राजन पारकर
शादी किसी और से, हाथ किसी और का! और जनता की प्यास के लिए सिर्फ भाषणों की बरसात! महाराष्ट्र की राजनीति में आजकल तीन दृश्य एक साथ चल रहे हैं। एक तरफ नेता जनता से किए वादों की बारात लेकर निकलते हैं, लेकिन रास्ते में किसी और का हाथ पकड़ लेते हैं। दूसरी तरफ लोकतंत्र के नाम पर कुर्सियों की उठापटक चल रही है और तीसरी तरफ मुंबई की जनता आसमान की तरफ देखकर बादलों से पूछ रही है।
`साहब! आप भी किसी गुट में चले गए क्या? क्योंकि बारिश तो दिखाई ही नहीं दे रही!’ यह महाराष्ट्र है जनाब, यहां राजनीति में तूफान जल्दी आता है और पानी देर से!
ऑपरेशन कुर्सी : महत्वपूर्ण हो गया विमान का टिकट!
कभी राजनीति में निष्ठा शब्द का वजन होता था। आज लगता है निष्ठा भी सामान की तरह हो गई है-जहां सुविधा मिली, वहीं शिफ्ट कर दी गई! कल तक जिस दल के नाम पर जनता से वोट मांगे गए, आज उसी दल की दीवार से ईंट निकालकर नया महल बनाने की कोशिश हो रही है।
कहावत थी-`शादी एक से करो और जीवन भर साथ निभाओ।’
लेकिन नई राजनीति कहती है
`शादी एक से करो, मौका मिले तो हाथ किसी और का पकड़कर निकल जाओ!’
जनता बेचैन है कि यह लोकतंत्र है या कोई राजनीतिक स्वयंवर?
जहां हर दिन नया रिश्ता बनता है, नया गठबंधन होता है और पुराने वादों की अर्थी निकलती है।
चार्टर विमान और आम आदमी की बस!
नेताओं के लिए चार्टर विमान तैयार हैं और आम आदमी? वह अभी भी लोकल ट्रेन में धक्के खाते हुए सोच रहा है कि आखिर लोकतंत्र में उसकी सीट कहां है? विमान दिल्ली उड़ते हैं।
फाइलें घूमती हैं, बैठकें होती हैं, लेकिन जनता के सवाल वहीं खड़े रहते हैं।
किसान पूछता है-मेरा क्या?
युवा पूछता है-नौकरी कहां?
मुंबईकर पूछता है-पानी कहां?
लेकिन राजनीति का विमान अक्सर इन सवालों के ऊपर से उड़ जाता है।
वाघ की दहाड़ या सत्ता के बाजार की आवाज?
महाराष्ट्र की मिट्टी ने हमेशा स्वाभिमान की राजनीति देखी है।
यह वही भूमि है, जहां सत्ता से सवाल पूछना अपराध नहीं, परंपरा रही है। लेकिन जब नेता जनता के भरोसे से जीतकर किसी और दिशा में चल पड़ते हैं तो जनता के मन में एक ही सवाल उठता है-`यह परिवर्तन है या अवसर का नया नाम?’ क्योंकि वाघ अपनी दिशा खुद तय करता है, लेकिन बाजार में खड़ा जानवर सिर्फ खरीदार का इंतजार करता है।
मुंबई की प्यास और सत्ता की राजनीति
एक तरफ महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई में पानी बचाने की अपील हो रही है। बारिश रूठी है, जलस्रोत घट रहे हैं, लोगों को पानी की चिंता है। मुंबईकर को कहा जा रहा है-पानी संभालकर इस्तेमाल करो।
बिल्कुल सही! लेकिन जनता भी एक सवाल पूछती है-`साहब, पानी की हर बूंद बचाने की जिम्मेदारी जनता की है, तो सत्ता की हर बूंद ईमानदारी से बचाने की जिम्मेदारी किसकी?’
एक तरफ टंकी खाली होने का डर है, दूसरी तरफ राजनीति की टंकी में आरोपों का पानी लगातार भर रहा है।
लोकतंत्र की टंकी में दरार कौन डाल रहा है?
मुंबई की पानी की टंकी में कमी हो तो जनता परेशान, लेकिन लोकतंत्र की टंकी में दरार हो तो? उसकी चिंता कौन करेगा? क्योंकि पानी खत्म होगा तो कुछ दिन संकट आएगा, लेकिन विश्वास खत्म हुआ तो पीढ़ियां सवाल पूछेंगी।
महाराष्ट्र किसके हाथ में?
आज महाराष्ट्र के सामने तीन संकट हैं-एक राजनीति में भरोसे का, दूसरा लोकतंत्र में निष्ठा का,
और तीसरा मुंबई की प्यास का।
सत्ता के महल चाहे जितने ऊंचे बन जाएं, लेकिन अगर जनता के घर का नल सूखा है, तो इतिहास सवाल जरूर पूछेगा। क्योंकि जनता सब देख रही है। वह केवल वोट देने वाली भीड़ नहीं, वह महाराष्ट्र की असली मालिक है और आखिर में सवाल वही-नेता जनता का हाथ पकड़कर चलेंगे
या फिर कुर्सी देखकर हाथ बदलते रहेंगे? समय जवाब देगा, क्योंकि इतिहास की कलम न चार्टर विमान में बैठती है, न सत्ता के दरबार में बिकती है।
