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महाराष्ट्रनामा : सत्ता के गलियारों में मौन का महाभारत!.. भुजबलों की पीड़ा या सत्ता का गणित?

राजन पारकर

राजनीति में त्याग, संघर्ष और निष्ठा की बातें मंचों पर खूब सुनाई जाती हैं, लेकिन जब टिकट बांटने की बारी आती है तो सिद्धांत अक्सर सत्ता के दरवाजे पर जूते उतारकर खड़े दिखाई देते हैं। छगन भुजबल की राज्यसभा जाने की इच्छा कोई अचानक पैदा हुई महत्वाकांक्षा नहीं थी। दशकों तक पार्टी का झंडा उठाने वाले नेता के मन में यह स्वाभाविक अपेक्षा थी। लेकिन राजनीति में मेहनत की गारंटी नहीं, बल्कि समीकरणों की गिनती होती है। समीर भुजबल का दर्द यही है कि जिन्होंने पार्टी की नींव में ईंटें रखीं, उन्हें अब दीवार पर लगी तस्वीर तक बनने का अवसर नहीं मिल रहा। सवाल यह नहीं कि राजेंद्र जैन को टिकट क्यों मिला। सवाल यह है कि क्या राजनीति में पुराने सिपाहियों की कीमत केवल चुनावी भाषणों तक सीमित रह गई है? सत्ता के बाजार में वफादारी का भाव लगातार गिर रहा है और अवसरवाद का शेयर नई ऊंचाइयां छू रहा है।
शिवराय के नाम पर भी राजनीति!
छत्रपति शिवाजी महाराज का नाम महाराष्ट्र की अस्मिता का प्रतीक है, लेकिन दुर्भाग्य यह है कि आज उसी नाम के मंच पर भी राजनीतिक खींचतान की छाया दिखाई दे रही है। एक उपमुख्यमंत्री को सार्वजनिक कार्यक्रम में निमंत्रण न मिलना महज प्रशासनिक भूल है या राजनीतिक संदेश? यह प्रश्न अब जनता पूछ रही है। मंत्रिमंडल की बैठक में नाराजगी फूट पड़ी, अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग हुई और जांच के आदेश भी जारी हो गए। विडंबना देखिए, जिस शिवाजी महाराज ने स्वराज्य की स्थापना के लिए सभी शक्तियों को साथ जोड़ा, उनके पुतले के अनावरण पर ही सत्ता के सहयोगी दलों के बीच दूरी का प्रदर्शन हो गया। ऐसा लगता है कि आजकल प्रोटोकॉल से ज्यादा महत्वपूर्ण राजनीतिक अहंकार हो गया है। जनता सोच रही है कि यदि सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों के निमंत्रण तक सुरक्षित नहीं हैं तो आम नागरिक की सुनवाई किस दरबार में होगी?
महंगाई का धुआं घर में भर गया!
सरकारें योजनाएं लाती हैं, विज्ञापन देती हैं, उपलब्धियों के आंकड़े गिनाती हैं और फिर धीरे-धीरे नियम बदल देती हैं। जनता को तब पता चलता है, जब उसकी जेब हल्की होने लगती है। उज्ज्वला योजना को गरीब परिवारों के लिए वरदान बताया गया था। लेकिन अब यदि साल भर में मिलने वाले अनुदानित सिलेंडरों की संख्या घटा दी जाती है तो सबसे ज्यादा असर उसी गरीब परिवार पर पड़ेगा, जिसके नाम पर राजनीति की जाती है। दस करोड़ परिवारों को यह संदेश मिला है कि राहत की अवधि सीमित होती है, लेकिन खर्चे स्थायी होते हैं। महंगाई पहले ही रसोई का बजट बिगाड़ चुकी है, ऊपर से सब्सिडी में कटौती ने आग में घी डालने का काम किया है। सवाल यह है कि जब चुनाव आते हैं तब गरीब देश की ताकत बन जाता है, लेकिन फैसले लेते समय वही गरीब सबसे पहले बोझ क्यों बन जाता है?
सत्ता की शतरंज और जनता का मौन
एक तरफ राज्यसभा की राजनीति में पुराने साथी उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। दूसरी तरफ सत्ता के सहयोगी दल सम्मान और निमंत्रण के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उधर आम जनता गैस सिलेंडर की बढ़ती कीमतों और घटती सब्सिडी से परेशान है। राजनीति की शतरंज पर मोहरे बदल रहे हैं, कुर्सियां बदल रही हैं, समीकरण बदल रहे हैं; लेकिन नहीं बदल रही तो केवल आम आदमी की चिंता। सत्ता के महलों में रणनीति बनती है और उसकी कीमत अंतत: जनता अपनी जेब से चुकाती है।

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