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काशी का शब्द-साधक-समीर अंजान

हिमांशु राज

काशी की मिट्टी में रचे-बसे हिंदी फिल्म जगत के प्रसिद्ध गीतकार शीतला पाण्डेय उर्फ़ समीर अंजान का जीवन बनारस की संस्कृति, संगीत और साहित्य का सजीव दस्तावेज है। उनके शब्दों में आज भी बनारस की माटी की सोंधी महक और गंगा किनारे की सहज मिठास बसती है। हर पंक्ति, हर भाव में काशी का लहजा बोलता है-सीधा, आत्मीय और दिल तक उतर जाने वाला।हरिशचंद्र कॉलेज से प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद समीर जी ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय से वाणिज्य में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की। उनके पिता, जाने-माने गीतकार अनजान जी, ‘आज’ अखबार से जुड़े थे, जहां उनकी रचनाएँ प्रकाशित होती थीं। वहीं से समीर जी की साहित्यिक यात्रा का आरंभ हुआ। जब उनकी पहली ग़ज़ल इसी अखबार में छपी, तो उन्होंने पहली बार महसूस किया कि शब्द उनके आत्मविश्वास की सबसे बड़ी ताकत हैं। वे कहते हैं-‘मेरे लिए “आज” केवल अखबार नहीं, बल्कि जीवन का विश्वविद्यालय था-जहां पत्रकारिता, साहित्य और संवेदना एक साथ सांस लेती थी।’एम काम’ की उपाधि के बाद उन्होंने बैंक की नौकरी की, पर भीतर के कवि ने उन्हें चैन से बैठने नहीं दिया। शब्दों की पुकार इतनी गहरी थी कि एक दिन उन्होंने सब कुछ छोड़कर मुंबई का रुख किया। वहाँ पिता अनजान जी के मार्गदर्शन में उन्होंने हिंदी सिनेमा की दुनिया में कदम रखा। शुरुआत कठिन थी-संघर्ष, अस्वीकृतियां, अकेलापन-पर यही वह आग थी जिसने उनकी कलम को तपाकर सोना बना दिया। धीरे-धीरे समीर अंजान के गीत भारतीय सिनेमा की धड़कन बन गए। प्रेम, विरह, दोस्ती, उम्मीद—हर भावना को उन्होंने सरल और आत्मीय शब्दों में पिरोया।काशी के दिनों में उन्होंने अपने साथियों के साथ ‘मनोरंजन क्लब’ की स्थापना की थी, जो घर-घर जाकर संगीत प्रस्तुतियाँ देता था। वह दौर आज भी उनकी सबसे मधुर स्मृति है। कालभैरव क्षेत्र की मुनक्का की दुकान, गंगा किनारे नाव में बैठकर गीत गुनगुनाना, पान की मीठी खुशबू और खाँटी बनारसी अपनापन-ये सब जीवनभर उनके साथ रहे। जब भी वे मुंबई से बनारस लौटते, पुराने दोस्त मुनक्का और बनारसी पान लेकर एयरपोर्ट पर उनका स्वागत करते। उस पल में वे समीर नहीं, बस अपने शहर का बेटा बन जाते थे।समीर अंजान का नाम ग्रीनिश बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज है-हिंदी सिनेमा में सबसे अधिक गीत लिखने वाले गीतकार के रूप में। यह सम्मान केवल उनका व्यक्तिगत गौरव नहीं, बल्कि काशी की उस सृजनशील धरती का आभार है, जिसने उन्हें शब्दों का साधक बनाया। वे कहते हैं, ‘बनारस मेरे भीतर बसा है। मेरे गीतों की आत्मा वहीं से आती है।’आज भी जब वे गंगा तट पर लौटते हैं, तो वह धरती उन्हें नवजीवन दे देती है। उनके लिए विकास की चमक उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितनी विरासत की छाया। समीर जी का मानना है-‘बनारस सिर्फ मेरी जन्मभूमि नहीं, वह मेरी चेतना है।’ उनके शब्द आज भी उसी शहर की तरह बहते हैं-शांत, प्रवाही, अमर।

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