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शिलालेख : गांधी जी की असफलता

 हृदयनारायण दीक्षित
लखनऊ

मोहनदास करमचंद गांधी बहुत याद किए जा रहे हैं। परसों उनकी १५७वीं जयंती थी। गांधी विश्व इतिहास के अनूठे सत्याग्रही हैं। कृतज्ञ राष्ट्र उन्हें राष्ट्रपिता कहता है। भारतीय मुद्रा पर उनका चित्र छपता है। उन पर बहसें होती हैं। जो समग्रता में विचार करते हैं, वे विश्व इतिहास में गांधी जी को प्रथम मानते हैं। हमारी नई पीढ़ी के एक वर्ग में गांधी की अकारण आलोचना करने की लत है। गांधी पर समग्रता से विचार जरूरी है।
गांधी जी कोई चुनाव नहीं लड़े, किसी पद पर नहीं रहे। चाहते तो देश के प्रधानमंत्री हो सकते थे। लेकिन उन्होंने राष्ट्र सर्वोपरिता को ही ध्येय माना। गांधी जी को असफल नेता कहा जा सकता है। सफलता हमेशा शुभ ही नहीं होती और असफलता हमेशा बुरी ही नहीं। शुभ कार्य में असफल हो जाना श्रेष्ठ है और अशुभ ध्येय में असफल हो जाना बुरा नहीं कहा जा सकता। असली बात ध्येयनिष्ठा है।
गांधी जी विश्व मानवता के नेता थे। वे भारत विभाजन के विरोधी थे, लेकिन देश विभाजन नहीं रोक पाए। मई १९४७ में अरुणा आसफ अली और अशोक मेहता ने गांधी जी से पूछा था कि ‘क्या पाकिस्तान का कोई विकल्प है?’ गांधी जी ने उत्तर दिया, ‘पाकिस्तान का एकमात्र विकल्प अविभाजित भारत है।’ (संपूर्ण गांधी वाङ्मय ८७/४३६) लेकिन गांधी जी अपने ध्येय में असफल रहे। कांग्रेस विभाजन के लिए तैयार थी। उसका उद्देश्य सत्ता हस्तांतरण था। पूरा भारत न सही, कांग्रेस को खंडित भारत की सत्ता पर संतोष था।
गांधी जी सत्याग्रही थे। वे जीवन में सत्य के प्रयोग करते थे। अपने सही आग्रहों के लिए ईमानदारी से लड़ते थे।

वे भारत विभाजन के विरोधी थे, लेकिन विभाजन के समर्थक बने। यहां बड़ा प्रश्न है कि देश विभाजन पर उन्होंने कोई प्रतिरोध क्यों नहीं किया? वे कांग्रेसजनों के प्रस्ताव पर सहमत क्यों हो गए? गांधी जी ने आत्मसमर्पण किया। इसके पीछे क्या रहस्य थे? गांधी जी के लिए आदर्श मूल्यबोध की निष्ठा सफलता से बड़ी थी।
चौरी-चौरा कांड में हिंसा हुई। आंदोलन सफलता की ओर बढ़ रहा था। गांधी जी ने सफलता की परवाह नहीं की। आंदोलन वापस कर लिया। गांधी जी हिंदू-मुस्लिम एकता चाहते थे। इसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए वे खिलाफत आंदोलन में सहयोगी बने। यह दुनिया का सबसे बड़ा सांप्रदायिक आंदोलन था। गांधी जी ने कहा था कि भारत के मुसलमान खलीफा के पद की समाप्ति पर दुखी हैं। गांधी जी स्वतंत्रता संग्राम में मुस्लिम संप्रदाय का सहयोग चाहते थे। खलीफा की गद्दी तुर्किस्तान में थी। भारत में मुसलमानों ने उसको पुनर्जीवित करने की मांग उठाई। गांधी जी ने बिना शर्त समर्थन किया।
तुर्की में खलीफा का पद था। यह विश्व इस्लाम का सबसे बड़ा ओहदा था। कमाल ने खिलाफत का खात्मा किया था। भारत में इसके विरुद्ध मुस्लिम आंदोलन हुआ। गांधी जी ने आंदोलन की अध्यक्षता की। उन्होंने तमाम अन्य मसलों पर भी मुस्लिम संप्रदाय की पक्षधरता की थी। वे हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रति ईमानदार थे। लेकिन मुस्लिम राजनीति लगातार आक्रामक थी। गांधी जी ने ‘यंग इंडिया’ में १९२४ में लिखा, ‘अब जब खिलाफत का प्रश्न खत्म हो गया, मुसलमानों ने हिंदुओं के विरुद्ध एक प्रकार से जिहाद छेड़ दिया है।’ कांग्रेस की विषय समिति में मालाबार हिंदू संहार पर चर्चा हुई। निंदा प्रस्ताव रखा गया। मुस्लिम नेताओं ने विरोध किया।
भारत सरकार के तत्कालीन वरिष्ठ पुलिस अधिकारी पी.सी. वैमफोर्ड ने ‘हिस्ट्री ऑफ खिलाफत एंड नॉन-कोऑपरेशन मूवमेंट’ में लिखा, ‘कुछ तालुकों (क्षेत्रों) में विद्रोहियों ने स्थायी कामयाबी पाई और खिलाफत राज्य की स्थापना की घोषणा की। हिंदू आबादी के विरुद्ध कत्ल, हिंसा, लूट का अभियान चलता रहा।’ कांग्रेस के अनेक नेता चिंतित थे। डॉ. एनी बेसेंट ने लिखा, ‘गंभीर प्रश्न भारत के मुसलमानों का है… हमने यह पाठ सीख लिया है कि उनकी इच्छा भारत में खुदा का राज्य स्थापित करना है।’ सेकुलरवाद ध्वस्त था।
गांधी जी मजहबी आक्रामकता से अवगत थे, लेकिन वे मुसलमानों को भारतीय राष्ट्रभाव से जोड़ने के इच्छुक थे। मजहबी राजनीति में सेकुलरवाद की गुंजाइश नहीं थी। गांधी जी ने ‘यंग इंडिया’ (सितंबर १९२४) में लिखा, ‘क्या मुझ पर यह लांछन नहीं लगाया जा सकता कि मैंने हिंदुओं के साथ विश्वासघात किया है? कितनी बहनें मेरे पास शिकायत लाई कि उन्हें मुस्लिम परेशान कर रहे हैं। मेरी कोई नहीं सुनता।’ क्या वे मुस्लिम आक्रामकता के इतिहासबोध से दूर थे? जो भी हो, वे सत्यनिष्ठ ही थे।
हिंदुत्व को लेकर उनके मन में कोई संशय नहीं था। वे गीता दर्शन के जानकार थे। श्रद्धालु भी थे। वे ईश्वर विश्वासी थे। ईश्वर जिज्ञासु थे। कर्म पर विश्वास करते थे। गांधी जी सभी विचारों, पंथ, मजहब व रिलीजन के प्रति आदरभाव रखते थे। हिंदू को यह भाव हिंदू होने के कारण स्वभाव से ही प्राप्त हो जाता है। गांधी जी ने हिंदू होने का मर्म समझाते हुए पं. नेहरू को यरवदा जेल से १९३३ में पत्र लिखा था, ‘मैं धर्म नहीं छोड़ सकता, इसलिए हिंदुत्व छोड़ना असंभव है। हिंदुत्व के कारण ही मैं ईसाइयत, इस्लाम व अन्य धर्मों से प्रेम करता हूं। इसे मुझसे दूर कर दो तो मेरे पास कुछ भी नहीं बचेगा?’
हिंदुत्व का गांधी आग्रह मूल्यवान है। वे हिंदू-मुसलमानों की साझा राष्ट्रीयता का विकास कर रहे थे। अपने इस ध्येय के लिए काफी कुछ झुक भी जाते थे। उनके इस विचार में राष्ट्रीयता का प्रश्न उच्च ध्येय था। हिंदू उनके विचार का आदर भी करते थे, लेकिन जिन्ना मुसलमानों को अलग राष्ट्र बता रहे थे। बहुसंख्यक मुसलमानों पर जिन्ना की तुलना में गांधी का प्रभाव कम था। गांधी यह सब देश के लिए कर रहे थे और जिन्ना अपनी राजनीति के लिए। दुर्भाग्य से गांधी जी असफल रहे। संविधान बनाने की ब्रिटिश अनुमति के बाद भी सांप्रदायिक दंगे हो रहे थे। गांधी जी से प्रश्न किया गया कि हिंदू-मुस्लिम समस्या को कैसे हल किया जाए? गांधी जी ने कहा, ‘इस मामले में मुझे अपनी हार स्वीकार करनी चाहिए। मैं जानता हूं कि मेरी आवाज कोई नहीं सुनता।’ (वही ८५/३५२)
संविधान सभा को लेकर ब्रिटिश शर्त थी कि संविधान सभा में मुस्लिम लीग और कांग्रेस दोनों को शामिल होना चाहिए। दोनों के सहयोग से ही भारत का संविधान बन सकता था। गांधी जी अंग्रेजों की अनुमति वाली संविधान सभा नहीं चाहते थे। लेकिन कांग्रेस में आंदोलन जारी रखने का दम नहीं था। गांधी जी ऐसा ही चाहते थे, लेकिन असफल रहे। गांधी जी भारत की प्रकृति और संस्कृति वाला भारत चाहते थे। कांग्रेस सत्ता की जल्दबाजी में थी। वह आगे लड़ाई लड़ने की स्थिति में नहीं थी। कांग्रेस अपनी राजनीति के लिए गांधी जी के विराट व्यक्तित्व का उपयोग करती थी, लेकिन उनकी विचारधारा और सत्याग्रह पर कांग्रेस की आस्था समाप्तप्रायः थी। भारत को अभी स्वतंत्रता नहीं मिली थी। पूर्ण स्वतंत्रता के लिए अभी बहुत कुछ करना शेष था। संघर्ष की जरूरत थी, लेकिन कांग्रेस आगे संघर्ष के लिए तैयार नहीं थी। गांधी जी देश व कांग्रेस के सबसे बड़े नेता थे। वे अपनी ही पार्टी को संयम और त्याग के मूलभूत भारतीय आदर्शों के लिए तैयार नहीं कर पाए।
कांग्रेस ने समझौते और आत्मसमर्पण का मार्ग चुना। अंग्रेजों ने अपनी योजनानुसार ही भारत छोड़ने का कार्यक्रम पूरा किया। गांधी जी पाकिस्तान नहीं चाहते थे। भारत को ब्रिटिश तर्ज की राजव्यवस्था मिली। ब्रिटिश संसदीय प्रणाली की आलोचना गांधी जी ने ‘हिंद स्वराज’ में की थी। गांधी जी ने सावधान किया था कि ‘मेरा निश्चित विचार है कि भारत अंग्रेजों की नकल करेगा तो बर्बाद हो जायेगा।’ (वही १०/३१८) गांधी जी ऐसा नहीं चाहते थे, लेकिन वे असफल रहे।

(लेखक उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ साहित्यकार हैं।)

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