-हृदयनारायण दीक्षित
हमारे अंतर्जगत का काव्य है भाव। भाव जगत् बाह्य जगत् से भिन्न है। बाह्य जगत् में वस्तुएं हैं, पदार्थ हैं, रूप और आकार हैं। उनके नाम हैं, गुण हैं। वे उपयोगी या अनुपयोगी हैं, लेकिन भाव जगत् में रूप, आकार या पदार्थ नहीं होते। यहां तर्क की जगह नहीं। उचित-अनुचित का विमर्श नहीं। हरेक व्यक्ति का अपना अंतर्मन है और अपना स्वभाव। स्वभाव की नदी मधुरसा है। मधुरसा में नौका विहार का अपना आनंद है। भावधारा के अनुसार बहें तो क्या कहना? स्वभाव के प्रवाह में बहना प्रतिपल आनंदमग्न रहना है। स्वभाव के अनुसरण में गति करना ही स्वाभाविक कहा जाता है और इसके विपरीत चलना या बहना अस्वाभाविक। स्वयं के प्रवाह की उल्टी दिशा में स्वयं ही चलना स्वाभाविक नहीं होता। भाव महत्त्वपूर्ण है। यह अंतर्जगती यथार्थ है। भाव का न होना ‘अभाव’ कहा जाता है। यों रोटी, कपड़ा या अन्य सामान्य सुविधाओं का न होना भी अभाव कहा जाता है, लेकिन ऐसा उचित नहीं जान पड़ता। वस्तुएं नहीं होतीं तो भी स्वभाव होता है।
वस्तुओं का होना ‘भाव’ नहीं है। वस्तुओं का न होना भी ‘अभाव’ नहीं। संभवतः भाव की महत्ता के चलते ही वस्तुओं या पदार्थों के न होने को भी अभाव कहा जाता है। इस तरह गरीबी को भी अभाव कहा जाता है। लेकिन गरीबी और अभाव पर्यायवाची नहीं हैं। प्रसन्नता भाववाचक होती है। इसका संबंध भाव से ही है, गरीबी या अमीरी से नहीं। भारत में कुछेक वस्तुओं या सेवाओं की उपलब्धता के आधार पर ‘गरीबी की रेखा’ है।
भावप्रवणता, प्रकृति के रूप, रंग, रस, गंध में आनंद लेने वाले गरीब भी प्रसन्न भाव में होते हैं और अंतस् भाव से पृथक् अमीर भी अप्रसन्न होते हैं। लेकिन दुनिया के किसी भी देश में प्रसन्नता की रेखा नहीं है। सकल घरेलू उत्पाद या जीडीपी अर्थशास्त्र का तकनीकी शब्द है। इसका संबंध सकल राष्ट्रीय उत्पादन से है। भारत की जीडीपी संतोषजनक रहती है, लेकिन प्रसन्नमना भावप्रवण लोगों की संख्या कम है। टेलीविजन के विज्ञापनों में लंबे बालों की दवा, महकती त्वचा या सुगंध भरती स्प्रे के असर में बेशक लोग चहकते दिखाई पड़ते हैं, लेकिन यही उत्पाद उपभोक्ता को प्रसन्न नहीं करते।
प्रसन्नता भाव जगत् का आस्वाद है। भीतर का मधुरस ही उफनाकर बाहर प्रसन्नता लाता है। लेकिन अर्थशास्त्र व समाज विज्ञान में भीतर की प्रसन्नता की माप नहीं की जाती। संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी एक संस्था ने वैश्विक प्रसन्नता सूचकांक जारी किया है। इस अध्ययन में स्वस्थ जीवन, सामाजिक सुरक्षा, जीवनशैली के चुनाव की स्वतंत्रता आदि विषयों को सम्मिलित किया गया है। स्वस्थ जीवन निस्संदेह प्रसन्नता का आधार है। भारतीय चिंतन में ‘स्वस्थ’ का भावार्थ भी स्वास्थ्यवर्द्धक दृष्टिकोण है। यहां ‘स्वस्थ’ का भावार्थ है—स्वयं में होना। जैसे गृहस्थ का भावार्थ है घर में होना और संन्यस्थ का अर्थ है संन्यास में होना, वैसे ही स्वस्थ का अर्थ स्वभाव में होना है। बेशक सामाजिक असुरक्षा अप्रसन्न करती है, दुख भी देती है, लेकिन सामाजिक सुरक्षा में प्रसन्नता की गारंटी नहीं। ‘पराधीन सपनेहु सुख नाहीं’ वाली बात सही है, लेकिन स्वतंत्रता भी प्रसन्नता की गारंटी नहीं। ‘लिव-इन’ प्रत्यक्ष रूप में स्त्री-पुरुष संबंधों की स्वतंत्रता है। इस स्वतंत्रता के उपभोग में आनंद मिलना चाहिए, लेकिन इसमें तनाव ही तनाव है।
भारतीय चिंतन में प्रसन्नता आंतरिक है। वह बाह्य कारकों का ही परिणाम नहीं है। उपनिषद् साहित्य में बाह्य कारणों से मिली प्रसन्नता का उल्लेख है, लेकिन अंतःकरण की निष्कामता से प्राप्त आनंद को उससे हजारों गुना ज्यादा बताया गया है। सभी कलाएं आनंदवर्द्धन हैं। रूप का आस्वाद आनंदित करता है, रस का आस्वादन रोम-रोम पुलकित करता है। गंध का प्रसाद अंतःकरण को भी पुलकित करता है। काव्य, गीत भाव उद्दीपन करते हैं। भाव रूपहीन, रसहीन और गंधहीन होते हैं, लेकिन अपनी परिपूर्णता में वे आनंद का शिखर भी बनते हैं। कवि के सृजन में वे नया रूप भी धरते हैं। प्रसन्नता की इस संपदा का मूल्यांकन संयुक्त राष्ट्र या अर्थशास्त्र, समाज विज्ञान से जुड़ी कोई संस्था नहीं करती। वे इसे कोरी भावुकता कह सकते हैं। वे भारतीय दर्शन और अनुभूति पर भी भाववाद का आरोप लगाते हैं। सो प्रसन्नता के वास्तविक सूचकांक तक उनका कोई सूचकांक नहीं पहुंचता।
भाववाद को प्रायः अच्छा नहीं कहा जाता। वाद बौद्धिक विचार होते हैं। वादों का विकास विचार प्रणाली में ही होता है। कोई भी तर्क संपूर्ण नहीं होता। उसका प्रतितर्क होता है और वितर्क भी। तर्कप्रिय लोग सतर्क होते हैं। तथ्य, अनुमान और उपलब्ध ज्ञान ही उनके उपकरण हैं। भाव जगत् में तर्क नहीं होते। यहां अंतर्जगत की सहमति ही मुख्य साक्ष्य होती है। तर्क-प्रतितर्क से बने वाद या इज्म प्रसन्नता का आनंद नहीं देते। भाव का जन्म स्वभाव में होता है। स्वभाव प्रसन्नता का क्षेत्र है। निस्संदेह यही अवसाद और विषाद की भूमि भी है, लेकिन अवसाद या विषाद की वेदना को तर्क की तलवार से नहीं काटा जा सकता। अवसाद संपूर्ण निराशा है, विषाद बाह्य जगत् से भावजगत् में आया अंतर्द्वंद्व है। यहां प्रीति-अप्रीति की टक्कर है। लेकिन प्रीति या अप्रीति के भाव हमारे ही अंगांगी हैं। थोड़ी और गहरी अनुभूति में विषाद की बाधा के तत्काल बाद प्रसाद का क्षेत्र है।
प्रसाद संपूर्णता का परिणाम है। विषाद अपूर्णता का द्वैत-द्वंद्व। भावों का कोई वाद नहीं होता। भाव कोई सिद्धांत नहीं। अभाव सिद्धांतहीनता नहीं। स्वभाव के वृक्ष पर सिद्धांत नहीं, सिद्धि के गंधमादन फूल खिलते हैं। स्वाभाविक ही प्रसिद्धि के भी। सिद्धि के फूल अतिरिक्त गंध के साथ अतिरिक्त रस से आपूरित भी होते हैं। प्रसन्नता परिस्थिति की उपज नहीं। मनुष्य को परिस्थितियों का दास कहना बहुत बड़ी चूक है। परिस्थितियां बाह्य आवरण हैं। उनका अनुकूल या प्रतिकूल होना दिक्-काल की प्रकृति है। प्रसन्नता दिक्-काल का परिणाम नहीं है। हम विषम से विषम विपरीत परिस्थिति में भी प्रसन्न हो सकते हैं और अति अनुकूल परिस्थिति में भी अप्रसन्न हो सकते हैं। प्रसन्नता या अप्रसन्नता हमारे अंतःकरण का ही चयन है।
श्वेताश्वतर उपनिषद् में मनुष्य को आनंदधर्मा अमृत-पुत्र कहा गया है। प्रसन्नता का जीडीपी से कोई संबंध नहीं। चीन की जीडीपी प्रथम स्तर की है, लेकिन ताज़ा प्रसन्नता सूचकांक की सूची में वह ८४वें क्रमांक पर आया है। कुल १५८ देशों के सर्वेक्षण में भारत की प्रसन्नता का सूचकांक ११७वां है। चीन के नागरिक स्वतंत्र नहीं हैं। चीन में एकदलीय सरकार है। चीनी अप्रसन्नता की बात में दम है, लेकिन भारत का प्रसन्नता सूचकांक ११७वें क्रम पर क्यों है? यहां की संस्कृति और सभ्यता उल्लासधर्मा रही है। राष्ट्रजीवन में काव्य, कला, संगीत और दर्शन सहित प्रसन्नता के अनेक अवसर भी हैं। विचार-अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में फेसबुक या ट्विटर पर किसी भी व्यक्ति को नंगा करने की छूट है। जाहिर है कि प्रसन्नता के केंद्र और कारक बाह्य नहीं, अंदरूनी ही हैं।
हम सब दिक्-काल में हैं। वैज्ञानिक शब्दावली में टाइम-स्पेस के प्रभाव में। निस्संदेह हम समय के प्रभाव में हैं, लेकिन हमारा भाव-अंतस् समय के प्रभाव का अतिक्रमण भी करता है। प्रसन्नता और आनंद के भाव में समय न्यून हो जाता है। आनंद की चरम स्थिति में समय होता ही नहीं। दुख या अप्रसन्नता के भाव में समय खुलकर खेलता है। हम उसके दास हो जाते हैं। परिस्थितियों के दास। लेकिन प्रसन्न भाव में वही दास हो जाता है। दिक् या स्पेस भी प्रसन्न भाव के प्रभाव में आते हैं। प्रसन्नता स्वयं में एक बड़ा आयाम है। प्रसन्नता भी टाइम या स्पेस जैसी ही कारक है। प्रसन्नता श्रेष्ठ लब्धि है। प्रसन्न मन सृजन-प्रेरक है और दुखी मन विध्वंसक। हम दुख या क्रोध में ही तोड़फोड़ करते हैं, कप-प्लेट जैसे पदार्थों को भी तोड़ते हैं, स्वयं अपना माथा या सिर कूटते हैं। समय-शून्यता की माता है प्रसन्नता। गति चेतन ही समय है, समय में गति है। समय तनाव है और समय-शून्यता प्रसन्नता। वैदिक साहित्य में इसे ‘अकामहत्’ चित्त-दशा कहा गया है और अकामहत् को गहन प्रसन्नता का स्वाभाविक अधिकारी बताया गया है।
