-राजन पारकर
महंगाई की मार से आम आदमी पहले ही बेहाल है, ऊपर से महंगी ईएमआई और घटती बचत ने उसकी कमर तोड़ दी है। सरकार विकास के बड़े-बड़े दावे कर रही है, अर्थव्यवस्था की रफ्तार के ढोल पीटे जा रहे हैं, लेकिन सवाल यह है कि इस विकास का फायदा आखिर किसे मिल रहा है? आम आदमी की थाली महंगी हो रही है, बच्चों की पढ़ाई और इलाज का खर्च बढ़ रहा है और घर खरीदने का सपना लगातार दूर खिसकता जा रहा है। आमदनी सीमित है, लेकिन खर्चों की रफ्तार लगातार बढ़ रही है। ऐसे में परिवारों के लिए जरूरतें पूरी करना भी चुनौती बनता जा रहा है।
बैंक से कर्ज लेकर घर खरीदने वालों के लिए ब्याज दरों में मामूली बढ़ोतरी भी बड़ा झटका बन जाती है। ५० लाख रुपए के २० साल के कर्ज पर ८.५ प्रतिशत ब्याज की तुलना में ९ प्रतिशत ब्याज होने पर मासिक ईएमआई करीब १,६०० रुपए बढ़ सकती है। यह रकम किसी संपन्न व्यक्ति के लिए मामूली हो सकती है, लेकिन सीमित वेतन में घर चलाने वाले परिवार के लिए महीने का बजट बिगाड़ने के लिए काफी है। ईएमआई, राशन, बिजली, बच्चों की फीस और स्वास्थ्य खर्च के बीच आम आदमी की आर्थिक आजादी लगातार सिमट रही है।
दूसरी ओर, बचत पर मिलने वाला ब्याज भी महंगाई की रफ्तार को मात नहीं दे पा रहा। यदि जमा पर ७ प्रतिशत ब्याज मिल रहा है और महंगाई ६ प्रतिशत है, तो कर कटने से पहले वास्तविक लाभ बेहद सीमित रह जाता है। यानी मेहनत की कमाई बचाने वाला व्यक्ति भी अपनी क्रयशक्ति खो रहा है। भविष्य की जरूरतों, बच्चों की शिक्षा और बुढ़ापे के लिए बचत करना भी कठिन होता जा रहा है।
अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें, रुपए की कमजोरी और आपूर्ति में बाधाएं आम आदमी की मुश्किलें और बढ़ा सकती हैं। इनका असर परिवहन, खाद्य पदार्थों और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर पड़ सकता है। ऐसे में सरकार की जिम्मेदारी सिर्फ विकास के आंकड़े गिनाना नहीं, बल्कि रोजगार के अवसर बढ़ाना, वेतन में सुधार करना और खेती, आवास, स्वास्थ्य तथा शिक्षा पर बढ़ते खर्च का समाधान करना भी है।
विकास तभी सार्थक है, जब उसका लाभ आम नागरिक तक पहुंचे और उसकी जिंदगी आसान बने। केवल बड़े आर्थिक आंकड़ों से जनता का पेट नहीं भरता। आखिर सवाल यही है, अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ रहा है, तो आम आदमी की जिंदगी का बोझ कब घटेगा?
