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गजबे है : `साहब, बेटे ने मुझे मार दिया है, आप जिंदा कर दो!’

उमा सिंह

मुजफ्फरनगर की सड़कों पर एक ७५ वर्षीय बुजुर्ग आज अपनी पहचान के लिए भटक रहा है। हाथ में कागज हैं, आंखों में थकान है और जुबान पर सिर्फ एक ही गुहार कि कोई उन्हें साबित कर दे कि वे सच में जिंदा हैं। जिस बेटे ने उन्हें कागजों में ‘मृत’ घोषित कर दिया है और जिस सिस्टम ने उस पर मुहर भी लगा दी, उसी के बीच अब उनकी जिंदगी एक अनसुनी लड़ाई बनकर रह गई है। जिंदगीभर जिस घर को उन्होंने अपना माना, आज उसी घर से बेदखल होकर अपनी ही सांसों का हिसाब देने निकले हैं।
उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर से एक ऐसी कहानी सामने आई है, जो सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि इंसान की पहचान, अधिकार और सिस्टम की संवेदनहीनता पर गहरे सवाल खड़े करती है। ७५ वर्षीय एक बुजुर्ग, जो कभी अपने घर-आंगन में सम्मान से जीवन जीता था, आज खुद को ‘जिंदा साबित’ करने के लिए दफ्तरों के चक्कर काट रहा है। उनकी आवाज में थकान है, आंखों में सवाल हैं और चेहरे पर एक अनकही बेबसी। आरोप है कि उनके बेटे ने पहले बुजुर्ग को मृत दिखाकर उनका मकान बेच दिया। जब मामला पुलिस तक पहुंचा, तो दस्तावेजों में भी बुजुर्ग को मृत घोषित कर दिया गया। यहीं से उनकी असल लड़ाई शुरू हुई। एक ऐसी लड़ाई, जिसमें उन्हें अपनी ही जिंदगी साबित करनी पड़ रही है। अब स्थिति यह है कि बुजुर्ग खुद को जीवित साबित करने के लिए अधिकारियों के सामने गुहार लगा रहे हैं।
बुजुर्ग के बेटे जावेद का कहना है कि थाने में हमारे मकान का एक मामला चल रहा है, जो हमारे भाई ने पिता को मृत घोषित कर बैनामा करा लिया था। इस मामले में हमने थाने में शिकायत की, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। थानाध्यक्ष ने भी पिता को मृत बताकर रिपोर्ट लगा दी थी। हमारे भाई पर तो कोई कार्रवाई हुई नहीं, बल्कि हमारा ही १५१ का चालान कर दिया था। यह सिर्फ जमीन या कागज का विवाद नहीं, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है, जो अपने ही परिवार और सिस्टम के बीच अपनी पहचान खो चुका है। उम्र के इस पड़ाव में जहां सहारे की जरूरत होती है, वहां उन्हें अपनी मौजूदगी का सबूत देना पड़ रहा है। अगर कोई इंसान जिंदा होकर भी कागजों में ‘मृत’ हो जाए, तो क्या समस्या सिर्फ दस्तावेजों की है या फिर सोच और सिस्टम दोनों की? वाकई, यहां सब गजबे है भई…!

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