मनमोहन सिंह
बधाई हो! हम विकास के उस मुकाम पर आ गए हैं जहां प्रकृति को अपग्रेड करने का ठेका ले लिया गया है। ग्रेट निकोबार के शांत जंगलों को अब इंटरनेशनल डेस्टिनेशन बनाने का सपना दिखाया जा रहा है। कागजों पर यह योजना इतनी चमक रही है कि शायद सूरज की रोशनी भी फीकी पड़ जाए। करोड़ों की कमाई, आलीशान बंदरगाह और नीले पानी में तैरते विदेशी जहाजों के सपने सुनने में ऐसा लगता है जैसे धरती पर स्वर्ग उतारने की तैयारी है। बस फर्क इतना है कि इस स्वर्ग के लिए हमें असल के स्वर्ग यानी वहां की जैव विविधता की बलि चढ़ानी होगी।
वहां के कोरल रीफ जो हजारों सालों से समुद्र की रक्षक रही हैं, अब उन्हें शायद यह बताया जाएगा कि उनका अस्तित्व पुराना पैâशन हो चुका है। शोम्पेन और निकोबारी जनजातियां, जो इस मिट्टी की असली वारिस हैं, उन्हें मुख्यधारा का झुनझुना पकड़ाने की तैयारी है। आखिर कंक्रीट के जंगलों के आगे इन हरे-भरे पेड़ों की बिसात ही क्या है? हम उस डाली को काटने चले हैं जिस पर हमारा घर टिका है और इसे हम ग्रेट निकोबार का कायाकल्प कह रहे हैं।
नियम कानूनों की बात करना तो अब दीवार से सिर फोड़ने जैसा है। जब विकास की भूख बढ़ती है तो पर्यावरण के कानून फाइलों में वैâद होकर हाथी के दांत बन जाते हैं, दिखाने के कुछ और खाने के कुछ और।
हम भूल रहे हैं कि प्रकृति जब अपना हिसाब मांगती है तो वह ब्याज समेत वसूलती है लेकिन आज की चकाचौंध में कल की चिंता किसे है?
जब सुनामी जैसी आपदाएं आती हैं, तब हमें याद आता है कि ये कोरल और मैंग्रोव्ज ही हमारे रक्षक थे। पर अभी तो हमें पोर्ट सिटी चाहिए। इस बलिदान को हम विकास का नाम दे रहे हैं, लेकिन याद रहे कि मिट्टी का मोल, कंक्रीट के सिक्कों से कभी नहीं चुकाया जा सकता। चलिए, इस विनाशकारी उत्सव का आनंद लीजिए, क्योंकि जब प्रकृति अपना बदला लेगी, तब हमारे पास न तो यह पोर्ट बचेगा और न ही उसे बचाने के लिए कोई जंगल और हम इंसानों की क्या औकात!
