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मेगा-प्लान : दुनिया से सीखकर भारत कैसे बनाए ईवी रोडमैप …डीजल निर्भरता घटाने का दशक

अनिल तिवारी
मुंबई

उत्तरार्ध

ईवी अब भविष्य नहीं, वर्तमान की जरूरत बन चुके हैं। दुनिया के कई देश पेट्रोल-डीजल से दूरी बना रहे हैं। स्वच्छ और टिकाऊ परिवहन की ओर तेजी से कदम बढ़ रहे हैं। भारत के लिए भी अब ठोस ईवी रोडमैप जरूरी है।

वैश्विक आर्थिक शक्ति
इलेक्ट्रिक वेहिकल क्रांति अब भविष्य की कल्पना नहीं, वर्तमान की वास्तविकता है। दुनिया के अनेक देशों ने यह समझ लिया है कि पेट्रोल और डीजल आधारित परिवहन व्यवस्था लंबे समय तक टिकाऊ नहीं रह सकती। जलवायु परिवर्तन, शहरी प्रदूषण, तेल आयात पर निर्भरता, ऊर्जा सुरक्षा और तकनीकी प्रतिस्पर्धा इन सबने मिलकर ईवी को वैश्विक नीति का केंद्र बना दिया है। भारत, विशेषकर मुंबई जैसे महानगरों के लिए, यह बदलाव अब विलासिता नहीं, अनिवार्यता है।
दुनिया का सबसे बड़ा उदाहरण नॉर्वे है। २०२५ में नॉर्वे में नई कारों के पंजीकरण में इलेक्ट्रिक वाहनों की हिस्सेदारी करीब ९५.९ प्रतिशत रही। दिसंबर २०२५ में यह आंकड़ा लगभग ९८ प्रतिशत तक पहुंच गया। यह परिवर्तन अचानक नहीं हुआ। नॉर्वे ने लंबे समय तक पेट्रोल-डीजल कारों पर कर बढ़ाए, इलेक्ट्रिक वाहनों को टैक्स में राहत दी, चार्जिंग नेटवर्क विकसित किया और नागरिकों को यह भरोसा दिया कि ईवी खरीदना आर्थिक रूप से भी लाभकारी होगा। विशेष बात यह है कि नॉर्वे स्वयं तेल और गैस संसाधनों वाला देश है, फिर भी उसने अपने घरेलू परिवहन को इलेक्ट्रिक बनाने का रास्ता चुना। इसका संदेश साफ है कि पेट्रोलियम उत्पादक देश भी समझ चुके हैं कि भविष्य स्वच्छ ऊर्जा आधारित परिवहन का है।
चीन का उदाहरण भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। चीन ने ईवी को केवल प्रदूषण कम करने की नीति के रूप में नहीं, बल्कि औद्योगिक क्रांति के अवसर के रूप में देखा। उसने बैटरी निर्माण, चार्जिंग नेटवर्क, ईवी उत्पादन, इलेक्ट्रिक बसें, दोपहिया, तिपहिया और कारों में बड़े पैमाने पर निवेश किया। आज बीवायडी जैसी चीनी कंपनियां दुनिया की सबसे बड़ी ईवी कंपनियों में गिनी जाती हैं। हाल की रिपोर्टों के अनुसार, बीवायडी तेज चार्जिंग तकनीक, लंबी रेंज और वैश्विक विस्तार पर बड़े पैमाने पर काम कर रही है। यह बताता है कि ईवी उद्योग अब केवल पर्यावरण का विषय नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक शक्ति का विषय बन चुका है। चीन में ईवी नीति ने दो काम साथ-साथ किए पहला, शहरों के प्रदूषण को कम करने में मदद की; दूसरा, चीन को वैश्विक ऑटोमोबाइल उद्योग में नई शक्ति बना दिया। भारत के लिए यह बड़ी सीख है। यदि भारत ईवी निर्माण, बैटरी तकनीक, मोटर, पावर इलेक्ट्रॉनिक्स, चार्जिंग उपकरण और सॉफ्टवेयर नियंत्रण प्रणाली में तेजी से निवेश करे, तो वह केवल विदेशी ईवी का बाजार ही नहीं बनेगा, बल्कि ईवी निर्माण का वैश्विक केंद्र बन सकता है।
खाड़ी देशों का उदाहरण भी उल्लेखनीय है। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर और अन्य पेट्रोलियम उत्पादक देश भी ईवी और स्वच्छ परिवहन की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। रिपोर्टों के अनुसार, जीसीसी क्षेत्र में ईवी बाजार तेजी से बढ़ रहा है। यूएई क्षेत्रीय स्तर पर ईवी बिक्री में आगे है और सऊदी अरब में भी ईवी बिक्री में तेज वृद्धि दर्ज की गई है। यह तथ्य महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये वही देश हैं जिनकी अर्थव्यवस्था लंबे समय तक तेल पर आधारित रही। फिर भी वे भविष्य की दिशा पहचान रहे हैं।
भारत को भी इसी दूरदृष्टि की जरूरत है। यदि सरकार केवल इस चिंता में रहेगी कि पेट्रोल-डीजल की खपत घटने से कर-राजस्व कम होगा, तो देश भविष्य की तकनीकी दौड़ में पिछड़ सकता है। सही नीति यह होनी चाहिए कि ईंधन कर-राजस्व पर निर्भरता धीरे-धीरे घटाई जाए और उसकी जगह नए राजस्व मॉडल विकसित किए जाएं, जैसे सड़क उपयोग शुल्क, शहरी भीड़ शुल्क, हरित ऊर्जा शुल्क, बैटरी रीसाइक्लिंग उद्योग, ईवी निर्माण से जीएसटी, चार्जिंग सेवाओं से राजस्व और स्वच्छ ऊर्जा निवेश से रोजगार।
चरणबद्ध स्पष्ट लक्ष्य
भारत के लिए लक्ष्य स्पष्ट होना चाहिए। अगले एक दशक में डीजल की कुल खपत को आधा करने और पेट्रोल की खपत को कम से कम एक-तिहाई तक घटाने का राष्ट्रीय कार्यक्रम बने। उसके बाद के दशक में डीजल को केवल उन क्षेत्रों तक सीमित किया जाए, जहां तत्काल व्यावहारिक विकल्प उपलब्ध न हों, जैसे कुछ भारी मशीनरी, रक्षा जरूरतें, लंबी दूरी के भारी ट्रक या विशेष औद्योगिक उपयोग। शहरों के भीतर डीजल वाहनों का उपयोग न्यूनतम होना चाहिए।
इस रोडमैप में प्राथमिकता उन वाहनों को मिलनी चाहिए, जो सबसे अधिक चलते हैं। निजी कारों की तुलना में बसें, टैक्सियां, ऐप वैâब, ऑटो रिक्शा, डिलिवरी वाहन, स्कूल बसें, कंपनी बसें, छोटे मालवाहक वाहन और सरकारी वाहन अधिक किलोमीटर चलते हैं। यदि इन्हें पहले इलेक्ट्रिक किया जाए, तो प्रति वाहन प्रदूषण में कमी अधिक होगी। सार्वजनिक परिवहन का विद्युतीकरण इसिलिए सबसे बड़ा कदम है।
भारत में पीएम ई-बस सेवा और पीएम ई-ड्राइव जैसी योजनाओं के तहत हजारों इलेक्ट्रिक बसों के लिए प्रक्रिया चल रही है। रिपोर्टों के अनुसार, देशभर में १४,००० से अधिक ई-बसों की स्वीकृति और बड़े शहरों के लिए आवंटन की दिशा में कदम उठाए गए हैं। मुंबई के लिए भी बड़ी संख्या में ई-बसों की योजना बनाई गई है।
कुल मिलाकर कहा जाए तो भारत को ईवी नीति में पांच स्तरों पर काम करना होगा। पहला, उत्पादन नीति ऑटोमोबाइल कंपनियों को स्पष्ट समयसीमा दी जाए कि किस वर्ष के बाद नए डीजल मॉडल सीमित होंगे और किस सेगमेंट में ईवी अनिवार्य होगा। दूसरा, खरीद नीति सरकारी विभागों, सार्वजनिक उपक्रमों और कॉरर्पोरेट फ्लीट को चरणबद्ध रूप से ईवी खरीदने के लिए बाध्य किया जाए। तीसरा, चार्जिंग नीति हर पेट्रोल पंप, मॉल, कार्यालय परिसर, आवासीय सोसायटी, पार्विंâग स्थल, बस डिपो और लॉजिस्टिक हब में चार्जिंग सुविधा हो। चौथा, वित्त नीति ईवी खरीद पर सस्ता कर्ज, पुराने वाहनों की स्व्रैâपेज सहायता और बैटरी लीज मॉडल उपलब्ध हो। पांचवां, औद्योगिक नीति बैटरी सेल, मोटर, कंट्रोलर और चार्जर के घरेलू निर्माण को रणनीतिक उद्योग का दर्जा मिले।
शहरी ईवी नीति
मुंबई और अन्य महानगरों के लिए अलग शहरी ईवी नीति होनी चाहिए। बड़े शहरों में डीजल टैक्सी, डीजल बस, डीजल डिलिवरी वैन और डीजल जेनरेटर आधारित वैनिटी वैन को समयसीमा देकर हटाया जा सकता है। पहले नए पंजीकरण बंद किए जाएं, फिर पुराने वाहनों को स्व्रैâपेज या कन्वर्जन पैकेज दिया जाए। जहां इलेक्ट्रिक विकल्प तुरंत संभव न हो, वहां सीएनजी को अस्थायी संक्रमण ईंधन माना जाए, परंतु अंतिम दिशा इलेक्ट्रिक ही होनी चाहिए।
ईवी क्रांति को सफल बनाने के लिए बिजली का स्रोत भी स्वच्छ होना चाहिए। यदि वाहन इलेक्ट्रिक हों, लेकिन बिजली कोयले से बने, तो प्रदूषण केवल शहर से बिजलीघर तक स्थानांतरित हो जाएगा। इसलिए ईवी नीति को सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, बैटरी स्टोरेज और स्मार्ट ग्रिड से जोड़ा जाना चाहिए। बस डिपो, रेलवे स्टेशन, मेट्रो कारशेड, एयरपोर्ट, सरकारी भवन और पार्विंâग परिसरों पर सौर ऊर्जा संयंत्र लगाए जा सकते हैं। इससे चार्जिंग की लागत भी घटेगी और कार्बन उत्सर्जन भी।
आज भारत के पास अवसर बहुत बड़ा है। यहां दोपहिया, तिपहिया, छोटी कार, बस, डिलिवरी वाहन और शहरी मालवाहक सेगमेंट में ईवी क्रांति तेज हो सकती है। भारत की २०२५ की ईवी बिक्री से यह संकेत मिलता है कि बाजार तैयार है, लेकिन नीति को और निर्णायक बनाना होगा। तिपहिया सेगमेंट में ईवी की हिस्सेदारी ६० प्रतिशत से अधिक बताई गई है, जो यह साबित करती है कि जहां आर्थिक लाभ स्पष्ट है, वहां लोग तेजी से ईवी अपना रहे हैं।
अंतत: ईवी क्रांति केवल वाहन बदलने की बात नहीं है। यह भारत की आर्थिक स्वतंत्रता, स्वच्छ हवा, नागरिक स्वास्थ्य, तकनीकी आत्मनिर्भरता और भविष्य की औद्योगिक शक्ति का प्रश्न है। यदि नॉर्वे जैसा तेल संपन्न देश पेट्रोल-डीजल कारों को लगभग समाप्त कर सकता है, यदि चीन ईवी को अपनी औद्योगिक ताकत बना सकता है, यदि खाड़ी देश तेल उत्पादन के बावजूद इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को आगे बढ़ा सकते हैं, तो भारत क्यों नहीं?
लिहाजा, भारत को अब स्पष्ट घोषणा करनी चाहिए कि आने वाला दशक ईवी परिवर्तन का दशक होगा। डीजल को शहरों से बाहर करना, पेट्रोल की खपत घटाना, सार्वजनिक परिवहन को इलेक्ट्रिक बनाना और घरेलू ईवी उद्योग को वैश्विक शक्ति बनाना—यही स्वच्छ, आत्मनिर्भर और आधुनिक भारत का रास्ता है।
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