मुख्यपृष्ठनए समाचारसुप्रीम कोर्ट के निर्देश को नहीं मानते श्रम विभाग के अफसर

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश को नहीं मानते श्रम विभाग के अफसर

राजेश सरकार / प्रयागराज

उत्तर प्रदेश श्रम विभाग के अधिकारी सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश को नहीं मानते। जिस मामले को सर्वोच्च न्यायालय ने स्वत: संज्ञान में लेते हुए जनहित याचिका के रूप में दर्ज करने का आदेश दिया। उस प्रकरण पर उत्तर प्रदेश श्रम विभाग के अधिकारी एवं श्रम मंत्री तक चुप्पी साधे हुए हैं। इस मामले में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी गुमराह किए जाने का प्रयास संबंधित विभाग कर रहा है। इस वजह से उत्तर प्रदेश की औद्योगिक श्रमिक बस्तियों में पिछले 34 वर्षों से वहां के निवासियों को उनके आवासों का मालिकाना अधिकार दिए जाने का मामला आज भी लंबित है। देश के सभी राज्यों ने केंद्र सरकार के आदेश अनुसार उत्तर प्रदेश की औद्योगिक श्रमिक बस्तियों में रहने वाले लोगों को उनके आवासों का मालिकाना अधिकार दिए जाने का आदेश दिया था।

इस आदेश का पालन करते हुए देश के लगभग आधा दर्जन से भी अधिक राज्यों ने लागत मूल्य पर उस प्रदेश के निवासियों को उनके आवासों का मालिकाना अधिकार दे दिया। लेकिन उत्तर प्रदेश श्रम विभाग शासन को गुमराह कर मालिकाना अधिकार दिए जाने में आनाकानी कर रहे हैं। यही नहीं उत्तर प्रदेश श्रम विभाग प्रयागराज कार्यालय ने संयुक्त राष्ट्र संघ एवं सेना द्वारा बनाई गई गाइडलाइन्स एवं मानकों की अनदेखी करते हुए श्रमिक बस्ती में अर्धसैनिक बल पीएसी का शस्त्रागार स्थापित करा दिया है। जहां विस्फोटक सामग्रियों का भी भण्डारण किया गया है। इससे हमेशा विस्फोट होने की आशंका श्रमिकों को भयभीत किए रहती है। संयुक्त राष्ट्र संघ की यह स्पष्ट गाइडलाइन्स है कि कोई भी सैन्य शस्त्रागार नागरिक आबादी से काफी दूर मैदानी क्षेत्र में होना चाहिए। लेकिन उत्तर प्रदेश श्रम विभाग के उपश्रमायुक्त कार्यालय प्रयागराज ने अवैध तरीके से श्रम विभाग की जमीन पीएसी को दे दी। स्थिति यह है की 42वीं वाहिनी पीएसी ने बच्चों के पार्क पर कब्जा कर लिया है।

इस कॉलोनी का निर्माण मजदूरों के लिए किया गया था। श्रम विभाग ने बिना शासन की अनुमति के पीएसी को कैसे दे दिया ? इस सवाल पर पिछले दिनों श्रमिक बस्ती समिति के महासचिव विनय मिश्र ने एक प्रार्थना पत्र सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को कार्रवाई हेतु भेजा था। मामले की गंभीरता और संवेदनशीलता को देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले को जनहित याचिका के रूप में दर्ज करते हुए कार्रवाई का आदेश दिया। सर्वोच्च न्यायालय में भेजे गए पत्र में जो मुद्दे उठाए गए थे। उन मुद्दों को न्यायालय ने तो गंभीरता से लिया। लेकिन पिछले कई वर्षों से श्रम विभाग के अधिकारियों को सैकड़ो पत्र भेजे जा चुके हैं। लेकिन कोई कार्रवाई नहीं करते। उत्तर प्रदेश विधानसभा में इस मामले को उठाया गया। समाजवादी पार्टी के विधायक अरमान अली ने प्रश्न उठाया था। भारतीय जनता पार्टी के विधायक मैथानी साहब भी इस मामले को लेकर कई बार विधानसभा में सवाल उठा चुके हैं। विधानसभा अध्यक्ष ने भी इस मामले में उत्तर प्रदेश के श्रम मंत्री को कार्रवाई करने का आदेश दिया। बैठक भी हुई। लेकिन आज तक इस मामले पर कोई निर्णय नहीं हुआ और अब कहा जा रहा है कि पांच महीने का समय अभी और लगेगा। जबकि दर्जनों बार सर्वे हो चुके हैं। कई बार समितियों की कानपुर में बैठक हो चुकी है। केंद्र सरकार का आदेश व सारे रिकॉर्ड श्रम विभाग के पास है। इनको बैठक कर प्रस्ताव बनाकर शासन को भेजना है। उस प्रस्ताव को भेजने के लिए इतना समय क्यों लग रहा है? प्रदेश के श्रम मंत्री अनिल राजभर, श्रम आयुक्त से लेकर अन्य अधिकारियों को श्रम विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार की शिकायत की जा चुकी है।

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