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फडणवीस की पुलिस बनी मूकदर्शक… सीएम के दत्तक लिए नासिक में गुंडों का राज!

-६ महीनों में २४ लोगों की हुई हत्या…महायुति सरकार के संरक्षण में पल रहे अपराधी

सुनील ओसवाल / मुंबई

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने जब नासिक को दत्तक शहर घोषित किया था, तब उम्मीद थी कि कुंभनगरी को एक नया विकासमूलक आयाम मिलेगा, लेकिन दो सालों में नासिक जिस रास्ते पर चल पड़ा है, उसने उस उम्मीद को खून और कोयते की गलियों में दफना दिया है। यह वही नासिक है, जहां संतों की पदचाप गूंजती थी, अब वहीं कट्टे और चाकुओं की धमक सुनाई दे रही है।
नासिक में बीते दो वर्षों में ७८ हत्याएं और केवल छह महीनों में २४ जान जाने के ये आंकड़े महज संख्या नहीं, बल्कि उस गिरते हुए प्रशासनिक ढांचे की तस्वीर हैं, जो महाराष्ट्र सरकार के गृह विभाग के अधीन है। गृह मंत्रालय खुद मुख्यमंत्री फडणवीस के पास है। बावजूद इसके नासिक की सड़कों पर जब कोयते नाचते हैं तो पुलिस व्यवस्था मूकदर्शक बन जाती है।
औद्योगिक क्षेत्र अबड, सातपुर ये पहले कामगारों की पहचान थे, अब ये हफ्ता वसूली और दिनदहाड़े लूटमार के केंद्र बन गए हैं। रेस्टोरेंट हों या दुकानें कोई सुरक्षित नहीं। गुंडे हफ्ता मांगते हैं और मना करने पर चाकू से हमला कर देते हैं। टोली बनाकर हमला करना आम बात हो गई है।
सबसे गंभीर सवाल यह है कि नासिक में भाजपा के तीन विधायक होने के बावजूद हालात बदतर क्यों हैं? आरोप है कि कई कुख्यात आपराधिक छवियों वाले नेता, जिनके स्वागत में पहले पायदान बिछाए गए, अब भाजपा की छाया में फल-फूल रहे हैं। जब सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन के पास जिले में चार मंत्री हों, फिर भी नासिक बिना पालक मंत्री के नौ महीने से चल रहा हो तो यह सिस्टम की असफलता नहीं, बल्कि सिस्टम की अनदेखी मानी जाएगी।
राजनीतिक गठजोड़ बनाम अपराध
मंत्री गिरीश महाजन पर आरोप है कि उन्होंने आगामी महानगरपालिका चुनाव में सत्ता हासिल करने के लिए राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले आपराधिक चेहरों को पार्टी में जगह दी। जगदीश पाटील, उद्धव निमसे, सुधाकर बडगुजर, मामा राजवाडे और अशोक सातभाई जैसे पूर्व नगरसेवक, जिनके खिलाफ गंभीर अपराध दर्ज हैं, भाजपा के हैं।
इसी शहर में कभी कुलवंत कुमार सरंगल नामक एक पुलिस आयुक्त था, जिसने गुंडों की कमर तोड़ दी थी। मकोका लगाकर ५७ संगीन अपराधों में लिप्त अपराधियों को जेल की हवा खिलाई थी।
क्या कुंभ की पुण्यनगरी को नशे और नफरत की भेंट चढ़ाया जा रहा है?
नासिक, जहां हर १२ साल में कुंभ मेले में लाखों श्रद्धालु आते हैं, वहीं शहर अब नशे का ट्रांजिट पॉइंट बनने की ओर बढ़ रहा है।
प्रश्न जो सत्ता से पूछे जाने चाहिए
 जब गृह मंत्रालय मुख्यमंत्री के पास है तो अपराधियों को खुली छूट क्यों मिल रही है?
 क्या नासिक को सच में दत्तक लिया गया था या केवल एक राजनीतिक नारा था?
 क्या अपराधियों को सत्ता का संरक्षण प्राप्त है?
 क्या कुंभनगरी अब केवल एक चुनावी मुद्दा बनकर रह गई है?
याद आ रही है सरंगल की कार्यशैली
आज जब नासिककर भय के साए में जी रहे हैं, तब उन्हें २०१२ की सरंगल कार्यशैली की याद आ रही है। सवाल उठता है कि क्या वर्तमान सत्ता में वह इच्छाशक्ति बची है, जो अपराध के खिलाफ खड़ा हो सके या फिर क्या नाशिक को गुंड़ों की राजधानी के रूप में ही भविष्य के नक्शे में जगह दे दी जाएगी।

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