मुख्यपृष्ठस्तंभनिवेश गुरु: यूलिप, उत्सव या म्यूचुअल फंड?

निवेश गुरु: यूलिप, उत्सव या म्यूचुअल फंड?

भरतकुमार सोलंकी / मुंबई

सबसे बड़ा सवाल यह नहीं कि क्या खरीदें, बल्कि निवेश के बाद क्या करें?
क्या केवल निवेश करना ही पर्याप्त है, या निवेश के बाद रोज उसकी चिंता करना भी जरूरी है? क्या हर दिन मोबाइल पर अपना पोर्टफोलियो देखना समझदारी है या यह केवल मानसिक तनाव बढ़ाने की आदत बन चुकी है? क्या हर गिरावट पर घबराना चाहिए? और क्या केवल इसलिए कोई वित्तीय उत्पाद बेहतर हो जाता है कि उसके साथ ‘गारंटी’ शब्द जुड़ा है?
सच यह है कि हर वित्तीय उत्पाद का अपना उद्देश्य होता है। यूलिप जीवन बीमा और निवेश का मिश्रण है। पारंपरिक योजनाएं निश्चितता पसंद लोगों के लिए उपयुक्त हो सकती हैं, जबकि म्यूचुअल फंड दीर्घकाल में संपत्ति निर्माण का प्रभावी माध्यम साबित हो सकता है। इसलिए तुलना हमेशा समान उद्देश्य वाले उत्पादों के बीच होनी चाहिए, केवल विज्ञापनों के आधार पर नहीं। अक्सर कहा जाता है, ‘म्यूचुअल फंड में पैसा लगाया है तो रोज मार्वेâट देखना पड़ता है।’ लेकिन सवाल यह है कि आखिर क्यों? यदि आपने किसी योग्य वित्तीय सलाहकार की सलाह से सही योजना चुनी है और आपका लक्ष्य १०, २० या ३० वर्ष का है, तो रोज र्‍Aन्न् देखने से आपका रिटर्न वैâसे बढ़ जाएगा? क्या पेड़ को हर घंटे खोदकर देखने से उसकी जड़ें तेजी से बढ़ जाती हैं? बिल्कुल नहीं। एक और सवाल पूछिए। जब आप बैंक में फिक्स्ड डिपॉजिट करते हैं, तो क्या रोज बैंक से पूछते हैं कि आपका पैसा किस उद्योगपति या व्यापारी को ऋण दिया गया? क्या आप प्रतिदिन बैंक का बैलेंस शीट देखते हैं? नहीं। क्योंकि आपने बैंक की विशेषज्ञता पर भरोसा किया है।
ठीक यही सिद्धांत म्यूचुअल फंड पर भी लागू होता है। आपने अपना पैसा किसी फंड मैनेजर को इसलिए सौंपा है क्योंकि उसका काम ही कंपनियों का अध्ययन करना, जोखिम का आकलन करना और निवेश संबंधी निर्णय लेना है। यदि यही सब आपको स्वयं रोज करना पड़े, तो फिर उस विशेषज्ञ टीम और करोड़ों रुपए के वेतन पाने वाले फंड मैनेजर की आवश्यकता ही क्या रह जाएगी? याद रखिए, म्यूचुअल फंड ट्रेडिंग का माध्यम नहीं, बल्कि दीर्घकालिक निवेश का साधन है।
शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव सामान्य हैं। इतिहास बताता है कि जिन्होंने अनुशासन बनाए रखा, नियमित निवेश किया और समय को अपना सबसे बड़ा साथी बनाया, उन्होंने उल्लेखनीय वेल्थ क्रिएशन किया। इसके विपरीत, जो लोग हर दिन बाजार की हलचल पर प्रतिक्रिया देते रहे, वे अक्सर समय भी गंवाते रहे और अपने मूल व्यवसाय या नौकरी पर भी पूरा ध्यान नहीं दे पाए। इसका अर्थ यह नहीं कि निवेश की समीक्षा कभी न करें। समीक्षा आवश्यक है, लेकिन समीक्षा और चिंता में बहुत अंतर है। समीक्षा लक्ष्य के अनुसार होती है, जबकि चिंता भावनाओं के आधार पर। सफल निवेशक भावनाओं से नहीं, बल्कि योजना, अनुशासन और समय से निर्णय लेते हैं।
अंतत: सबसे बड़ा निवेश केवल पैसा नहीं, बल्कि विश्वास, धैर्य और सही मार्गदर्शन है। यदि आपने ज्ञान के आधार पर सही योजना चुनी है, नियमित निवेश कर रहे हैं और बीच-बीच में आवश्यक समीक्षा करते हैं, तो समय आपके पक्ष में काम कर सकता है।
याद रखिए, कभी-कभी सबसे बड़ा मुनाफा रोज बाजार देखने से नहीं, बल्कि सही निर्णय लेकर उसे पर्याप्त समय देने से मिलता है। यही दीर्घकालीन निवेश की सबसे बड़ी शक्ति है।

 

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