-भरतकुमार सोलंकी
क्या भारत को विश्व गुरु बनाने का सपना केवल बड़े-बड़े उद्योगों, आधुनिक शहरों, ऊंची इमारतों और विदेशी निवेश से पूरा हो सकता है? क्या हम कभी उस ग्रामीण भारत की ओर भी देखेंगे, जहां की धरती देश की खाद्य सुरक्षा और अर्थव्यवस्था की बुनियाद है? आखिर खेत ही तो हमारे उत्पादन के सबसे बड़े प्राकृतिक कारखाने हैं। यदि पानी के अभाव में ये कारखाने सूखे और उत्पादनहीन पड़े रहें, तो देश की समृद्धि का सपना कैसे साकार होगा?
जरा सोचिए, हम शहरों में पानी का उपयोग अपनी सुविधानुसार करते हैं। घरों में फ्लश, शॉवर और आधुनिक सुविधाएं हमारी जीवनशैली का हिस्सा हैं। लेकिन जब गांवों में पानी की कमी होती है, तो अक्सर ग्रामीणों को पानी बचाने की सीख दी जाती है। क्या जल संकट का समाधान केवल व्यक्तिगत उपयोग कम करने में है, या प्रकृति से मिलने वाले वर्षाजल को बड़े पैमाने पर संग्रहित करने की व्यवस्था बनाना भी उतना ही जरूरी है?
बेशक, हर बूंद बचाना आवश्यक है। लेकिन जब मानसून में करोड़ों गैलन पानी बहकर नदियों और समुद्र में चला जाता है, तब सवाल उठता है कि हमने उसे रोकने और जरूरत के समय उपयोग करने की कितनी तैयारी की है? क्या बड़े बांधों, जलाशयों, छोटे तालाबों, चेक डैम और भूजल पुनर्भरण की योजनाओं को एकीकृत दृष्टिकोण से विकसित नहीं किया जाना चाहिए? हर क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों, पर्यावरण और स्थानीय जरूरतों के अनुसार जल प्रबंधन की योजना बनाना समय की मांग है। पानी उपलब्ध होगा, तो किसान सिंचाई कर सकेंगे, फसल उत्पादन बढ़ाने की संभावनाएं विकसित होंगी, पशुपालन और ग्रामीण उद्योगों को प्रोत्साहन मिलेगा तथा रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। इससे ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ सकती है और मजबूरी में शहरों की ओर होने वाला पलायन भी कम हो सकता है।
मुंबई और देश के अन्य महानगरों में रहने वाले प्रवासियों की इसमें महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। उन्होंने अपनी मेहनत से व्यापार, संपत्ति और आर्थिक सामर्थ्य अर्जित की है। क्या वे अपने गांवों के विकास के लिए केवल सामाजिक समारोहों और भवनों तक ही योगदान सीमित रखेंगे, या जल प्रबंधन को भी प्राथमिकता देंगे? वे सरकार से वैज्ञानिक सर्वेक्षण, व्यवहार्य बांध परियोजनाओं, जलाशयों और सिंचाई सुविधाओं की मांग क्यों नहीं उठा सकते? अपने मताधिकार का उपयोग करते समय उम्मीदवारों से जल-सुरक्षा और ग्रामीण उत्पादन पर सवाल क्यों नहीं पूछ सकते?
यह भी समझना होगा कि केवल बांध बना देना पर्याप्त नहीं है। परियोजनाओं की लागत, पर्यावरणीय प्रभाव, विस्थापन, जल वितरण और रखरखाव पर भी गंभीरता से विचार करना होगा। स्थानीय समुदायों की भागीदारी से ही पानी का न्यायसंगत और टिकाऊ उपयोग संभव है।
आज जरूरत सोच बदलने की है। पानी केवल बचाने की वस्तु नहीं, बल्कि कृषि उत्पादन, रोजगार और आर्थिक समृद्धि की पूंजी मानना होगा।
याद रखिए, खेत देश के उत्पादन कारखाने हैं और पानी उनकी जीवनरेखा। जब तक गांवों की धरती को पर्याप्त जल और उत्पादन के अवसर नहीं मिलेंगे, तब तक विश्व गुरु बनने का सपना अधूरा रहेगा।
सवाल मेरे हैं जवाब आपके पास हैं।
(लेखक आर्थिक निवेश मामलों के विशेषज्ञ हैं।)
