मुख्यपृष्ठस्तंभतड़का : शिक्षा संस्थाएं कब सुधरेंगी?

तड़का : शिक्षा संस्थाएं कब सुधरेंगी?

कविता श्रीवास्तव

शिक्षा किसी भी देश की सबसे मजबूत नींव होती है। स्कूली किताबें बच्चों के विचारों को आकार देती हैं और परीक्षाएं उनकी मेहनत तथा योग्यता को परखने का माध्यम होती हैं। लेकिन जब यही दोनों व्यवस्थाएं सवालों के घेरे में आने लगें तो चिंता स्वाभाविक है। हाल के वर्षों में शिक्षा क्षेत्र से जुड़े कई विवादों ने यह सोचने पर मजबूर किया है कि आखिर देश की जिम्मेदार शैक्षणिक संस्थाओं में सब कुछ ठीक चल रहा है या नहीं! हाल ही में राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की आठवीं कक्षा की सोशल साइंस की किताब में न्यायपालिका से जुड़े एक हिस्से को लेकर विवाद खड़ा हुआ। बच्चों को देश की न्याय व्यवस्था, संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाओं के विषयों को प्रस्तुत करने में संतुलन और संवेदनशीलता नहीं बरती गई। उसमें नकारात्मक तथ्य शामिल किए। इस पर आपत्ति उठी। कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया। विवाद के बाद एनसीईआरटी ने माफी मांगी। किताब की समीक्षा की और संशोधित संस्करण जारी किया। नए संस्करण में न्यायपालिका की संवैधानिक भूमिका, उसकी स्वतंत्रता, सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट, जनहित याचिका और न्याय पाने के संवैधानिक उपायों की पाठ्य सामग्री है। यह सुधार स्वागत योग्य है, लेकिन सवाल यह है कि ऐसी स्थिति पैदा ही क्यों हुई? किताब तैयार करने से पहले विशेषज्ञों, शिक्षाविदों और जिम्मेदार समितियों ने इस पहलू पर गंभीरता से विचार क्यों नहीं किया? यह केवल एक किताब का मामला नहीं है। पिछले कुछ समय में प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक, परीक्षा प्रक्रिया में अनियमितता और परिणामों को लेकर उठे विवादों ने लाखों छात्रों के भविष्य और मेहनत पर असर डाला है। जिन राष्ट्रीय संस्थाओं पर युवाओं के सपनों की जिम्मेदारी है, उन्हीं संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर सवाल उठना गंभीर चिंता का विषय है। शिक्षा संस्थानों की चूक सामान्य गलती नहीं होती। एक गलत प्रश्नपत्र, एक गलत पाठ या एक गलत संदेश लाखों विद्यार्थियों को प्रभावित कर सकता है। इसलिए शिक्षा से जुड़ी संस्थाओं को नैतिक जिम्मेदारी भी निभानी होगी। यह भी सोचने की जरूरत है कि बार-बार सुधार की नौबत क्यों आती है? क्या संस्थाओं के भीतर समीक्षा और जवाबदेही की व्यवस्था कमजोर हो चुकी है? क्या विशेषज्ञों की नियुक्ति और निगरानी प्रक्रिया में सुधार की जरूरत है? हर बार अदालत या बाहरी हस्तक्षेप के बाद ही सुधार होना किसी भी मजबूत व्यवस्था के लिए अच्छा संकेत नहीं है। न्यायपालिका का हस्तक्षेप कई बार जरूरी होता है, लेकिन शिक्षा से जुड़ी संस्थाएं खुद इतनी सजग हों कि विवाद पैदा होने से पहले ही कमियों को पहचान लें। देश का भविष्य स्कूलों में तैयार होता है। इसलिए किताब लिखने वालों से लेकर परीक्षा कराने वाली संस्थाओं तक हर व्यक्ति को यह समझना होगा कि वे केवल कागज और प्रश्नपत्र नहीं संभाल रहे, बल्कि करोड़ों बच्चों के सपनों और विश्वास की जिम्मेदारी उठा रहे हैं। शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता, जवाबदेही और संवेदनशीलता ही जनता का भरोसा मजबूत करती है।

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