प्रसिद्ध कलाकार जोड़ी रमेश देव और उनकी पत्नी सीमा देव मराठी और हिंदी दोनों ही दर्शकों के चहेते थे। कला प्रेमी इस दंपत्ति के दोनों पुत्र पिछले ४० वर्षों से अभिनय, निर्माण और निर्देशन के क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर रहे हैं। अजिंक्य देव एक बेहतरीन अभिनेता हैं, जबकि अभिनय देव एक जाने-माने विज्ञापन फिल्म निर्माता और बॉलीवुड के प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक हैं। अजिंक्य देव हाल ही में रिलीज हुई फिल्म ‘प्रहार: उज्ज्वल निकम की अनकही कहानी’ में संयुक्त पुलिस कांस्टेबल राकेश मारिया की भूमिका के लिए चर्चा में हैं। ५ नवंबर को अजिंक्य बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘रामायण’ में ऋषि विश्वमित्र की भूमिका में नजर आएंगे। इसके अलावा, लंदन में फिल्माई गई मराठी फिल्म ‘आसा मी आशी मी’ भी कुछ अन्य परियोजनाओं को लेकर चर्चा में है। अजिंक्य ने चार दशकों से अधिक समय तक मराठी, हिंदी और अंतरराष्ट्रीय फिल्मों में अपने अभिनय से बहुमुखी प्रतिभा को नई परिभाषा दी है।
ऐतिहासिक कृति ‘सरजा’ में उनके दमदार अभिनय ने उन्हें राज्य पुरस्कार दिलाया। ‘अर्धांगी’ से अपने अभिनय की शुरुआत से लेकर ‘घायल’, ‘माहेरची साड़ी’ और ‘लपंडाव’ जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्मों में अपनी प्रभावशाली उपस्थिति तक, उन्होंने अपनी गहन गंभीरता और आकर्षण से पर्दे पर अपनी छाप छोड़ी है। उन्होंने ८० और ९० के दशक में एक सशक्त नायक के रूप में अपनी पहचान बनाई। अजिंक्या ने हर किरदार में अपनी कलात्मकता का विस्तार किया है, चाहे वह ‘तानाजी : द अनसंग वॉरियर’ जैसी फिल्म हो या भव्य धारावाहिक ‘२४’, या बहुप्रतीक्षित आगामी फिल्म ‘१२० बहादुर’ में उनके प्रभावशाली किरदार ब्रिगेडियर । एक दूरदर्शी निर्माता, जिन्होंने टेलीविजन कार्यकारी और पटकथा लेखक के रूप में पर्दे के पीछे रहकर फिल्म उद्योग को दिशा दी है। एक कुशल अभिनेता और निर्माता।
अजिंक्य देव से पूजा सामंत की हुई बातचीत के प्रमुख अंश-
अजिंक्य, फिल्म प्रहार सरकारी वकील उज्ज्वल निकम के जीवन पर आधारित है।
आपने फिल्म ‘प्रहार – उज्ज्वल निकम की अनकही कहानी’ में संयुक्त पुलिस आयुक्त राकेश मारिया की भूमिका निभाई। मेरे दो सवाल हैं-आपको यह फिल्म कैसे मिली? क्या इसके लिए आपको कोई तैयारी करनी पड़ी?
अभिनेता सिकंदर खेर मेरे अच्छे दोस्त हैं। जब मैं उनसे बातचीत कर रहा था, तभी एक सज्जन सिकंदर से मिलने आए। सिकंदर और उस व्यक्ति ने एक-दूसरे को गले लगाकर अभिवादन किया और उसी समय सिकंदर ने मेरा उनसे परिचय कराया। वह सज्जन निर्देशक-लेखक और प्रसिद्ध छायाकार अविनाश अरुण थे। बेशक, मैं अविनाश अरुण से पहले कभी नहीं मिला था। उस मुलाकात के कुछ दिनों बाद, अविनाश अरुण ने मुझे फोन किया और मेरे साथ काम करने की इच्छा व्यक्त की और मुझे फिल्म ‘प्रहार’ में कमिश्नर राकेश मारिया की भूमिका दी। उसके बाद मैंने अविनाश अरुण की फिल्में नियमित रूप से देखीं और मुझे एहसास हुआ कि उनका काम उत्कृष्ट है।
मैंने राकेश मारिया से ‘प्रहार’ में राकेश मारिया का किरदार निभाने के लिए मुलाकात की थी। इससे पहले भी मैं कमिश्नर का किरदार निभा चुका था। पता नहीं क्यों, लेकिन जब आप पुलिस की वर्दी पहनते हैं, तो किरदार, देशभक्ति और कर्तव्य की भावना जागृत हो जाती है। इसीलिए मुझे पुलिस अधिकारी का किरदार निभाना बहुत पसंद है। जब मैं पुलिस की वर्दी पहनकर सेट पर आता हूं, तो सेट पर मौजूद हर कोई कहता है, पुलिस की वर्दी में मेरी पर्सनैलिटी उभर कर आती है… मैं बिल्कुल असली पुलिस अधिकारी जैसा दिखता हूं। खैर, मेरे पिता चाहते थे कि मैं पुलिस विभाग में काम करूं। मुझे पायलट बनना था, लेकिन मैं अभिनेता बन गया। मैं भी पुलिस अधिकारी नहीं बना, मैं भी संयोग से अभिनय के क्षेत्र में आ गया।
फिल्म प्रहार पर काम करते समय अविनाश अरुण के साथ काम करना कितना अलग अनुभव था?
हर निर्देशक का काम करने का तरीका अलग होता है। नई पीढ़ी के फिल्म निर्माता बेहद बुद्धिमान हैं, उनके पास बेहतरीन विचार हैं और वे उन्हें साकार करने में भी सक्षम हैं। उनकी फिल्में प्रासंगिक होती हैं, वे आत्मकथात्मक होती हैं, खेल-विज्ञान कथा पर आधारित होती हैं। वे सेट पर अपने अभिनेताओं के सुझावों को ध्यान से सुनते हैं। उनके बीच हमेशा सामंजस्य और टीम भावना स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
एक दर्शक के तौर पर मैं भी यह सवाल पूछना चाहती हूं कि रामायण की कहानी पीढ़ियों से सभी भारतीयों को ज्ञात है। हमें रामायण कितनी बार देखनी चाहिए? तो ५ नवंबर को रिलीज होने वाली है, इस रामायण में नया क्या होगा?
‘रामायण’ की कहानी, यह राष्ट्रप्रेम, पति-पत्नी प्रेम, भाई-पुत्र प्रेम का प्रतीक है। ये सभी उदाहरण दर्शाते हैं कि एक राजा कैसा होना चाहिए। विश्वभर के लोग रामायण से प्रेम करते हैं। रामायण हमारा खजाना है, हमारा संग्रह है। नमित मल्होत्रा इसके निर्माता हैं, उन्होंने कहानी के साथ-साथ कलात्मकता का भी उत्कृष्ट प्रदर्शन किया है। फिल्म ‘रामायण’ में दर्शक पहली बार रावण के बचपन को देखेंगे। वाल्मीकि रामायण पर आधारित इस फिल्म के विशेष प्रभाव अद्भुत और आश्चर्यजनक हैं। इसमें देवी-देवता, महान पुरुष, संत, राक्षस, जानवर और पक्षी सभी दिखाई देंगे।
इसमें आपको रावण के व्यक्तित्व के अनगिनत पहलू देखने को मिलेंगे। अभिनेता यश को रावण के रूप में देखना एक अद्भुत अनुभव होगा। उन्होंने रावण का किरदार बखूबी निभाया है। रणबीर-श्रीराम, साई पल्लवी-सीता, सनी देओल-हनुमान, सभी ने बेहतरीन अभिनय किया है। साई पल्लवी के अभिनय में सीता की पवित्रता और शालीनता झलकती है।
आप एक वरिष्ठ कलाकार हैं। क्या आपको रामायण के लिए ऑडिशन देना पड़ा था? या चयन प्रक्रिया आसान थी?
– जी हां, मैंने ऑडिशन दिया था, लेकिन बात कुछ इस तरह थी कि मैंने शुरू में राजा दशरथ के लिए ऑडिशन दिया था। कुछ साल पहले जब मैंने ऑडिशन दिया था, तब मेरे पिता रमेश देव जीवित थे। मैं अपने पिता से बात करते हुए थोड़ा हिचकिचा रहा था कि मुझे राजा दशरथ के लिए ऑडिशन क्यों देना चाहिए? मुझे कोई खास दिलचस्पी नहीं थी। यह देखकर कि मुझे ऑडिशन देने की ज्यादा इच्छा नहीं है, मेरे पिता ने कहा, जाओ और ऑडिशन दो! उनके आग्रह पर मैंने राजा दशरथ के लिए ऑडिशन दिया। आपको जो भूमिका मिलती है, वही आपका काम है। यही एक कलाकार का भाग्य होता है। आपको अपने काम को स्वीकार करना चाहिए, लेकिन उस समय मैंने ऋषि विश्वामित्र की भूमिका के लिए ऑडिशन दिया और मेरा चयन हो गया। मुझे विश्वामित्र की भूमिका चुनौतीपूर्ण लगी और इसे करने के बाद मुझे एहसास हुआ कि अगर मैंने इसे छोड़ दिया होता, तो मेरा यह निर्णय गलत साबित होता।
क्या आपको ऋषि विश्वामित्र के लिए कोई तैयारी करनी पड़ी थी?
– मैंने कोई तैयारी इसलिए नहीं की, क्योंकि निर्देशक नितेश तिवारी अपनी हर परियोजना के लिए पूरी तैयारी करते हैं और उन्होंने रामायण पर कम से कम १० साल शोध किया है। उन्होंने हर किरदार का गहराई से अध्ययन किया है। मैंने विश्वामित्र का किरदार उन्हीं के सोच के अनुसार निभाया। मैंने निर्देशक के कहे अनुसार ही अपनी भूमिका निभाई, जो बिल्कुल सही था।
रामायण की पवित्रता को बनाए रखने के लिए अभिनेताओं को अपने वास्तविक जीवन में कितनी पवित्रता बनाए रखनी चाहिए?
एक सच्चा अभिनेता अपने हर किरदार के प्रति समर्पित होता है, किरदार का दायरा मायने नहीं रखता। महत्वपूर्ण बात यह है कि उसे निभाते समय किरदार के प्रति निष्ठा बनी रहे। इसलिए किरदार के प्रति वफादार रहना आवश्यक है। लेकिन यह ध्यान रखना चाहिए कि आजकल एक अभिनेता एक साथ कई परियोजनाओं में व्यस्त रहता है, इसलिए उसके लिए अपने अभिनय में निरंतरता बनाए रखना महत्वपूर्ण है। इसीलिए अपने सभी किरदारों के साथ न्याय करना जरूरी हो जाता है। कभी-कभी एक फिल्म में मुझे लड़ाई का दृश्य करना होता है, तो कभी रोमांटिक दृश्य। इसीलिए एक ही किरदार के प्रति शुद्धता बनाए रखना, एक ही तरह का अभिनय करते रहना संभव नहीं है।
रणबीर कपूर (राम), यश (रावण), साई पल्लवी (सीता) जैसे सभी अभिनेताओं के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा?
-बहुत बढ़िया था। मुझे कभी समझ नहीं आता कि रणबीर कपूर सेट पर इतने शांत रहकर अपने किरदार में कैसे ढल जाते हैं। मेरे पिता रणबीर के परदादा पृथ्वीराज कपूर, राज कपूर के साथ काम कर चुके हैं। इतना ही नहीं, मेरे माता-पिता ने भी ऋषि कपूर के साथ फिल्में की हैं। हाल ही में मैंने करिश्मा के साथ वेब सीरीज ‘ब्राउन’ में काम किया, अब मैंने रणबीर के साथ ‘रामायण’ की है। हमारा परिवार कपूर परिवार के साथ घनिष्ठ संपर्क में आया और हमारा एक गहरा रिश्ता बन गया। कपूर परिवार बहुत ही पेशेवर है, अभिनय उनके खून में है, यह बात दोबारा कहने की जरूरत नहीं है।
रामायण में यश को रावण के रूप में देखना एक अनूठा अनुभव होगा। अगर आप मुझसे पूछें कि मुझे कौन सा किरदार सबसे ज्यादा पसंद है, तो वो यश का रावण का किरदार है। उन्होंने इस किरदार में गहरे रंग भर दिए हैं।
साईं पल्लवी ने सीता के किरदार के साथ पूरा न्याय किया है। उनमें एक सात्विक सुंदरता है, जो सीता की भूमिका के लिए आवश्यक है।
आप हिंदी और मराठी फिल्मों में लगातार काम कर रहे हैं। क्या आपको लगता है कि बॉलीवुड में हमारे मराठी कलाकारों की कमी है? ऐसा लगता है कि दक्षिण भारतीय कलाकारों ने पैन इंडिया स्टार बनने की होड़ जीत ली है। आपको क्या लगता है कि मराठी कलाकारों में क्या कमी है?
चाहे दक्षिण भारतीय भाषा हो, पंजाबी हो या कोई और भाषा, दुनिया के किसी भी सिनेमा उद्योग में अब कोई सीमा नहीं बची है। हमारे कई कलाकार हॉलीवुड में काम करते हैं। दक्षिण भारतीय कलाकार हिंदी फिल्मों में काम करते हैं और हिंदी फिल्म उद्योग के कलाकार आसानी से दक्षिण भारतीय फिल्म उद्योग में काम पा लेते हैं। लेकिन फिर भी मुझे लगता है कि मराठी कलाकारों को थोड़ा और प्रयास करना चाहिए। उन्हें अपने दायरे को बढ़ाना चाहिए और काम व फिल्में हासिल करनी चाहिए। उन्हें अनुशासित, आत्मनिर्भर, आकर्षक, फिट और स्वस्थ रहना चाहिए। उन्हें एक कलाकार के रूप में अपनी छाप छोड़नी चाहिए। उन्हें अपने काम पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। मराठी फिल्म इंडस्ट्री के सुपरस्टार लक्ष्मीकांत बर्दे ने हिंदी में अपार सफलता हासिल की। नाना पाटेकर इसका एक बड़ा उदाहरण हैं। वे अपनी शानदार एक्टिंग की बदौलत हिंदी में सुपरस्टार बने। मेरे पिता रमेश देव, मा सीमा, नीलू फुले, ये सभी कलाकार हिंदी में बहुत लोकप्रिय हुए। ९३ साल की उम्र में भी मेरे पिता अपनी सेहत और व्यायाम का पूरा ख्याल रखते थे। उनकी जीवनशैली भी उल्लेखनीय थी। उन्होंने कभी किसी चीज को हल्के में नहीं लिया। मैं भी अपना ख्याल रखता हूं। जब लोग मुझे देखते हैं, तो मुझे पता होता है कि वे मुझे रमेश देव के बेटे के रूप में मुझे देखते हैं।
आप सोशल मीडिया पर कितने सक्रिय हैं? आजकल, कलाकारों की कास्टिंग सोशल मीडिया पर फॉलोअर्स देखकर की जाती है।
मैं सोशल मीडिया पर सक्रिय हूं, लेकिन मैं इसे हद से ज्यादा नहीं होने देता। अगर मुझे अपनी आने वाली फिल्म या वेब सीरीज का प्रचार करना होता है, तो मैं करता हूं। लेकिन चाहे कास्टिंग डायरेक्टर हों या फिल्म डायरेक्टर, सोशल मीडिया फॉलोअर्स देखकर कास्टिंग करना गलत है। किरदार के लिए अभिनय आना जरूरी है, सिर्फ बहुत सारे फॉलोअर्स होना कोई कला नहीं है!
क्या आपके माता-पिता ने जान-बूझकर आपको फिल्मों में काम करने के लिए नहीं कहा होगा?
ऐसा बिल्कुल नहीं हुआ। मैं बहुत शर्मीला था। मेरे स्कूल में शिक्षक मुझे खींचकर माइक पर भाषण करने को कहते थे। तुम रमेश देव के बेटे हो, अच्छे से भाषण करो! लेकिन मैं भाग जाता था। मुझमें सभा की अध्यक्षता करने की क्षमता नहीं थी। मैं पायलट बनना चाहता था, मैंने विज्ञान लिया और विदेश पढ़ने चला गया। मेरे परिवार के पसंदीदा अभिनेता अमिताभ बच्चन हैं। हम उनके संवादों की कैसेट बार-बार बड़े चाव से सुनते थे। मेरी मौसी के घर में वरिष्ठ निर्देशक राजदत्त मेहमान आये थे, उन्होंने मेरे पिताजी से कहा, जब घर में अभिनेता है, तो उसे ‘सरजा’ में क्यों न लॉन्च कर दें? उससे पहले मैंने फिल्म ‘अर्धांगी’ की थी और मेरे पिताजी ने मुझे ‘सरजा’ में लॉन्च किया। मुझे इस भूमिका के लिए महाराष्ट्र राज्य पुरस्कार मिला था।
आपके माता-पिता अभिनय जगत के दिग्गज हैं, आपने उनसे किस प्रकार के मूल्य और परंपराएं विरासत में पाई हैं?
मेरे माता-पिता ने अपने अभिनय करियर से प्रसिद्धि पाई, मुझे और अभिनय को पाला-पोसा और हमें अपनी इच्छानुसार करियर बनाने की स्वतंत्रता दी। अभिनय मूल रूप से पेशे से आर्किटेक्ट है ,लेकिन वे विज्ञापन फिल्म मेकर और फिल्म मेकर बने। मैं कम्प्यूटर इंजीनिएर विदेश से पढ़कर आया, लेकिन संजोग से अभिनेता बना। माता -पिता दोनों ने सुखमय जीवन व्यतीत किया और अपने पोते-पोतियों को पढ़ाया-लिखाया और उनका पालन-पोषण भी किया। मां एक साधारण महिला थीं, बेहद अच्छी मां, गृहिणी और शानदार अभिनेत्री थीं, जबकि पिताजी एक आकर्षक व्यक्तित्व के धनी थे। पिताजी के कुछ संस्कार थे, हमारे घर में देर रात तक जागना, फिल्मी माहौल या शराब जैसी कोई बात नहीं थी। उन्होंने अंत तक शराब को हाथ नहीं लगाया। हाल ही में जब उनकी एंजियोप्लास्टी हुई, तो डॉक्टर ने कहा कि थोड़ी सी शराब पी लीजिए। तब उन्होंने अनिच्छा से चांदी के गिलास से एक घूंट ली। ९३ वर्ष की आयु तक उन्होंने कभी व्यायाम नहीं छोड़ा। वे समयबद्ध जीवन को सुखी जीवन की कुंजी मानते थे। घर के बाहर उनका आकर्षण बेमिसाल था। जब मैं छोटा था, तो दिवाली की खरीदारी के लिए अपनी मां के साथ दादर के रानडे रोड गया था। रात के आठ या एक बज रहे होंगे। जब बाबा हमें कार में लेने आए, तो रानडे रोड पर उनकी एक झलक पाने के लिए भीड़ उमड़ पड़ी थी। उनकी लोकप्रियता असाधारण थी। उन्होंने मुझे यह सिखाया: अपने काम को महत्व दो, किसी भी काम से ऊबने की बात मत कहो। सोच-समझकर बोलो। वास्तु कहती है, ठहमें अपने काम का सम्मान करना चाहिए।
तो आपको अभिनय की प्रतिभा अपने माता-पिता से विरासत में मिली है, है ना?
आज मैं और अभिनय अपने-अपने क्षेत्रों में उन्हीं की बदौलत हैं। सारा श्रेय उन्हीं को जाता है। मैंने तैरना और गाड़ी चलाना एक इत्तेफाक से सीखा। बाबा मुझे होराइजन होटल ले जाते थे तैरना सिखाने के लिए। शुरू में तो मुझे थोड़ा डर लगता था, लेकिन एक बार डूबने से बच गया और उस दिन से तैरना सीख गया! आप घोड़े को पानी तक तो ले जा सकते हैं, लेकिन घोडे को पानी खुद पीना होगा। अभिनय सिखाने या नकल करने से नहीं आता। यह खून में होना चाहिए!
अजिंक्या, आपने नायक से लेकर खलनायक तक, चरित्र अभिनेता के रूप में कई तरह की भूमिकाएं निभाई हैं। क्या यह स्ट्रेटेजी थी आपकी ?
नहीं, क्योंकि मेरे पास कोई रणनीति नहीं थी। मैंने अपने पिता के कहने पर अपनी क्षमता के अनुसार, सर्वश्रेष्ठ भूमिकाएं निभाईं। आज कोई भी अभिनेता एक ही तरह की भूमिकाओं तक सीमित नहीं है। पहले अभिनेता एक ही तरह की भूमिकाओं तक सीमित हो जाते थे। उस समय मैंने ‘माहेरची साड़ी’ जैसी फिल्म की थी जिसमें मैं नायिका के भाई की भूमिका में था। साथ ही, मैंने कई मराठी फिल्मों में नायक की भूमिका निभाई। हिंदी में मैंने चरित्र अभिनेता, खलनायक, पुलिस अधिकारी जैसे विभिन्न प्रकार के किरदार निभाए। हाल ही की फिल्म .. ‘प्रहार’ में मैं पुलिस आयुक्त था, ‘रामायण’ में विश्वामित्र और ‘१२० बहादुर’ में ब्रिगेडियर ये सभी भूमिकाएं बिल्कुल अलग हैं।
आप पिछले चालीस वर्षों से लगातार हिंदी/मराठी फिल्म उद्योग में काम कर रहे हैं। आपको सबसे ज्यादा कौन से बदलाव नजर आते हैं?
बदलाव तो होंगे ही। ये अपरिहार्य हैं, लेकिन हम सबको इन बदलावों से सीखना चाहिए। नए निर्देशक, निर्माता, लेखक हर जगह काम कर रहे हैं, चाहे वो ‘मिर्ज़ापुर’ हो, ‘धुरंधर’ हो या ‘सैयारा’। ये फिल्में नई पीढ़ी के फिल्म निर्माताओं की हैं। पुराने अनुभवी फिल्म निर्माता अब नहीं रहे, जो हैं वो फिल्में नहीं बना रहे। दर्शकों की पीढ़ी बदल गई है, लेकिन यह बदलाव सुखद लगता है। हमें सोशल मीडिया। इसका अत्यधिक उपयोग नहीं करना चाहिए। एआई का उपयोग जागरूकता के साथ करना चाहिए, क्योंकि एआई में भावनाएं दिखाना संभव नहीं है।
आपकी निजी जिंदगी कैसी चल रही है?
-बहुत बढ़िया। मेरी पत्नी आरती देव अभिनेत्री नहीं हैं, लेकिन एक सफल व्यवसायी के रूप में उन्होंने शानदार काम किया है। हमारी बेटी तान्या एक स्पेशल चाइल्ड है और अब वह २७ साल की है। वह हमारे जीवन की अपार खुशियाँ है। बचपन से ही उसकी मां ने उसकी देखभाल की है। अब वह काफी आत्मनिर्भर हो गई है। आरती विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए एक स्कूल चलाती हैं। इसके पीछे हमारा मकसद समाज में अपना योगदान देना है। बेटा आर्य उनके साथ अभिनय के क्षेत्र में काम कर रहा है। हम देव परिवार जीवन और अपने करियर से मिलने वाली खुशियों का आनंद ले रहे हैं, और यह सब माता सीमा और पिता रमेश देव के आशीर्वाद से संभव हुआ है।
