के लाठीतंत्र के खिलाफ मुखर रुख अपनाकर यह दिखा दिया कि उनकी आत्मा अभी जिंदा है। जिन्हें आप और हम `सेलिब्रिटी’ मानते हैं, वे कांच की पुतलियों की तरह बेजान नजर आ रहे हैं। आज ये लोग मोदी-फडणवीस के पक्ष में खड़े हैं, यानी वोट चोरी और
तानाशाही का समर्थन
कर रहे हैं। कल जैसे ही सत्ता बदलेगी, इनके राहुल गांधीवादी या उद्धव ठाकरेवादी बन जाने का डर है। ऐसे अवसरवादियों को तब आसपास भी न फटकने देना ही उन युवाओं के त्याग का सम्मान होगा, जो आज संघर्ष कर रहे हैं और पुलिस तथा अमित शाह के दमनचक्र का शिकार बन रहे हैं। जो बुद्धिजीवी चाटुकारिता के कारण अत्याचार चुपचाप देख रहे हैं, वे समाज के दुश्मन हैं। देश और समाज के लिए उनका कोई उपयोग नहीं है। डरपोक और स्वार्थी लोगों की यह जमात किसी काम की नहीं है। देश में गृहयुद्ध यानी अराजकता जैसी स्थिति पैदा हो गई है। दिल्ली एक पुलिस स्टेशन बन चुकी है। छोटे बच्चों और लड़कियों को बेशर्मी से पीटा जा रहा है। इस पर एक शब्द भी न बोलने वाले प्रधानमंत्री चेन्नई जाकर वहां की `मेट्रो’ का प्रेजेंटेशन देख रहे हैं और विकास पर प्रवचन दे रहे हैं। गृहमंत्री अमित शाह ने खुद को सशस्त्र पुलिस के घेरे में सुरक्षित बंद कर रखा है। वे भी पुलिस की दमनकारी ताकत और जनता के आक्रोश पर कुछ नहीं बोल रहे हैं, बल्कि घर में बैठकर पश्चिम बंगाल, पुडुचेरी जैसे राज्यों के उपचुनावों में बीजेपी की जीत के पेड़े सोशल मीडिया पर बांट रहे हैं। जीत का श्रेय मोदी को देते हुए अकेले ही नाच रहे हैं। इतनी बेशर्मी इन लोगों में आती कहां से है? देश जल रहा है और तानाशाह भूमिगत होकर नाच रहा है! बुद्धिजीवी उन नाचने वालों के पैरों के घुंघरू बनकर `छम-छम’ कर रहे हैं। भारतरत्न, पद्मश्री और ज्ञानपीठ वालों, देश तुम्हारी लाचारी और डरपोकपन को कभी नहीं भूलेगा! सबका रिकॉर्ड रखा जा चुका है!

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