इतना बरसे मेघ बावरे, भीगा घर-आंगन।
घिर-घिर आए काले बादल, बोझिल हुआ गगन,
नदियां छोड़ किनारों को बढ़ आईं मगन,
जाने कैसी भीड़ उमड़ी बूंदों के संग-संग।
इतना बरसे मेघ बावरे, भीगा घर-आँगन।
छोटे भाई-सी हवाएं दौड़ीं गली-गली,
डाली-डाली थाम रही थी भीगी पगडंडी,
फुनगी-फुनगी कहती जैसे कब जायें ये क्षण ।
इतना बरसे मेघ बावरे, भीगा घर-आंगन।
धरती मां की छाती भर-भर आंसू बहते,
सोंधी गंध में भीगे सपने गुपचुप रहते,
ममता, जैसे बांध तोड़कर, बहती हर क्षण
इतना बरसे मेघ बावरे, भीगा घर-आंगन।
दूर खड़े हरियाले खेतों, जैसे मौन पिता,
लहरों में भी पढ़ते मन की मौन व्यथा,
बाढ़-सा उमड़ा मन, पर शब्द हुए करुण।
इतना बरसे मेघ बावरे, भीगा घर-आंगन।
सरसर करती सखियां बनकर रोती पवन,
छोटी बहनें कोंपल जैसी थामे उसका मन,
भीगे वन में गूंज रहा ,सुख संग दुख भी सघन ।
इतना बरसे मेघ बावरे, भीगा घर-आंगन।
-डॉ. शोभा स्वप्निल खंडेलवाल
सायन-मुंबई
